20/12/2025
आमदनी (पैसे) की कोई कमी नहीं है, अध्यात्म में रुचि है।
लेकिन फिर भी परेशान हैं,एक्सिडेंट (पैरों में चोट) हुआ,
बिना किए कलंक मिला,अपनो से धोखा मिला,
संतान (गर्भ) संबंधित परेशानी।(भवन स्वामी के वचन)।
#वास्तु अनुसार निरीक्षण किया :- --
उत्तरामुखी भवन, निर्माण चंद्रवेधी।(शुभ)
उत्तर दिशा में खुला (बाउंड्री) स्थान,(शुभ)
उत्तर दिशा में कुआं, ईशान में बोरवेल,(शुभ)
बाउंड्री में एक गईया, बछड़े के साथ।(शुभ)
भवन का सोम पद का मुख्यद्वार,ईशान में पूजा स्थान।(शुभ)।
वायव्य कोण में अतिथि कक्ष,पूर्व एवं पश्चिम दिशा में बेडरूम, अग्निकोण में रसोई,ब्रह्मस्थान स्वच्छ,(सब ठीक)।
नैरित्य कोण में स्टोर एवं शौचालय।(शुभ/अशुभ)।
घर से बाहर दीवार से लगा हुआ ,
नैरित्य कोण में शौचालय उसके बाद(साथ)सेप्टिक टैंक।
(सबसे अशुभ)।
अब देखते हैं शास्त्र क्या कहते हैं!!!
*पूज्या लाभकरी नित्यं पुत्रपौत्रविवर्धिनी ।
कामदा भोगदा चैव धनदाचोत्तरप्लवा।।
( #अपराजितपृक्षा)
#अर्थात-
जो भूमि उत्तर दिशा में प्लव(खुला / ढ़लान) वाली होती है,
वह पूज्या होती है।जो नित्य लाभकारी(उन्नतिशील)होती है।वहां रहने वालों के परिवार में पुत्र-पौत्रों की वृद्धि होती है, यह भूमि सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली होती है और इसमें सभी प्रकार के भोग साधन उपलब्ध होते रहते हैं।
उदगादिप्लवमिष्टं विप्रादीनां प्रदक्षिणेनैव।
#महर्षि भृगु ने ढलान के अनुसार वर्णानुसार उत्तर दिशा में प्लव(ढलान/खुला) वाली भूमि ब्राह्मणों के लिए उत्तम बताया गया है।
उत्तरे वंश वृद्धि।
( #विश्वकर्मप्रकाश)
अर्थात उत्तर दिशा में प्लव/ढलान उन्नति (वंश वृद्धि) देता है।
#प्लव का अर्थ (ढलान,खुला स्थान, कुआं, बोरिंग, गढ्डा आदि)।
#सोमे चैव कृते द्वारे यज्ञशीलो भविष्यति।
( #वास्तुविद्या)
(सोम पद में मुख्यद्वार आध्यात्मिक स्वभाव देता है)
सोमे तु धर्मशीलत्वं।
( #विश्वकर्मप्रकाश)
(सोम पद पर मुख्यद्वार होने से धार्मिक आचरण होता है)
सवृषाश्च सवत्साश्च ततो गास्तत्र वासयेत।
यतो गोभिः परिक्रान्तमुपघ्राणैश्च पुजितम्।।
( #मयमतम)
भूमि शुद्धि के संदर्भ में बताया गया है उपेंद्र -- की वहां पर वृषभ (बैल) एवं बछड़ों के साथ गायों को बसा देना चाहिए, क्योंकि गायों, बछड़ों को चलने ,सूंघने से भूमि पवित्र हो जाती है।
आमदनी/धन - धान्य की कोई कमी नहीं , धार्मिक स्वभाव है।
(☝️उपरोक्त स्थितियों अनुसार शास्त्र वचन सिद्ध हो रहा है )
Upendra Vastu Resolve
*प्रवर्तयेद गृहे पुंसां रोगांश्च मृत्यु दायकान।
धनहानि तथा नित्यं कुरुते नैऋतिप्लवा।।
( #अपराजितपृक्षा)
अर्थात नैरित्य कोण में प्लव (ढलान, गड्ढ़ा, सेप्टिक टैंक) वाली भूमि वाले भवन में रहने वाले को धनहानि,रोग(शारीरिक, मानसिक,आर्थिक) या मृत्युतुल्य कष्ट की संभावना रहती है
*नैऋत्ये च यदा लग्ना शालाश्च वास्तु बाह्यतः।
नैऋतयं नाम तदवास्तु व्याध्याधिक्यम तु मृत्युकृत।।
( #अपराजितपृक्षा )
अर्थात यदि किसी गृह की नैरित्य कोण से लगी हुई कोई शाला (कमरा) बाहर की ओर बनी हुई हो तो उसे नैरित्य वास्तु कहते हैं। उसमें इतनी व्याधियां आती है कि मृत्यु का संकट उत्पन्न हो सकता है।
#नैरित्यकोण में असंतुलन से #पूतना(विक्षेप देवता) बलवती हो जाती है जो संतान (गर्भ) संबंधित परेशानी की संभावना को बढ़ाता है।
(पूत+ना)।
स्त्रीदोषाः सुतमरणं प्रेष्यत्वं चापि चरणवैकल्ये।
( #वास्तुसौख्यम)
अर्थात अगर वास्तु पुरुष के चरणों(नैरित्य कोण )में असंतुलन हो तो स्त्रीदोष, संतान हानि, दासता होती है उपेंद्र।
नैरित्य कोण में वास्तु मंडल अनुसार
#वास्तुपुरुष का पैर आता है।
पांव, संतान संबंधित, कलंक (मृत्युतुल्य कष्ट),
अपनो से विश्वास का धोखा आदि संबंधित परेशानी ।
(☝️ उपरोक्त स्थितियों अनुसार शास्त्र वचन सिद्ध हो रहा है।)
#विमर्श --- कुछ लोग (स्मार्ट वास्तुशास्त्री)कहते मिल जाते हैं,
कि आज के समय में ग्रंथों का कोई सूत्र कारगर नहीं है।
ग्रंथ जिस समय लिखे गए थे उस समय और आज का परिवेश (रहन सहन) स्थितियों में बहुत अंतर है।
हां, यह सत्य है।
लेकिन दोस्त,
मैं तो कहता हूं कि जिस मानसिक स्तर से ग्रंथ लिखे गए हैं,
क्या हमारा मानसिक स्तर उसके नजदीक भी पहुंच पाया है!!!
क्या शास्त्रानुसार (ढोंग, दिखावा, झूठ से हटकर)खुद भी कुछ जीवन जीने का प्रयास करते हैं?
और अपना नहीं ग्रन्थों का दोष देते हैं और स्मार्टनेश दिखाते हैं।
महत्वपूर्ण है कि आज के परिवेश अनुसार
ग्रंथ सूत्रों को देखने का आपका नजरिया क्या है?
पोस्ट लम्बा हो रहा है, समय मिलने पर फिर अगली चर्चा करते हैं, आपका मित्र वास्तु विद्यार्थी उपेंद्र कुमार पटना (बिहार)
#निर्माण #मकान #घर #वास्तु #निरीक्षण