24/06/2023
मेरा गांव 😍
मेरा बचपन😍
धूमिल हो चली हैं
अब बचपन की बहुत सी यादें
उम्र के करीब 42 बसंत पार करने के बाद
बहुत से लोग याद हैं अभी भी
जो मिलने आते थे उस समय
दादाजी से दुकान पर घर पर
बड़ा लाड़ दुलार करते थे हमें
जब हम बहुत छोटे थे
जो कभी हमारे गांव के घर के
बड़े से आँगन में डेरा जमाए रहते थे
आँगन में पडी कई चारपाई और कुर्सियों पर
जो शायद उन लोगों के लिये ही डाली गई थी
उस बड़े से आँगन में नीम के बड़े से पेड़ के नीचे
जिनसे गर्मियों में निबॉली गिरा करती थीं पक कर
और उसके नीचे रखी ठंडे पानी की मटकी
हमारे दादाजी जिनको गांव में सब
फ़ूफाजी कहा करते थे और नगर सेठ जी भी बौहरे जी भी उनकी दुकान पर लोग अनाज लेकर आते
सामान ले जाते कभी अनाज ना होता पैसे ना होते
तो उधार भी ले जाते फिर फसल आने पर अनाज दे जाते
हमें भी अनाज तौलने का शौक़ लगता
कभी कोई प्रेम से घर में लगी ताजा सब्जी भी दे जाता
हमारी दादी जिन्हें गांव के लोग बुआ कहते थे
पुराने कपड़ों पैसों अनाज आदि से हमारे लिए
जंगली फल तेंदु बेर मकोरी इत्यादि लिया करती थीं
ताज़ा सब्जियां फल नींबु खरबूजा खेत में लगे हुए
बिना किसी pesticide के, मजे से खाते
जब हम बहुत छोटे थे
तो मास्टरजी घर पर ही पढ़ाने आते
गांव के स्कूल में बक्सा नुमा बस्ता लेकर जाते
गांव में एक साप्ताहिक हाट लगती
जिसमें आसपास के गांवों से लोग खरीदारी करने आते
हम भी कभी कभी चले जाते
उस छोटे से लेकिन
आकर्षक हाट बाजार में दादाजी के साथ
और जो अच्छा लगता वो ले आते
बिना किसी शर्म संकोच के
बहुत सी गाय भैंस थी
हमारे घर के सामने वाले हमारे बड़े से बाड़े में
जिनके लिए एक चरवाहा रख रखा था हमारे दादाजी ने जिसे हम भैंस वाले दादाजी कहते थे
वो हमें रात को कहानियाँ सुनाया करते
बहुत सारे नौकरों की फौज घर में रहती थी
उस समय और सभी के सभी विश्वसनीय और ईमानदार घर के सदस्य की तरह रहते
मिट्टी के चूल्हे पे मिट्टी के तवे पर बनती रोटियाँ
और दुध दही से निकलता ताजा माखन
क्या कुछ प्राकृतिक और शुद्ध नहीं था उस समय
थोड़े बड़े हुए तो हम सब पढ़ने के लिए शहर आ गए हमारे शहर वाले बड़े से मकान में
लेकिन गर्मियों की छुट्टियां होते ही
हम दो महीने के लिए फिर से गांव चले जाते
वहां पूरे दो महीने रहते
पतंग बनाकर उड़ाते कभी कच्चे खपरैल की छत पर कभी पक्की छत पर
कभी खेत पर चले जाते
वहाँ मूँगफली खेत से खोदकर
घास में भून कर खाते
बाग से अमरूद वगैरह तोड़कर खाते
आम के पेड़ पर लगी कैरियो को पत्थर मारकर तोड़ते
तितलियाँ पकड़ते और उनके पीछे भागते
कितनी अनगिनत यादें जुड़ी हैं गांव से
और गांव के उस घर से
लेकिन आज सबकुछ बदल गया है
गांव में घर अभी भी है
लेकिन वो बात अब नहीं रही
हम कितने ही आधुनिक क्यों ना हो जाएँ
लेकिन तब गांव में आधुनिक सुविधाएँ ना होते हुए भी जो कुछ था वो सब कुछ था
उसकी बात ही कुछ और थी
और आज सब कुछ होते हुए भी
कुछ अधूरा अधूरा सा लगता है
क्यूंकि ना तो अब वो गांव रहे ना वो लोग रहे
सब आधुनिकता की दौड़ में
शहर की तरफ बेतहाशा भागे चले जा रहे हैं
हम भी और आप सब भी 😊
#मेरागांव #यादेंबचपनकी
✍️अजीब ❤️❤️❤️❤️❤️
- Pawan Gupta