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जेनब को नम आंखों से श्रद्धांजलि ....😓😓😓माँ मेरा कसूर नही था, एक चाचू से चॉकलेट ही तो ली थी ..पापा सा वो लगता था !!मुझे ब...
14/04/2018

जेनब को नम आंखों से श्रद्धांजलि ....😓😓😓

माँ मेरा कसूर नही था, एक चाचू से चॉकलेट ही तो ली थी ..
पापा सा वो लगता था !!
मुझे बोला तुम बेटी हो मेरी !!
उसके पहलू मे बैठ गई मै ..
चॉकलेट खाती, बाते करती .. हाथ मेरे सर पर जो फेरा ..
मै समझी थी इंसान ही ही होगा ... उसकी भी कोई बेटी होगी शायद उसने इसलिए चुम्मा मुझको..
मै भी खुश होकर गले से लग गयी....
माँ मेरा कसूर नहीं था...... एक चाचू से चॉकलेट ले ली ..

10 का नोट भी पकड़ाया था .. मुझको जैसे पापा याद आये ...
खुशी से लेकर सोचा मैने .. चाचू के पैसे से 2 rupee की चॉकलेट और भी लेनी है मैने .. 3 Rupee भइया को दुगी ..
5 Rupee की गुडिया भी लेनी है मैने..
ऐसे मै वो बाते करता घर से दुर ले आया मुझे..
माँ मेरा कसूर नहीं था ..इक चाचू से चॉक लेट ले ली ,

मुझको कुछ भी समझ ना आया.. उसने अचानक लहजा बदला..
मुझे यू जमीन पर लौटाया .. मुँह मेरा जो बंद किया तो...
मुझे फिर मालूम नही था..
चिल्हाकर तुझको बुलाना चाहा ऐ माँ ..
माँ मेरे मासूम से जीस्म को चाचू ने माँस का टुकड़ा समझा..
कुत्ते की तरह काटा मुझको.. बिल्ली की तरह वो देख रहा था. ..
माँ अब मै सह ना पायी .. आज तेरी कली मुरझा गई..
माँ मेरे हाथ मे देखो... एक चॉकलेट तो खा ली थी मैंने..
और एक हाथ में होगी ..
माँ अबकी बार अगर पैदा होऊ मैं .. मुझको खुद से दुर ना करना
माँ सुनो सुनो मैं माँस का टुकड़ा थी क्या.???
मैने क्या मांगा था.??
एक चॉकलेट के बदले?
MAA मै जान गवाकर आयी !!
Maa मैं चिड़िया थी तेरी..
एक दाने पर जान गवाई ..
सुनो माँ अबकी बार पैदा हौऊ मैं, तो मुझको खुद से दुर ना करना !!
मुझको खुद से दुर ना करना !!!
माँ मेरा कसूर नही था..

be careful our baby ......

जेनब को नम आंखों से श्रद्धांजलि

एक अमीर लड़का था. उसे एक गरीब किसान कीलड़की सेप्यार हो गया. लड़कीसुंदर होने के साथ-साथ काफी समझदार थी. एक दिनजब लड़के ने...
14/03/2018

एक अमीर लड़का था. उसे एक गरीब किसान कीलड़की सेप्यार हो गया. लड़कीसुंदर होने के साथ-साथ काफी समझदार थी. एक दिनजब लड़के ने उस लड़की को बताया कि "वह उससे प्यार करता है, और उससे शादी करना चाहता है" तो लड़की ने कुछ सोचने के बाद उस लड़के को शादी करने से इनकार कर दिया. क्योंकि - वह गरीब परिवार से रिश्ता रखती थी.लेकिन कुछ समय बाद जब ये बात उस लड़के को पता चली, तो उस ने लड़की के माता-पिता से बात की और उस लड़की को समझाया. काफी समझाने के बाद वह लड़की मान गयी और दोनों की शादी हो गयी.शादी के बाद, लड़का उसे बहुत प्यार करता था. दोनों का दांपत्य जीवन काफी अच्छा चल रहा था.लेकिन कुछ महीनों बाद लड़की को चर्मरोग(skin diseases) हो गया. जिसके कारण उसकी खूबसूरती ढलने लगी. अब लड़की को यह डर भी सताने लगा, "कि उसकी खूबसूरती ढलने के कारण, कहीं उसका पति उसे छोड़ नदे." लड़की उस चर्म रोग को ठीक करने का हर संभव प्रयास कर रही थी.समय बीत रहा था और लड़की की खूबसूरती धीरे-धीरे ढल रही थी. एक दिन वह लड़का एक काम से दूसरे शहर गया. लड़का जब वहांसे वापस आ रहा था. तो उसका रास्ते में एक कार के साथ एक्सीडेंट हो गया. उस दुर्घटना के दौरान लड़के की आंखें की रोशनी चली गई.इस दुर्घटना के कुछ समय के बाद उनका जीवन फिरसे सामान्य और सुखी बीतने लगा. वह लड़की चर्मरोग की वजह से दिन प्रतिदिन कमजोर और बदसूरत होती गई. लेकिन पति अंधा होने के कारण उनका दांपत्य जीवन ठीक चलता रहा. और दिखाई न देने के कारण, वह लड़का उस से पहले की तरह प्यार करता रहा.कुछ सालो बाद बीमारी के कारण उस लड़की की मृत्यु हो गई. पत्नी की मृत्यु होने के बाद, वह लड़का अंदर से दुखी हो गया, और वह शहर छोड़कर जाने वाला था. तभी उसके पड़ोसी ने उसे सांत्वना देते हुए कहा-- "अब आप तो अपनी पत्नी के बिना अकेले पड़ जाएंगे. वह आपका काफी ख्याल रखती थी. अब आपका जीवन अंधकार में कैसे व्यतीत होगा."तब उस लड़के ने अपने पड़ोसी की ओर देखा और गहरी सांस लेते हुए कहा-- "मैं कभी अंधा था ही नहीं. लेकिन मैं यह सोचकर अंधे होने का नाटक करता रहा, कि कहीं मेरी पत्नी को उसकी बीमारी और बदसूरती के कारण यह ना लगे. कि मैं उससेप्यार नहीं करता इसीलिए! मैंइतने सालों तक बिना कुछ कहे हुए अपनी पत्नी की खुशी के लिए अंधा बनायह बात सुनकर पड़ोसी की आंखों से आंसू छलक आए और वह लड़का वहां से चला गया...........

11/03/2017
हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए यह अति आवश्यक है कि हम यह समझें कि हमारा मन कैसे कार्य करता है – How Our Mind Works, चे...
01/12/2016

हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए यह अति आवश्यक है कि हम यह समझें कि हमारा मन कैसे कार्य करता है – How Our Mind Works, चेतन और अवचेतन मन क्या है – What is Conscious and Subconscious Mind और कैसे हम मन की शक्ति को समझकर अपने जीवन को बेहतर बना सकते है – Understanding Power of Mind.



Psychology: Mind Power

image courtesy – agsandrew.deviantart.com
मनोविज्ञान (Psychology) में मनुष्य के मन को अलग अलग भागों में के रूप में देखते है| मुख्य रूप से मन को दो भागों – चेतन मन एंव अवचेतन मन के रूप में बाँटा गया है|

चेतन या अवचेतन मन का विभाजन कोई वास्तविक भौतिक आधार पर नहीं किया जाता बल्कि यह तो एक मनोविज्ञान की अवधारणा है या मन की अवस्थाएँ है|

इस अवधारणा को समझकर हम अपने जीवन में एक बड़ा परिवर्तन ला सकते है|



Subconscious Mind

चेतन मन हमारी चेतन या सक्रिय (Active) अवस्था है, जिसमें हम सोच विचार और तर्क के आधार पर निर्णय लेते है या कोई कार्य करते है|

अवचेतन मन एक Storage Room की तरह है, जो हमारे सभी विचारों, अनुभवों, धारणाओं आदि को Store (संग्रहित) करता है| अवचेतन मन (Subconscious Mind) तर्क एंव सोच विचार के निर्णय नहीं लेता बल्कि यह हमारे पिछले अनुभवों एंव धारणाओं के आधार पर स्वचालित तरीके से कार्य करता है|



चेतन मन और अवचेतन मन को एक उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है –

जब भी कोई व्यक्ति पहली बार साईकिल चलाना सीख रहा होता है, तो उसे साईकिल को ध्यानपूर्वक नियंत्रित करना होता है| शुरुआत में वह संतुलन नहीं बना पाता और थोड़ा डरा हुआ भी रहता है|

लेकिन कुछ दिनों बाद जब वह साईकिल चलाना सीख जाता है तो अब उसे साइकिल को नियंत्रित करने के बारे में सोचने की भी आवश्यकता नहीं होती| अब साइकिल अपने आप नियंत्रित हो जाती है और अब तो वह मित्रों के साथ बातचीत करते हुए या कोई और कार्य करते हुए भी साइकिल चला सकता है|



ऐसा क्यों होता है ?????



Subconscious Mind – Autopilot System



शुरुआत में जब व्यक्ति पहली बार साइकिल चलाना सीख रहा होता है तो वह अपना “चेतन मन (Conscious Mind)” इस्तेमाल कर रहा होता है| लेकिन जब वह बार-बार साइकिल चलाने की प्रैक्टिस करता है, तो अब यह अनुभव उसके अवचेतन मन में संग्रहित (Store) होने शुरू जाते है और धीरे धीरे अवचेतन मन, चेतन मन की जगह ले लेता है|

हमारा अवचेतन मन एक ऑटोपायलट सिस्टम (Autopilot System) की तरह है जो अपने आप स्वचालित तरीके से कार्य करता है|

सभी स्वचालित कार्यों जैसे साँस लेना, दिल धड़कना आदि कार्य अवचेतन मन के द्वारा ही किए जाते है| हमारी आदतें एंव रोजमर्रा के सभी कार्यों में अवचेतन मन का महत्वपूर्ण योगदान होता है|



How Mind Works

अवचेतन मन एक सॉफ्टवेयर या रोबोट की तरह है, जिसकी प्रोग्रामिंग चेतन मन द्वारा की जाती है| अवचेतन मन एक रोबोट की तरह है जो स्वंय कुछ अच्छा बुरा सोच नहीं सकता, वो तो केवल पहले से की गई प्रोग्रामिंग के अनुसार स्वचालित तरीके से कार्य करता है|

हमारे हर एक विचार का हमारे अवचेतन मन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है या यह कह सकते है कि हम जो कुछ भी सोचते है या करते है उससे हमारे अवचेतन मन की प्रोग्रामिंग होती जाती है और फिर बाद में धीरे धीरे अवचेतन मन उस कार्य को नियंत्रित करने लगता है|

हमारी आदतों और धारणाओं का निर्माण भी ऐसे ही होता है और बाद में वह आदत स्वचालित रूप से अवचेतन मन के द्वारा नियंत्रित होती है|



How to Program our Subconscious Mind

यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपने अवचेतन मन की प्रोग्रामिंग कैसे करते है| एक बार प्रोग्रामिंग हो जाने के बाद अवचेतन मन उसी के अनुसार कार्य करने लगता है – चाहे वह कार्य गलत हो या सही|

चेतन मन (Conscious Mind) को विचारों का चौकीदार या गेटकीपर भी कहा जा सकता है| दरअसल हमारा हर विचार एक बीज की तरह है और हमारा अवचेतन मन एक बगीचे की तरह है| हमारा चेतन मन यह निर्णय करता है कि अवचेतन मन में कौनसा बीज बौना है और कौनसा नहीं|

हम कभी कभी अनजाने में अपने अवचेतन मन की गलत प्रोग्रामिंग कर देते है – जैसे अगर मैं यह सोचता हूँ आज मैं यह लेख नहीं लिखूंगा तो यह छोटा सा विचार धीरे धीरे मेरे कार्य को कल पर टालने की आदत बन सकता है|

गहन चिंतन और मैडिटेशन के द्वारा हम अवचेतन मन की Reprogramming करके इसमें इन्स्टाल किए हुए गलत सॉफ्टवेयर को धीरे-धीरे डिलीट कर सकते है|



हमारे जीवन के एक महत्वपूर्ण भाग को “अवचेतन मन” नाम का रोबोट नियंत्रित करता है और यह रोबोट, चेतन मन द्वारा की गयी प्रोग्रामिंग से नियंत्रित होता है| इस रोबोट की प्रोग्रामिंग विचार रुपी बीज से होती है, इसलिए सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम कौनसे विचार चुनते है और अपने अवचेतन मन में किस तरह के सॉफ्टवेयर इंस्टाल करते है|

 

01/12/2016

एक अपराधी, अपराध क्यों करता है?? उसका अपराध करने का उद्देश्य क्या होता है??

एक संत, सेवा क्यों करता है ?? उसका सेवा करने का उद्देश्य क्या होता है ??

मैं यह ब्लॉग क्यों लिख रहा हूँ?? मेरा ब्लॉग लिखने का उद्देश्य क्या है??

आप यह ब्लॉग क्यों पढ़ रहें है?? आपका यह ब्लॉग पढ़ने का उद्देश्य क्या है??



एक अपराधी, एक संत, मैं, आप या इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति जो कुछ भी करता है उसका अंतिम उद्देश्य होता है – ख़ुशी| हर कोई व्यक्ति हमेशा, खुश रहना चाहता है|

एक चोर, चोरी करता है क्योंकि उसे लगता है कि उसे इससे पैसे मिलेंगे जिससे उसे ख़ुशी मिलेगी|

एक संत, दूसरों की भलाई के लिए अपना पूरा जीवन लगा देता है, क्योंकि उसे लगता है की उसे इससे ख़ुशी मिलेगी|

आप आज यह ब्लॉग पढ़ रहे है क्योंकि आपको लगता है कि इससे आपका जीवन बेहतर होगा और आप और अधिक खुश रहेंगे|

एक संत और एक अपराधी दोनों खुश रहना चाहते है, लेकिन दोनों के रास्ते अलग-अलग क्यों??



The Secret of Life in Hindi

क्या आप जानते है, हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य क्या है – What is the Secret of our life??

हमारी जिंदगी का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि “हम खुद को ही नहीं जानते”, शायद हम अपनी प्रकृति या मूल स्वभाव को ही नहीं जानते या फिर शायद जानते हुए भी अनजान है|

जिस तरह हमें पता है कि पानी का स्वभाव तरल होता है, उसी तरह क्या हमें पता है कि मनुष्य का मूल स्वभाव क्या है??

क्या है हमारा मूल स्वभाव – Self Realization

हर व्यक्ति के अन्दर एक शांत शक्ति मौजूद है जिसे हम अपनी अंतरआत्मा कहते है| यह अंतरात्मा हर परिस्थति में सही होती है| यह अंतरात्मा हमेशा हमें सही रास्ता दिखाती है|

जब भी हम कुछ गलत कर रहे होते है, तब हमें बड़ा अजीब सा लगता है जैसे कोई यह कह रहा कि वह कार्य मत करो| यह हमारे अन्दर मौजूद आतंरिक शक्ति ही होती है जो हमें बुरा कार्य करने से रोकती है|

कहा जाता है कि हर मनुष्य के अन्दर ईश्वर का अंश होता है, यह ईश्वर का अंश हमारी अंतरआत्मा ही होती है|

हमारी प्रकृति या स्वभाव – शांत, शक्ति, प्रेम, निडर, सद्भाव, दूसरों की सहायता और अच्छाई है|

हर मनुष्य के अन्दर यह शांत और अद्भुत शक्ति मौजूद है, चाहे वह एक अपराधी हो या संत या और कोई व्यक्ति|

लेकिन फिर क्यों एक संत सही मार्ग पर चलता है और अपराधी गलत मार्ग पर ???

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि संत को अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनाई देती है लेकिन अपराधी को वह आवाज अब सुनाई नही देती|

दरअसल जब हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना कर देते है तो हमारा अपनी अंतरात्मा से संपर्क कमजोर हो जाता है|

जब हम दूसरी बार कुछ बुरा करने जा रहे होते है तो हमें अपनी अंतरात्मा की आवाज फिर महसूस होती है लेकिन इस बार वह आवाज इतनी मजबूत नहीं होती क्योंकि हमारा अपनी अंतरात्मा से संपर्क कमजोर हो चुका होता है|

जैसे जैसे हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना करते जाते है वैसे वैसे हमारा अपनी अंतरात्मा के साथ संपर्क कमजोर होता जाता है और एक दिन ऐसा आता है कि हमें वो आवाज बिल्कुल नहीं सुनाई देती|

जैसे जैसे हमारा अपनी अंतरात्मा के साथ संपर्क कमजोर होता जाता है वैसे वैसे हम उदास रहने लगते है और खुशियाँ भौतिक वस्तुओं में ढूंढने लगते है| हम समस्याओं को हल करने में असक्षम हो जाते है जिससे “तनाव” हमारा हमसफ़र बन जाता है|



हम कहाँ जा रहे है ??

आज हमारी जिंदगी एक मशीन की तरह हो गई है जिसमें हम भागते रहते है, लेकिन हमें यह नहीं पता कि हमें जाना कहाँ है?? अगर हम स्वंय को पैसा इकठ्ठा करने वाला रोबोट कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी|

आज हमारे पास सब कुछ है, फिर भी ज्यादातर लोग खुश नहीं है??

ऐसा क्यों है??

इसका सीधा कारण है कि हमारा अपनी अंतरात्मा से संपर्क कमजोर हो गया है, इसलिए हम केवल बाहरी वस्तुओं में ख़ुशी ढूंढते है|

हमें लगता है कि क्रोध होना स्वाभाविक है| लेकिन क्या एक क्रोधी व्यक्ति खुश हो सकता है?? गुस्सा आने के बाद हमारा पूरा दिन या दो तीन घंटे तो ख़राब हो ही जाते है| ऐसा क्यों??

क्योंकि हमारा स्वभाव शांत रहने का है इसलिए जब हम क्रोध करते है, तो हम अपनी अंतरात्मा कि आवाज को अनसुना करते है|

दरअसल हम जितना अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना करते जाते है, उतना हम मानसिक और भावनात्मक रूप से कमजोर होते जाते है|

हमारा स्वभाव बिल्कुल पवित्र है यानि क्रोध, ईष्या और लालच का कोई स्थान नहीं है| लेकिन जब हम क्रोध, लालच और ईष्या को अपना स्वभाव बनाने की कोशिश करने लगते है तो हम दुखी हो जाते है|

एक चोर को भले ही यह लगता है कि वह चोरी करके खुश हो जाएगा, लेकिन वास्तव में वह चोरी करके अपनी समस्याओं को बढ़ाता है|

जब हम किसी दूसरे व्यक्ति की बुराई करते है, तब हम सबसे अधिक स्वयं को नुकसान प

01/12/2016

विलियम शेक्सपियर (William Shakespeare) ने कहा था कि जिंदगी एक रंगमंच है और हम लोग इस रंगमंच के कलाकार | सभी लोग जीवन (Life) को अपने- अपने नजरिये से देखते है| कोई कहता है जीवन एक खेल है (Life is a game), कोई कहता है जीवन ईश्वर का दिया हुआ उपहार है (Life is a gift), कोई कहता है जीवन एक यात्रा है (Life is a journey), कोई कहता है जीवन एक दौड़ है (Life is a race) और बहुत कुछ|

मैं आज यहाँ पर “जीवन” के बारें में अपने विचार share कर रहा हूँ और बताने की कोशिश करूंगा की जीवन क्या है? (What is Life)|मनुष्य का जीवन एक प्रकार का खेल है – Life is a Game

और मनुष्य इस खेल का मुख्य खिलाडी|

यह खेल मनुष्य को हर पल खेलना पड़ता है|



इस खेल का नाम है “Game of Thoughts (विचारों का खेल)”|



इस खेल में मनुष्य को दुश्मनों से बचकर रहना पड़ता है|



मनुष्य अपने दुश्मनों से तब तक नहीं बच सकता जब तक मनुष्य के मित्र उसके साथ नहीं है|



मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र “विचार (thoughts)” है, और उसका सबसे बड़ा दुश्मन भी विचार (Thoughts) ही है|



मनुष्य के मित्रों को सकारात्मक विचार (Positive Thoughts) कहते है और मनुष्य के दुश्मनों को नकारात्मक विचार (Negative Thoughts) कहा जाता है|



मनुष्य दिन में 60, 000 से 90, 000 विचारों (Thoughts) के साथ रहता है|



यानि हर पल मनुष्य एक नए दोस्त (Positive Thought) या दुश्मन (Negative Thought) का सामना करता है|



मनुष्य का जीवन विचारों के चयन (Selection of Thoughts) का एक खेल है|



इस खेल में मनुष्य को यह पहचानना होता है कि कौनसा विचार उसका दुश्मन है और कौनसा उसका दोस्त, और फिर मनुष्य को अपने दोस्त को चुनना होता है|



हर एक दोस्त (One Positive Thought) अपने साथ कई अन्य दोस्तों (Positive Thoughts) को लाता है और हर एक दुश्मन (One Negative Thought) अपने साथ अनेक दुश्मनों (Negative Thoughts) को लाता है|

इस खेल का मूल मंत्र यही है कि मनुष्य जब निरंतर दुश्मनों (Negative Thoughts) को चुनता है तो उसे इसकी आदत पड़ जाती है और अगर वह निरंतर दोस्तों (Positive Thoughts) को चुनता है, तो उसे इसकी आदत पड़ जाती है|



जब भी मनुष्य कोई गलती करता है और कुछ दुश्मनों को चुन लेता है तो वह दुश्मन, मनुष्य को भ्रमित कर देते है और फिर मनुष्य का स्वंय पर काबू नहीं रहता और फिर मनुष्य निरंतर अपने दुश्मनों को चुनता रहता है|



मनुष्य के पास जब ज्यादा मित्र रहते है और उसके दुश्मनों की संख्या कम रहती है तो मनुष्य निरंतर, इस खेल को जीतता जाता है| मनुष्य जब जीतता है तो वह अच्छे कार्य करने लगता है और सफलता उसके कदम चूमती है, सभी उसकी तारीफ करते है और वह खुश रहता है|



लेकिन जब मनुष्य के दुश्मन, मनुष्य के मित्रो से मजबूत हो जाते है, तो मनुष्य हर पल इस खेल को हारता जाता है और निराश एंव क्रोधित रहने लगता है|



मनुष्य को विचारों के चयन में बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है क्योंकि मनुष्य के दुश्मन, मनुष्य को ललचाते है और मनुष्य को लगता है कि वही उसके दोस्त है|



जो लोग इस खेल को खेलना सीख जाते है वे सफल हो जाते है और जो लोग इस खेल को समझ नहीं पाते वे बर्बाद हो जाते है|



इस खेल में ज्यादातर लोगों कि समस्या यह नहीं है कि वे अपने दोंस्तों और दुश्मनों को पहचानते नहीं बल्कि समस्या यह है कि वे दुश्मनों को पहचानते हुए भी उन्हें चुन लेते है|



ईश्वर (या सकारात्मक शक्तियाँ), मनुष्य को समय-समय पर कई तरीकों से यह समझाते रहते है कि इस खेल को कैसे खेलना है लेकिन यह खेल मनुष्य को ही खेलना पड़ता है| जब मनुष्य इसमें हारता रहता है और यह भूल जाता है कि इस खेल को कैसे खेलना है तो ईश्वर फिर उसे बताते है कि इस खेल को कैसे खेलना है|

————————————- यही है जीवन

01/12/2016

एक समय की बात है, एक गाँव में महान ऋषि रहते थे| लोग उनके पास अपनी कठिनाईयां लेकर आते थे और ऋषि उनका मार्गदर्शन करते थे| एक दिन एक व्यक्ति, ऋषि के पास आया और ऋषि से एक प्रश्न पूछा| उसने ऋषि से पूछा कि “गुरुदेव मैं यह जानना चाहता हुईं कि हमेशा खुश रहने का राज़ क्या है (What is the Secret of Happiness)?” ऋषि ने उससे कहा कि तुम मेरे साथ जंगल में चलो, मैं तुम्हे खुश रहने का राज़ (Secret of Happiness) बताता हूँ|

ऐसा कहकर ऋषि और वह व्यक्ति जंगल की तरफ चलने लगे| रास्ते में ऋषि ने एक बड़ा सा पत्थर उठाया और उस व्यक्ति को कह दिया कि इसे पकड़ो और चलो| उस व्यक्ति ने पत्थर को उठाया और वह ऋषि के साथ साथ जंगल की तरफ चलने लगा|

कुछ समय बाद उस व्यक्ति के हाथ में दर्द होने लगा लेकिन वह चुप रहा और चलता रहा| लेकिन जब चलते हुए बहुत समय बीत गया और उस व्यक्ति से दर्द सहा नहीं गया तो उसने ऋषि से कहा कि उसे दर्द हो रहा है| तो ऋषि ने कहा कि इस पत्थर को नीचे रख दो| पत्थर को नीचे रखने पर उस व्यक्ति को बड़ी राहत महसूस हुयी|

तभी ऋषि ने कहा – “यही है खुश रहने का राज़ (Secret of Happiness)”| व्यक्ति ने कहा – गुरुवर मैं समझा नहीं|

तो ऋषि ने कहा-



जिस तरह इस पत्थर को एक मिनट तक हाथ में रखने पर थोडा सा दर्द होता है और अगर इसे एक घंटे तक हाथ में रखें तो थोडा ज्यादा दर्द होता है और अगर इसे और ज्यादा समय तक उठाये रखेंगे तो दर्द बढ़ता जायेगा उसी तरह दुखों के बोझ को जितने ज्यादा समय तक उठाये रखेंगे उतने ही ज्यादा हम दु:खी और निराश रहेंगे| यह हम पर निर्भर करता है कि हम दुखों के बोझ को एक मिनट तक उठाये रखते है या उसे जिंदगी भर| अगर तुम खुश रहना चाहते हो तो दु:ख रुपी पत्थर को जल्दी से जल्दी नीचे रखना सीख लो और हो सके तो उसे उठाओ ही नहीं

01/12/2016

क्या आप जानते है, अगर एक मेंढक को ठंडे पानी के बर्तन में डाला जाए और उसके बाद पानी को धीरे धीरे गर्म किया जाए तो मेंढक पानी के तापमान के अनुसार अपने शरीर के तापमान को समायोजित या एडजस्ट कर लेता है|

जैसे जैसे पानी का तापमान बढ़ता जाएगा वैसे वैसे मेंढक अपने शरीर के तापमान को भी पानी के तापमान के अनुसार एडजस्ट करता जाएगा|

लेकिन पानी के तापमान के एक तय सीमा से ऊपर हो जाने के बाद मेंढक अपने शरीर के तापमान को एडजस्ट करने में असमर्थ हो जाएगा| अब मेंढक स्वंय को पानी से बाहर निकालने की कोशिश करेगा लेकिन वह अपने आप को पानी से बाहर नहीं निकाल पाएगा|

वह पानी के बर्तन से एक छलांग में बाहर निकल सकता है लेकिन अब उसमें छलांग लगाने की शक्ति नहीं रहती क्योंकि उसने अपनी सारी शक्ति शरीर के तापमान को पानी के अनुसार एडजस्ट करने में लगा दी है| आखिर में वह तड़प तड़प मर जाता है|



मेंढक की मौत क्यों होती है ??

ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि मेंढक की मौत गर्म पानी के कारण होती है|

लेकिन सत्य यह है कि मेंढक की मौत सही समय पर पानी से बाहर न निकलने की वजह से होती है| अगर मेंढक शुरू में ही पानी से बाहर निकलने का प्रयास करता तो वह आसानी से बाहर निकल सकता था|



हम इंसान है, मेंढक नहीं : Motivation



हमें भी परिस्थितियों और लोगों के अनुसार एडजस्ट करना पड़ता है | लेकिन हमें यह निर्णय लेना चाहिए कि हमें कब एडजस्ट करना है और कब परिस्थितियों से बाहर निकलना है|

अगर हम सही समय पर निर्णय नहीं ले पाए तो हमें परिस्थितियों एंव अन्य लोगों से वितीय, शारीरिक या भावनात्मक दुराचार का सामना करना पड़ेगा और हम धीरे-धीरे कमजोर होते जाएंगे| फिर कहीं ऐसा न हो कि हम इतने कमजोर पड़ जाएँ कि उस चक्रव्यूह से कभी निकल ही न पाएं|

01/12/2016

इसी तरह क्रिकेट की बात ले लीजिये – वनडे क्रिकेट के इतने बड़े इतिहास में वर्ष 2010 तक एक भी दोहरा शतक नहीं लगा लेकिन वर्ष 2010 में सचिन तेंदुलकर के दोहरा शतक लगाने के 4-5 वर्षों में ही 7 और दोहरे शतक (Double Centuries) लग गए| क्या यह मात्र संयोग था? ऐसा क्यों हुआ?

ऐसा इसीलिए हुआ क्योंकि 2010 से पहले जब किसी ने दोहरा शतक नहीं लगाया था तो सभी की मानसिकता यही थी कि दोहरा शतक लगाना बहुत ही मुश्किल है| क्योंकि अभी तक इस रिकॉर्ड को किसी ने नहीं तोडा था तो यह नामुनकिन सा लगता था| लेकिन जब सचिन ने दोहरा शतक लगाया तो सभी की मानसिकता बदल गयी और यह लगने लगा कि दोहरा शतक लगाना मुश्किल है पर नामुनकिन नहीं|



इस दुनिया में नामुनकिन कुछ भी नहीं (Nothing is impossible in this world),“नामुनकिन” हमारा भ्रम या गलत मान्यता है जो आख़िरकार गलत साबित होती है|

“हम वो सब कर सकते है जो हम सोच सकते है और हम वो सब सोच सकते है जो आज तक हमने नहीं सोचा”



हम गलत धारणाएँ (Wrong Beliefs) बना लेते है और हमें इसी कारण कोई कार्य मुश्किल या असंभव लगता है|

हम आज जो भी है वह हमारी सोच का ही परिणाम है| हम जैसा सोचते है, वैसा बन जाते है – (We become, what we think)| “असंभव” या “नामुनकिन” (Impossible) हमारी सोच का ही परिणाम है|

“हमारे साथ वैसा ही होता है जैसा हम मानते है और विश्वास करते है|”



भौरा विज्ञान के नियमों के अनुसार उड़ नहीं सकता लेकिन वह मानता है कि वह उड़ सकता है इसलिए वह उड़ जाता है जबकि हाथी कमजोर रस्सी को आसानी से तोड़ सकता है लेकिन वह यह मानता है कि वह उस रस्सी को तोड़ नहीं सकता, इसलिए वह रस्सी को तोड़ नहीं पाता| |



यह हम पर निर्भर करता है कि हमें हाथी की तरह अपनी ही सोच का गुलाम रहना है या भौरे की तरह स्वतंत्र| अगर हम मानते है और स्वंय पर यह विश्वास करते है कि हम कुछ भी कर सकते है तो हमारे लिए नामुनकिन कुछ भी नही———————————————————- Nothing Is Impossible.

01/12/2016

दोस्तों इस जीवन में नामुनकिन कुछ भी नहीं (Nothing is impossible in life), नामुनकिन शब्द मनुष्य ने ही बनाया है| जब टेलीफोन और रेडियो आदि का आविष्कार नहीं हुआ था तो दुनिया और विज्ञान यही मानते थे कि आवाज को कुछ ही समय में सैकड़ो किलोमीटर दूर पहुँचाना नामुनकिन (Impossible) है, लेकिन आज मोबाइल हमारे जीवन का हिस्सा है|

इसी तरह जब तक विमान का आविष्कार नहीं हुआ था तब तक विज्ञान जगत भी यही मानता था कि मनुष्य के लिए आकाश में उड़ना संभव नहीं लेकिन जब राइट बंधुओं ने विमान का आविष्कार किया तो यह “असंभव”, “संभव” में बदल गया (Impossible becomes Possible)|

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