geeta updesh

geeta updesh Hamesha sachchayi ki rah me chalo,
dharm ka sath do

22/03/2025
13/12/2021

राम राम आप सभी को

Shree Krishna
12/11/2018

Shree Krishna

28/02/2017

12. युधिष्ठिर पांड्वो में सबसे समझदार था और उसे धर्मराज कहते थे | धर्मराज युधिष्ठिर ने कौरवो और पांड्वो के बीच विवाद खत्म करने के लिए अपने भाइयो को कहा “भाइयो मै युद्ध की संभावनाओ को समाप्त करने के लिए प्रतिज्ञा लेता हु कि मै तेरह वर्ष तक अपने भाई बंधुओ से विवाद नही करूंगा और आपस में मनमुटाव नही होने दूंगा , अपने कौरव भाइयो और दुर्योधन की बाते कभी नही टालूंगा और सदैव उनके खे अनुसार काम करूंगा “| युधिष्ठिर की इस प्रतिज्ञा पर सभी भाई सहमत हो गये थे |
दुसरी तरफ दुर्योधन पांड्वो के वैभव से इर्ष्या कर रहा था कि उसने पड़ोसी राज्यों से मित्रता कर अपने साम्राज्य का विस्तार कर दिया | अब उसने अपनी बैचेनी को अपने मामा शकुनि को बताई | शकुनि ने भी दुर्योधन को पांड्वो के विरुद्ध ना जाने की सलाह दी और कहा “दुर्योधन तुम इतना चिंतित क्यों हो रहे है तुम्हारे पास इतना सारा साम्राज्य है तो तुम्हे पांड्वो से इर्ष्या क्यों है तुम्हारे पक्ष में भीष्म पितामह ,द्रोणाचार्य और अस्व्थामा जैसे शूरवीर हैजिनकी सहायता से तुम विश्व विजयी बन सकते हो , फिर भी तूम इतने दुखी क्यों हो ” |
मामा शकुनि की बात सुनकर दुर्योधन ने कहा कि “अगर हमारे पास इतनी ताकत है तो हम इन्द्रप्रस्थ पर आक्रमण क्यों ना कर दे और पांड्वो से राज्य छीन ले “| मामा शकुनि ने दुर्योधन को समझाया कि “दुर्योधन जोश में होश मत गवाओ , पांडवो पर जीत पाना उतना आसान नही है क्योंकि वो भी कुरु वंश के है अगर फिर भी तुम उनसे लड़ना चाहते हो तो मेरे पास एक उपाय है जिससे बिना युद्ध के ही हम उनसे उनका राज्य छीन सकते है ” | मामा शकुनि की बात सुनकर दुर्योधन उद्दिग्न हो गया और शकुनि से उपाय के बारे में पूछा |
मामा शकुनि ने कहा “दुर्योधन जैसा कि तुम जानते हो युधिष्ठिर को चौसर का खेल खेलने का शौक है लेकिन खेल में वो मुझसे जीत नही सकता है क्योंकि मै एक मंझा हुआ खिलाड़ी हु , तुम युधिष्ठिर को खेल के लिए आमंत्रित करो , मै तुम्हारी तरफ से युधिष्ठिर के खिलाफ खेलूँगा और खेल में बिना युद्ध के सारा राज्य उनसे छीन लूँगा ” | मामा शकुनि की इस योजना को सुनकर दुर्योधन प्रफ्फुलित हो उठा और उसके मन में पांड्वो को पराजित करने की एक आस दिखी |
अब दुर्योधन और शकुनि राजा धृतराष्ट्र के पास गये और उनसे चौसर के खेल का आयोजन रखने का आग्रह किया | धृतराष्ट्र ने कहा कि वो विदुर की सलाह के पश्चात इसका निर्णय करेंगे लेकिन दुर्योधन को बिना पूछे इस खेल का आयोजन करने के लिए अपने पिता को बाध्य किया | अंत में धृतराष्ट्र को उनकी बात माननी पड़ी और उसें चौसर के खेल के आयोजन की घोषणा करवाई | विदुर को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने धृतराष्ट्र को बताया कि इस खेल से हमारे कुल का नाश हो जाएगा लेकिन पुत्र प्रेम में धृतराष्ट्र कुछ नही बोले | धृतराष्ट्र ने विदुर को युधिष्ठिर को खेल का न्योता देने को भेजा |
धृतराष्ट्र का आदेश मानते हुए विदुर पांड्वो के पास गये और चौसर का खेल खेलने का न्योता दिया | युधिष्ठिर ने चौसर के खेल को विवाद का जड़ बताया और इसके लिए विदुर जी की सलाह ली | विदुर जी ने कहा “मै भी जानता हु कि चौसर का खेल विवाद की जड़ होता है किन्तु राजा के आदेशनुसार मै केवल तुम्हे न्योता देने आया हु तुम आओ या ना आओ ये तुम्हारी इच्छा है ” | उस समय में न्योते पर ना जाने को अपमान माना जाता था इसलिए युधिष्ठिर को डर था कि उनके ना जाने से ही कही विवाद ना बन जाए | इसलिए युधिष्ठिर ने विदुर जी का न्योता स्वीकार कर लिया |
अब युधिष्ठिर अपने परिवार के साथ हस्तिनापुर पहुचे और रात को विश्राम करके अगले दिन सभा मंडप में पहुचे | अब सभा मंडप में बैठे शकुनि ने युधिष्ठिर को चौसर का खेल खेलने के लिए आमंत्रित किया | युधिष्ठिर ने मामा शकुनी को खेलने से मना कर दिया तो मामा शकुनि उस पर उपहास करने लगे कि हार जाने के डर से युधिष्ठिर चौसर का खेल नही खेल रहा है | युधिष्ठिर उनकी बाते सुनकर क्रोधित होकर खेल खेलने के लिए हां कर दी और अपन प्रतिद्वंद्वी का नाम पुछा |
दुर्योधन ने कहा कि उसकी जगह पर मामा शकुनि खेलंगे और दाव लगाने का काम वो स्वयं करेगा | युधिष्ठिर ने इसे अनुचित बताते हुए कहा कि एक के स्थान पर दुसरे का खेलना नियमो के विरूद्ध है | लेकिन उन्होंने बार बार उसको हार जाने की बात कहकर उसको खेलने के लिए प्रेरित कर दिया | अब सारे दर्शक और दरबारी सभा में उपस्थित हो चुके थे और सभी लोग बड़े चाव से खेल देखने को उत्सुक थे |
अब चौसर का खेल शुरू हुआ जिसमे सबसे पहले रत्नों आभूषण की बाजी लगी , फिर सोने जवाहरातो की , फिर रथो और घोड़ो की बाजी लगी | युधिष्ठिर इन तीनो दावो में मामा शकुनि से हार गये थे | इसके बाद धीरे धीरे खेल में युधिष्ठिर ने गाये-भैंसे , भेड़-बकरिया , दास-दसिया , रथ-घोड़े-हाथी , सेना और सैनिक , देश और देश की प्रजा भी हारते गये और सबको चौसर के खेल में खो बैठे | इतना ही नही पांड्वो को अपने आभुष्ण तक बाजी पर लगाने पड़े | अब मामा शकुनि ने पूछा “और कुछ बाकी है क्या ??” |
युधिष्ठिर ने अपने भाई नकुल की ओर इशारा करते हुए उसको भी दांव पर लगा दिया और शकुनि ने नकुल को भी चौसर में जीत लिया | इसके बाद युधिष्ठिर ने सहदेव को भी दाव लगा दिया और हार गये | अब शकुनि को संदेह हुआ कि युधिष्ठिर अब खेल खत्म ना कर दे तो उसने भीम और अर्जुन के लिए कहा कि “तुमने माद्री के पुत्रो का बलिदान तो दे दिया इसका मतलब अर्जुन और भीम माद्री के पुत्रो से ज्यादा मूल्यवान है ” | धूर्त शकुनि की चालो में आकर उसने पहले अर्जुन को डाव पर लगाया और अंत में भीम को भी दाव पर लगाकर दोनों को हार गये | अब युधिष्ठिर ने खुद को बाजी पर लगाने को कहा लेकिन शकुनी हारने वाला कहा था और अंत में उसने युधिष्ठिर को भी अधीन कर लिया |
अब मामा शकुनि ने पांचो पांड्वो को गुलाम कहकर पुकारा और भरी सभा में उनका उपहास किया | अब शकुनि ने युधिष्ठिर से अपनी पत्नी द्रौपदी को दांव पर लगाने के लिए उकसाया और नशे में चूर युधिष्ठिर ने अपने पत्नी द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया | युधिष्ठिर के इस फैसले को सुनकर सभी दरबारी युधिष्ठिर पर धिक्कार करने लगे लेकिन युधिष्ठिर खुद भी इस बाजी के लिए अपने आप को बहुत कोस रहा था लेकिन मुह से निकले हुयी बात वापस नही जाती | फलस्वरूप शकुनि ने बाजी फिर जीत ली |
अब दुर्योधन ने विदुर जी को आदेश दिया कि वो द्रौपदी को सभा में लेकर आये लेकिन क्रोधित विदुर जी ने दुर्योधन को भरी सभा में फटकारा “मुर्ख , तू अपनी मृत्यु को न्योता देने चला है तुम नही जानते कि तुम्हारा विनाश नजदीक है , मै धर्मराज युधिष्ठिर को भी इसका दोषी मानता हु कि इनको द्रौपदी को डाव पर लगाने का कोई अधिकार नही है ” | अब दुर्योधन ने क्रोधित होकर सारथी प्रतीकामी को द्रौपदी को लाने को कहा | प्रतिकामी आज्ञा पाकर द्रौपदी को लेने रनवास गया और उनको चौसर के खेल की सारी घटना बताई |
द्रौपदी ने प्रतिकामी को कहा “क्या मै उनकी दासी हु जो वो मुझे आदेश देने लगे , आर्यपुत्र तो एक धर्मराज है और अपनी पत्नी को तो दांव पर तो कोई अधर्मी भी नही लगा सकता , तुम वापस लौट जाओ और मुझे हार जाने वाले उस जुआरी से कहो कि वो पहले अपने आप को हारा था या मुझे , इस प्रश्न का उत्तर जाने बिना मै वहा नही जा सकती , मेरे प्रश्न का उत्तर लेकर आओ और मुझे ले चलो ” | द्रौपदी की बात सुनकर प्रतिकामी वापस लौट गया |
राजपाट सब हारकर , हारे भाई चार , दास बने दासी बनी , पांचाली सी नार
जुआ बुरा है खेलना , करे बुद्धि का नाश ,धर्मराज का धर्म भी , बंधा जुए के पार
अब प्रतिकामी ने दुर्योधन को द्रौपदी की कही हुयी बात कही तो दुर्योधन ने प्रतिकमी को कहा कि वो द्रौपदी को जाकर कहे कि इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए वो स्वय सभा में आये | प्रतिकामी वापस पांचाली के पास गया और उसने दुर्योधन की कही बात सुनाई |
द्रौपदी ने फिर प्रतिकामी को कहा “वहा जाकर दुर्योधन से कहो कि द्रौपदी केवल अपने बडो के आदेश का पालन करेगी , यदि पितामह यही चाहते हो कि कुरु राजघराने की लाज द्यूतक्रीड़ा में आये तो मै अवश्य चलूंगी , यदि जयेष्ट पिताश्री महाराज धृतराष्ट्र की आज्ञा हो तो मै अवश्य पालन करूंगी |, यदि काकाश्री विदुर इसे उचित मानते है मै वहा अवश्य आउंगी ,परन्तु यदि ये लोग यदि नही चाहते तो मै वहा नही चलूंगी ” | प्रतिकामी को मालुम था कि दुर्योधन उसे वापस भेज देगा फिर भी कुल की मर्यादा के लिए वो वापस लौट आया |द्रौपदी के दो बार बुलावा भेजने पर भी नही आने पर दुर्योधन ने अपने भाई दुशाशन को भेजा | दुशाशन रनवास गया और द्रौपदी को बलपूर्वक बाल खीचते हुए घसीटते हुए सभा में लेकर आ गया |
पार कर गया पाप की , हर सीमा को नीच
कुल मर्यादा खीचता , भरी सभा के बीच
अब दुर्योधन ने दुशाशन को कहा कि वो द्रौपदी को उसकी जंघा पर बिठाये | सभी पांडव मन ही मन क्रोधित हुए लेकिन कुछ बोल ना सके और भीष्म पितामह तक सिर झुककर बैठे रहे | अब सभा में थोड़ी बहस हुयी और क्रोधित दुशाशन द्रौपदी की साड़ी को खीचने लगा तो द्रौपदी ने श्रीकृष्ण को याद किया | भगवान कृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचा ली और अब दुशाशन ज्यो ज्यो साड़ी को खीचता त्यों त्यों चीर बढता गया और अंत में थक हारकर दुशाशन नीचे गिर गया |
ऐसे क्षण को देखकर भीम क्रोधित हो गया और उसने दुशाशन की छाती चीरने का प्रण लिया | विदुर ने क्रोधित होकर उस सभा को मृतक लोगो की सभा कहा | द्रौपदी ने भरी सभा में कहा कि “इस निर्ल्लज और कायरो से भरी सभा में , मै द्रौपदी ,पांचाल नरेश की पुत्री , इन्द्रप्रस्थ नरेश की पत्नी और हस्तिनापुर नरेश की पुत्रवधू आप सबको श्राप देती है कि ” | इतना कहते ही गांधारी ने द्रौपदी को रोक लिया और दुर्योधन से कहा कि वो अपनी माता के वस्त्रहरन का आदेश दुशाशन को दे | दुर्योधन चुप हो गया |
गूंज उठी आकाश में , नारी की आवाज सन्नाटा सा छा गया , बीच सभा में आज
जो भी नारी जाति का , करता यु अपमान , उसका नाश अवश्य ही , कर देता भगवान
धृतराष्ट्र और गांधारी को अपने कर्मो का पछतावा हुआ कि उन्होंने विदुर की बात ना मानते हुए पुत्र प्रेम में अपनी सन्तान को नही मारा और आज उनको ये दिन देखना पड़ रहा | गांधारी की वजह से द्रौपदी ने श्राप नही दिया |धृतराष्ट्र ने द्रौपदी एवं पांड्वो को शांत कर चौसर में हारी सारी बाजियों को ले जाने को कहा | धृतराष्ट्र की मीठी बातो से पांडव शांत हो गये | अब पांडव भीष्म पितामह के पास कौरवो के अपमान के विरोध में प्रतिशोध लेने को कहा लेकिन भीष्म पितामह के समझाने पर वो बिना विरोध किये उस समय इन्द्रप्रस्थ के लिए रवाना हो गये |
एक ओर प्रतिशोध है , एक ओर अपमान , भीष्म घिरे है बीच में , गहरी नदी समान
नारी के अपमान से ,गिरी सभ्यता आज , हारजीत के खेल में , गयी वंश की लाज
बिना कोई परिणाम के पांड्वो के चले जाने पर दुर्योधन बहुत क्रोधित हुआ और उसने धृतराष्ट्र से इन्द्रप्रस्थ के खिलाफ युद्ध करने की धमकी दी और विकल्प के तौर पर एक बार ओर चौसर खेलने का प्रस्ताव दिया जिसमे खेल हारने वाले को बारह वर्ष वनवास और एक वर्ष अज्ञातवास रहना पड़ेगा | यदि एक वर्ष के अज्ञातवास में उनका पता चल जाएगा तो फिर बारह वर्ष वनवास जाना पड़ेगा | धृतराष्ट्र युद्ध के मुकाबले पांड्वो के वनवास को बेहतर मानते हुए चौसर खेलने की अनुमति दी | धृतराष्ट्र के कहने पर युधिष्ठिर को मजबूरी में चौसर खेल खेलना पड़ा |फिर से शकुनि ने चाले चली और युधिष्ठिर हार गया और शर्त के अनुसार वनवास को निकल गये |
लेख विधि का ना टले , कर लो लाख उपाय , धर्मराज ने आज फिर , सब कुछ दिया लुटाय

28/02/2017

11. पांडव लाक्षागृह से निकलकर जंगलो से होते हुए एकचक्रनगर पहुच गये थे और ब्राह्मणों के वेश में भीक्षा मांगकर जीवन व्यतीत कर रहे थे | उधर पांचाल नरेश ने अपने पुत्री द्रौपदी के स्वयंवर की तैयारिया आरम्भ कर दी थी | पांचाल नरेश दुपद ने पहले द्रौपदी का विवाह अर्जुन से करवाने की इच्छा थी किन्तु उनकी मृत्यु की खबर सुनकर उसने स्वयंवर का आयोजन किया था | स्वयंवर की सुचना मिलते ही पांडव ब्राह्मणों की मंडली के साथ एकचक्रनगरी से पांचाल के लिए रवाना हो गये | बढी हुयी दाढी और केशो के साथ ब्राह्मण के वेश में उन्होंने पांचाल प्रदेश में प्रवेश किया ताकि कोई उन्हें पहचान ना सके |
द्रुपद ने स्वयंवर की सारी तैयारिया कर राखी थी जिसमे मंडप के मध्य में एक धनुष पड़ा हुआ था और उसके उपर एक सोने की मछली टंगी हुयी थी | एक यंत्र के माध्यम से वो मछली तीव्र वेग से घूम रही थी | राजा द्रुपद ने अब स्वयंवर की घोषणा करते हुए कहा “जो भी राजकुमार उस धनुष से नीचे पानी के प्रतिबिम्ब में देखते हुए घुमती हुयी मछली की आंख पर तीर लगा देगा , उसके गले में मेरी पुत्री द्रौपदी वरमाला डालकर अपने वर का चयन करेगी ” | इस स्वयंवर में दूर दूर से पराक्रमी राजकुमार आये थे जिसमे सभी कौरव , जरासंध , शिशुपाल और श्रीकृष्ण भी शामिल थे | अब हाथी पर विराजमान होकर द्रौपदी अपने भ्राता के साथ स्वयंवर स्थल पर आयी |
अब स्वयंवर प्रारंभ हुआ और एक एक करके राजकुमार आते गये और लक्ष्य को प्राप्त करने में असफल रहे | कई शूरवीर और पराक्रमी राजकुमार भी इस स्वयंवर में पराजित होकर अपमनित हुए जिसमे दुर्योधन , जरासंध और शिशुपाल जैसे योद्धा भी थे | अब कर्ण की बारी आयी तो सभा में उत्साह फ़ैल गया क्योंकि कर्ण भी एक महान धनुर्धर था | कर्ण ने धनुष उठाकर प्रत्यंचा चढ़ानी शुरू कर दी लेकिन अंत में धनुष उनके हाथ से उछलकर उनके मुह पर लग गया | अपमानित कर्ण भी वापस अपने स्थान पर जाकर बैठ गया |
अब ब्राह्मणों की मंडली के मध्य से एक ब्राह्मण निकला जो अर्जुन था लेकिन उसको उसके वेश के कारण उसको कोई पहचान नही पाया था | अब अर्जुन से धनुष हाथ में लेकर प्रत्यंचा चढ़ा दी और धनुष से तीर लगाने के लिए तैयार हो गया | उसे देखकर सभी दरबारी स्तब्ध रह गये कि एक ब्राह्मण ने कितनी वीरता से धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दी | अब अर्जुन ने धनुष चलाया और उसका तीर सीधा मछली की आंख में लग गया और उसे देखते ही उत्साहित सभा उसके सम्मन में खडी हो गयी और उसके प्रशंशा करने लगी |
अब द्रौपदी ने शर्त के अनुसार ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन के गले में वरमाला डाल दी | ये सुचना अपनी माता को सुनाने के लिए युधिष्ठिर , नकुल और सहदेव चले गये लेकिन भीम अपने भाई की रक्षा के लिए वही खड़ा रहा | अब राजकुमारों के बीच हलचल मच गयी कि एक ब्राह्मण किस तरह ये स्वयंवर जीत सकता है | इस विप्लव को कम करने के लिए श्रीकृष्ण प्रयास करने लगे और उधर भीमऔर अर्जुन द्रौपदी को साथ लेकर अपनी माता के पास कुटिया की ओर चल दिए |
इस बात की सुचना जब द्रुपद के पुत्र और द्रौपदी के भाई दृष्टधूमं को पता चली तो वो उनके पीछे चला गया | दृष्टधूमं ने अनुमान लगा लिया था कि वो पांडव ही थे क्योंकि उन्होंने कुटिया में कुंती को पहचान लिया था | ये सुचना लेकर वो अपने पिता द्रुपद के पास पहुचा | अब राजा द्रुपद के बुलावे पर पांडव द्रौपदी और माता कुंती के साथ राजभवन पहुचे | युधिष्ठिर ने द्रुपद को अपना वास्तविक परिचय दिया उर द्रुपद खुशी से फुले नही समाये क्योंकि उनकी इच्छा अनुसार अर्जुन के साथ द्रौपदी का विवाह हो गया था | अब माता की आज्ञा और सबके सम्मति से द्रौपदी का विवाह पांचो भाइयो से हो गया |
द्रौपदी के स्वयम्वर की खबर जब हस्तिनापुर में विदुर तक पहुची तो वो बहुत प्रस्सन हुए | विदुर ने पांड्वो के जीवित होने और द्रौपदी स्वयंवर की खबर धृतराष्ट्र को सुनाई और वो बहुत प्रसन्न हुए | उधर दुर्योधन को जब पांड्वो के जीवित होने की खबर पता चली तो उसके क्रोध की सीमा नही रही | उसको पता चला कि पांडव लाक्षागृह से एक सुंरग के माध्यम से निकलर सुरक्षित वन में चले गये थे और एक वर्ष के अज्ञातवास के पश्चात पांचाल नरेश के पुत्री द्रौपदी से विवाह कर ओर अधिक शक्तिशाली हो गये है | अब दुर्योधन के मन में पांड्वो के प्रति इर्ष्या ओर ज्यादा बढ गयी थी और फिर से पांड्वो के विनाश की योजना में लग गया |
दुर्योधन को पता लग गया कि पांड्वो को राजनीति का काफी अनुभव हो गया और उसका साथ कोई नही छोड़ेगा | अब भीष्म पितामह ने दुर्योधन को पांड्वो से संधि कर आधा राज्य देने को कहा लेकिन दुर्योधन ऐसा बिलकुल नही चाहते थे | उन्होने द्रोणाचार्य से सलाह ली लेकिन उन्होने भी दुर्योधन को यही सलाह दी और उन्होंने बताया कि यदि उन्होंने ऐसा नही किया तो कौरवो का विनाश होगा | विदुर से सलाह लेने पर भी वही बात की | अंत में दुर्योधन को सबकी सलाह के अनुसार पांड्वो को आधा राज्य देने के लिए विवश होना पड़ा | अब द्रुपद के पास रह रहे पांड्वो को हस्तिनापुर आकर आधा राज्य देने की सूचना पहुची |
अब हस्तिनापुर में उनके पांड्वो के स्वागत की तैयारिया प्रारभ हो गयी | अब युधिष्ठिर का राज्याभिषेक कर उनको आधा राज्य सौंप दिया | धृतराष्ट्र की सलाह पर पांड्वो ने खांडवप्रस्थ को अपनी राजधानी बना ली ताकि पांड्वो और कौरवो के बीच द्वेष ना रहे | खांडवप्रस्थ उस समय एक बहुत पुराना नगर था जिस पर उनके पूर्वज राज करते थे | पांड्वो ने उस नगर का पुनर्निर्माण करवाकर उस नगर का नाम बदलकर इन्द्रप्रस्थ रख दिया और सुखपूर्व पांडव , द्रौपदी के साथ और माता कुंती के साथ उस नगर पर राज करने लग गये |

28/02/2017

10. पांड्वो के निरंतर बढ़ते बल कौशल को देखकर दुर्योधन चिंतित होने लगा और पांड्वो का विनाश करने की योजना बनाने लगा | दुर्योधन की हर योजना में मामा शकुनि और कर्ण उनके साथ रहते थे और पुत्र प्रेम के कारण धृतराष्ट्र भी उनका साथ देते थे | पांड्वो की लोकप्रियता के चलते जनता युधिष्ठिर को सिंहासन पर देखन चाहते थे | जनता के अनुसार धृतराष्ट्र के अंधे होने के कारण छोटे भाई पांडू ने राजपाट संभाला था और पांडू की मृत्यु ले पश्चात अब युधिष्ठिर सिंहासन का योग्य उत्तराधिकारी है| भीष्म पितामह भी जनता के फैसले से सहमत थे लेकिन आंतरिक कलहो के कारण चुप थे |
एक दिन दर्योधन ने धृतराष्ट्र से कहा कि “पिताश्री , आप जानते है कि आपके नेत्रहीन होने के कारण आप जयेष्ट होते हुए भी राज सिंहासन पर नही बैठ सके और आपके छोटे भाई पांडू को सारी सत्ता मिल गयी थी , अब यदि वापस युधिष्ठिर सिंहासन पर बैठ जाएगा तो सदैव के लिए हम राजसिंहासन से वंचित रह जायेंगे और हम इस अपमान को सहन नही कर सकते है ” | धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को समझाया कि युधिष्ठिर धर्म का पालन करता है और उसके पिता की तरह गुणवान है इसलिए जनता उनकी प्रिय है और उसके विरुद्ध कोई कदम लेना अनुचित होगा | लेकिन दुर्योधन मानने वाला कहा था और उसने पांड्वो का विनाश करने की योजना बनाई |
योजना के अनुसार दुर्योधन ने पांड्वो को बहला फुसलाकर वारणावत के मेले में भेजने की योजना बनाई | उसने पांड्वो को मेले की भव्यता और शोभा की गाथा सुनाकर वारणावत जाने के लिए उत्सुक किया | अंत मर पांड्वो ने खुद धृतराष्ट्र से मेले एम् जाने की अनुमति माँगी | अब सभी पांडव माता कुंती के साथ वारणावत के लिए प्रस्थान कर गये | उधर दुर्योधन पांड्वो को योजनानुसार वारणावत भेजकर प्रफुल्लित हो रहा था | अब आगे की योजना के लिए दुर्योधन ने अपने मंत्री और शिल्पकार पुरोचन को बुलाया और उसे गुप्त योजना की जानकारी दी | पुरोचन दुर्योधन की योजना के अनुसार काम सफलतापूर्वक समाप्त करने का वचन देकर वारणावत के लिए रवाना हो गया |
पुरोचन एक गुप्त मार्ग और शीघ्रगामी रथ से पांड्वो से पहले वारणावत पहुच गया और योजना में लग गया | योजना के अनुसार पुरोचन को एक लाख और ज्वलनशील पदार्थो से मिलकर एक महल बनवाना था जिसमे रात्री के समय पांड्वो के सो जाने के पश्चात आग लगा देने की योजना थी | दुर्योधन के आनुसार इस योजना से कौरवो पर संदेह बिना पांड्वो का नाश हो जाएगा |
उधर पांडव वारणावत पहुच चुके थे और लाक्षागृह का निर्माण पूरा ना होने से पहले उन्हें किसी अन्य महल में रखा गया था | विदुर जी को दर्योधन के षडयंत्र का पता चल गया था और इस योजना की जानकारी गुप्त रूप से उन्होंने युधिष्ठिर तक पंहुचा दी थी | युधिष्ठिर को सारी योजना की खबर होते हुए भी कौरवो के कथनानुसार चल रहे थे | वारणावत पह्चुने पर उनका ग्रामवासियों ने भव्य स्वागत किया और मेले का आनन्द लेने लगे | उधर पुरोचन एन अब लाक्षागृह तैयार करवा दिया था और पांड्वो को अब लाक्षागृह में ले जाया गया | भवन में प्रवेश करते ही युधिष्ठिर ने पुरे महल को ध्यान से देखा और विदुर की सुचना उनको सत्य लगी जिसके अनुसार ये महल ज्वलनशील पदार्थो से बना था जो शीग्र समाप्त होने वाला था |
युधिष्ठिर ने अपने सभी भाइयो की इसकी सुचना दी और उनको विचलित ना होने का आश्वासन दिया | युधिष्ठिर ने पांड्वो को समझाया कि “पुरोचन को तनिक भी ये पता नही लगना चहिये कि उसकी योजना का हमे पता लग गया है | हम यहा समय आने पर भाग निकलेंगे लेकिन हमे भी ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे पुरोचन को संदेह ना हो ” | अब विदुर जी ने एक सुरंग बनाने वाला कारीगर वारणावत भेजा जिसें गुप्त रूप से पांड्वो से भेट की | पांड्वो ने उस कारीगर को सांकेतिक भाषा में अपनी योजना बताई और जिसके अनुसार उसको महल के भीतर से बाहर की और एक गुप्त सुरंग का निर्माण करना था |
अब वो कारीगर अपने साथोयो के साथ पहरेदारो के वेश में अंदर आ गये और सुरंग निर्माण का कार्य प्रारभ कर दिया | कारीगरो ने दिन रात मेहनत कर कुछ दिनों में ही पांडव महल से जंगल तक एक सुरक्षित सुरंग का निर्माण कर दिया था | पांड्वो और कारीगरों ने इस कार्य को इतनी सावधानी से किया कि पुरोचन को इस बारे में भनक भी नही लगी | पुरोचन भी महल के द्वार पर रहने लग गया और पांड्वो पर नजर रखने लगा | एक दिन पुरोचन को योजना को पूरा करने के लिए सही अवसर मिल गया और युधिष्ठिर भी उसके हाव भाव से उसके इरादों को भांप गया था |
अब युधिष्ठिर के कहने पर माता कुंती ने एक मह्भोज का आयोजन किया जिसमे सभी ग्रामवासियों को भोजन कराया गया | भोजन का आनद लेकर पुरोचन सहित उसके सभी सैनिक गहरी नींद में सो गये | अब युधिष्ठिर के कहने पर भीम ने पुरे लाक्षागृह में अलग अलग जगह पर जाकर पुरे महल में आग लगा दी और अंत में पांडव महल में आ गये | अब पांडव माता कुंती के साथ उस सुरंग से होते हुए लाक्षागृह से बाहर निकलकर वन में आ गये थे | उधर लाक्षागृह पुरी तरह जलकर ख़ाक हो गया और उस भवन में पुरोचन सहित कौरवो एक सभी सैनिक आग में जलकर भस्म हो गये | स्थानीय जनता पांड्वो के भवन में आग देखकर इसका दोषारोपण कौरवो पर थोपने लगे |
अब हस्तिनापुर तक लाक्षागृह की सुचना पहुच गयी थी कि पांड्वो के महल में भीषण आग से कोई भी पांडव शेष नही बचा | इस सुचना को सुनते ही दुर्योधन मन ही मन तो बहुत प्रसन्न हुए लेकिन जनता के समक्ष पांड्वो की मृत्यु का शौक मनाया | कौरवो ने कुंती और पांड्वो को जलांजलि दी और विलाप करते हुए महल में लौट गये | विदुर जी ने शोक को मन में दबा दिया था क्योंकि उन्को पूर्ण विश्वास था कि पांडव लाक्षागृह से सुरक्षित निकल गये होंगे | पितामह भीष्म भी शोक के सागर में डूब गये थे लेकिन विदुर ने केवल उनको पांड्वो के लाक्षागृह से बचाव की योजना बताकर चिंतामुक्त कर दिया था |
उधर पांडव और कुंती लाक्षागृह को जलता छोडकर जंगल में आ गये थे और इस सारे प्रयासों में काफी थक गये थे | केवल भीम ही एकमात्र शक्तिशाली इन्सान था जिसको थकन नही आती थी | उसने अपनी माता और भाइयो को अपने कंधो पर बिठाकर उन्मत हाथी की तरह चलते हुए जंगल में काफी दूर निकल गये जहा वो सुरक्षित रहे | अब वो गंगा तट पर पहुच गये जहा विदुर ने उनकी सहायता के लिए नाव भेज रखी थी | केवट उनको नाव में बिठाकर सुरक्षित स्थान तक पंहुचा दिया |
अब पांडव और कुंती उस जंगल में रात बिताई | अगले दिन उन्होंने सोचा कि अब पेट भरने के लिए कुछ तो प्रयास करना पड़ेगा तो कुंती ने सभी भाइयो ब्राह्मण का वेश धारण कर निकट के गाँव से भिक्षा मांग कर लाने को कहा | पांचो भाई भिक्षा में जो भोजन लाते उसका आधा हिसा भीम को और बचे आधे हिस्से के पांच भाग कर चारो भाइयो को देकर खुद भी खा लेती थी | भीम की भूख कभी खत्म ही नही होती थी और भोजन उसके लिए बहुत कम पड़ जाता था इसलिए भीम ने एक कुम्हार से मित्रता कर घड़े बनाने का कार्य शुरू कर दिया | इस तरह सभी पांडव और माता कुंती वन में जीवन व्यतीत करने लगे |

28/02/2017

9. हस्तिनापुर लौटने के बाद कौरव और पांडव साथ साथ रहने लगे | बचपन में वो सभी साथ साथ खेला करते थे और जीवन का आनन्द लिया करते थे | पांचो पांड्वो एम् भीम अपने बलशाली शरीर के कारण बहुत उदंड प्रुवती का था जो सदैव दुर्योधन को परेशान करता रहता था | हालांकि उसके मन में कोई द्वेष भाव नही था वो तो केवल मस्ती किया करता था लेकिन भीम की हरकतों से दुर्योधन और उसेक भाइयो के मन में भीम के प्रति द्वेषता बचपन से ही उत्त्पन हो गयी थी | अब पांडव और कौरव दोनों गुरु कृपाचार्य से अस्त्रों और शाष्त्री की शिक्षा लेते हुए बड़े हुए | शिक्षा के मामले में पांडव सदैव कौरवो से आगे रहते थे इसलिए कौरवो के मन में उनके प्रति जलन होने लगी थी ||
एक बार कौरवो ने भीम को सबक सिखाने की योजना बनाई | योजना के अनुसार भीम को गंगा में डुबाकर उसके भाइयो को बंदी बनाना उनका उद्देश्य था | दुर्योधन का सोचना था कीपिंग ऐसा करने पर हस्तिनापुर का साम्राज्य उनके हाथ में आ जाएगा | इस योजना के अनुसार एक दिन जब सभी कौरव पांडव नदी में खेल रहे थे और खेलने के बाद भोजन का आयोजन था | दुर्योधन ने चालाकी से भीम के भोजन में मदिरा मिला दी | दुसरे सभी भाई तो थक हारकर अपने डेरो पर चले गये लेकिन मदिरा के नशे में भीम वही नदी किनारे रेत में लौटता रहा | दुर्योधन ने भीम की इस हालत का फायदा उठाकर उसके हाथ पैर बांधकर गंगा में प्रवाहित कर दिया |
अब कौरव वापस डेरो में लौटकर भीम की मृत्यु का उत्साह मना रहे थे | तभी पांड्व जगे और उन्होंने भीम को डेरे में ना देखकर उसे खोजने के लिए निकल पड़े | चारो भाई उस स्थान पर गये जहा वो तैराकी कररहे थे | भीम का कही पर भी पता नही चला और अंत में निराश होकर वापस महल में लौट आये | कुछ देर बार भीम नाचता कूदता वापस महल में आ गया और पांड्वो की खुशी का ठिकाना नही रहा और उनके भीम के खो जाने के लिए दुर्योधन पर संदेह हुआ था क्योंकि वो ही भीम से सबसे ज्यादा बैर रखता था | अब कुंती ने ये बात विदुर जी को बताई और इसका उपाय ढूंढने को कहा |
विदुर जी में कहा इसका कोई उपाय तो नही है लेकिन दुर्योधन को आप जितना उत्तेजित करेंगे उसका देवश भाव उतना ही बढ़ता जाएगा इस्लिएय उनसे दूर रहने में ही भलाई है | अब उत्तेजित भीम को युधिष्टर ने धीरजता से समझाया कि अभी अपना क्रोध संभाल के रखो ओर समय आने पर इसका उपयोग करना जिससे पांडू पुत्र सुरक्षित रह सकेंगे | दुसरी तरफ दुर्योधन भीम के वापस लौटने पर आश्चर्यचकित हो गया और उसने पांड्वो को खत्म करने की दुसरी योजना में लग गया |

28/02/2017

8. यदुवंश के प्रसिद्ध राजा शूरसेन श्रीकृष्ण के पितामह थे जिनके पृथा नामक एक पुत्री थी | उधर शूरसेन क फुफेरे भाई कुन्तिभोज के कोई सन्तान नही थी इसलिए शूरसेन ने कुतिभोज को वचन दिया कि उनकी पहली सन्तान को को उन्हें गोद दे देंगे | फलस्वरूप पृथा शूरसेन की पहली पुत्री थी जिसे कुन्तिभोज ने गोद दे लिया जिसके बाद पृथा का नाम कुंती पड़ गया | एक बार कुंती के यहा ऋषि दुर्वासा पधारे और कुंती ने उनकी खूब सेवा की | उनकी सेवा से प्रसन्न होकर ऋषि दुर्वासा ने कुंती को आशीर्वाद दिया कि वो जिस भी देवता का ध्यान करेगी उसके समान ही पुत्र का जन्म होगा |
अब कुंती ने सूर्यदेव का ध्यान किया और उसने सूर्य के समान तेजस्वी बालक को जन्म दिया जो आगे चलकर महाभारत के युद्ध में कर्ण के नाम से प्रसिद्ध हुआ | कर्ण के जन्म के पश्चात लोक निंदा के डर से कुंती ने बच्चे को एक टोकरी में रखकर गंगा नदी में बहा दिया | गंगा की धारा में उस टोकरी पर अधिरथ नामक सारथी की नजर पड़ी और उसको उस टोकरी में सूर्य के समान तेजस्वी बालक नजर आया | अधिरथ के उस समय कोई सन्तान नही थी इसलिए वो उसको अपने घर पर लर गया और पुत्र की तरह पाला |
दुसरी तरफ कुंती विवाह के योग्य हो गयी थी इसलिए उनके पिता कुंतीभोज ने एक स्वयम्वर का आयोजन किया | उनके स्वय्म्न्वर में अस पडोस के सभी राज्यों से राजकुमार आये थे | इसके साथ ही हस्तिनापुर के राजा पांडू भी उस स्वयंवर में शरीक हुए थे | उस स्वयंवर में कुंती ने पांडू को अपना वर चुना और उनके गले में वरमाला डाल दी | राजा पांडू का कुंती से विवाह हो गया और वो दोनों हस्तिनापुर वापस लौट गये | राजवंश में राजा एक से अधिक विवाह करते थे इसलिए पांडू ने भीष्म पितामह के कहने पर मद्रराज की पुत्री माद्री से भी विवाह कर लिया |
एक दिन राजा पांडू वन में आखेट के लिए गये | उनको वन में हिरणों का एक जोड़ा दिखा जो वास्तव में हिरण नही बल्कि एक ऋषि दम्पति थे | राजा पांडू इस बात से अनभिज्ञ था और उसने अपने तीरों से दोनों ऋषि दम्पति को मार दिया | दोनों हिरणों के तीर लगते ही दोनों मनुष्य रूप में आ गये और क्रोधित होकर मृत्यु से पूर्व उन्होंने पांडू को श्राप दे दिया कि जब भी वो अपनी पत्नियों के साथ अन्तरंग होंगे उनकी मृत्यु हो जायेगी | ऋषि के श्राप से पांडू दुखी होकर राजपाट अपनी पत्नियों को सौंपकर वन में ब्रह्मचर्य जीवन बिताने चले गये |कुंती को पता था कि महाराज पांडू को सन्तान की लालसा तो है लेकिन ऋषि के श्राप से वो संतान उत्पन्न नही कर सकते है |
अब कुंती ने विवाह से पूर्व ऋषि दुर्वासा के वरदान को याद करते हुए कुंती ने देवताओ को याद किया और उसके अनुग्रह पर तीन पांड्वो यमराज के अनुग्रह पर युदिष्ठर , वायुदेव के अनुग्रह पर भीम और इंद्रदेव के अनुग्रह पर अर्जुन का जन्म हुआ | अब कुंती ने माद्री को भी वन में रहकर मन्त्रो को उसके साथ बाट दिया था फलस्वरूप माद्री ने नकुल औ सहदेव को जन्म दिया |पांडू पुत्रो का जन्म वन में ही हुआ था और उनका पालन पोषण भी तपस्वियों ने ही किया था | महाराज पांडू भी अपनी पत्नियों के साथ कई वर्षो तक वन में रहे | एक दिन महाराज पांडू गलती से माद्री के साथ अन्तरंग हो गये और उनकी मृत्यु हो गयी | माद्री इस दुःख को सहन नही कर पायी और पांडू की मृत्यु का दोषी स्वयं को मानकर वो भी पांडू के साथ वो भी सती हो गयी |
इस घटना से कुंती और पांड्वो को बहुत दुःख हुआ और शोक से भर गये | अब वन के ऋषियों के समझाने पर पर वो पांड्वो के साथ हस्तिनापुर चली गयी | हस्तिनापुर के लोगो को जब महाराज पांडू की मृत्यु का पता चला तो जनता बहुत दुखी हुयी | अपने पौत्र की मृत्यु के शोक में सत्यवती अपनी दोनों पुत्रवधुओ अम्बिका और अम्बालिका को लेकर वन में चली गयी और तपस्या करते हुए स्वर्ग सिधार गयी |

28/02/2017

7. जब गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से हुआ तो उसने भी अपनी आँखों पर पट्टी बांधकर अपने पति के साथ अंधकार में रहने का वचन लिया था | गांधारी का ध्यान रखने के लिए उसका भाई शकुनी उन्ही के साथ रहा था | एक दिन ऋषि व्यास हस्तिनापुर में गांधारी से मिलने आये | गांधारी ने ऋषि व्यास का बहुत आदर सत्कार किया और उनकी सेवा में कोई कसर नही छोड़ी | ऋषि व्यास ने गांधारी की सेवा से प्रस्स्न्न होकर उससे वरदान मांगने को कहा | गांधारी ने 100 पुत्रो को पाने का वरदान माँगा जो उनके पति की तरह शक्तिशाली हो |ऋषि व्यास ने उसे वरदान दे दिया औरकुछ समय बाद गांधारी गर्भवती हो गयी लेकिन 2 वर्ष बीत गये उनके सन्तान नही हो रही थी |
गर्भावस्था के 2 वर्ष के बाद गांधारी ने बेजान मांस के ठोस टुकडो को जन्म दिया जिसमे से एक भी टुकड़े का कोई शरीर नही था | गांधारी ये देखकर बर्बाद हो गयी कि ऋषि व्यास के वरदान के अनुसार उसने 100 पुत्रो की कल्पना की थी | जब वो उन मांस के टुकडो को बाहर फेंकने के लिए जाने लगी तभी ऋषि व्यास आ गये और उन्होंने गांधारी से कहा कि उनका वरदान व्यर्त में नही जा सकता है | ऋषि व्यास ने गांधारी को घी से भरे 100 मिटटी के घड़े लाने को कहा | उन्होंने बताया कि वो इन मांस के टुकडो को 100 भागो में बराबर विभाजित कर इन घड़ो में डाल देंगे जिससे उनके 100 पुत्रो का जन्म हो जाएगा | गांधारी की इच्छा थी कि उनके एक पुत्री भी हो इसलिए व्यास ने 101 भाग करने को कहा |
अब व्यास ने उन मॉस के टुकडो को 101 भागो में विभजित कर दिया और सभी को घड़े में डाल दिया | अब 2 वर्ष के ओर इन्तेजार के पश्चात घड़े खुलने के लिए तैयार थे | जब पहला घड़ा खोला गया तो पहली सन्तान क जन्म हुआ जिसका नाम दुर्योधन रखा गया | जैसे जैसे घड़े खोलने पर बच्चे रोने लगे तो जंगल के जानवर गरजने लगे और कई अपशकुन हुए | विदुर ने कहा कि बच्चो का जन्म होते की अपशकुन होने से कुरु वंश पर विपदा आ जायेगी इसलिए बच्चो को त्याग देना चाहिए | विदुर जी ने कहा “शाश्त्रो में बताया गया है कि एक वंश की भलाई के लिए एक का बलिदान दिया जा सकता है और एक गाँव की भलाई के लिए वंश का त्याग किया जा सकता है , देश की भलाई के लिए गाँवों का बलिदान दिया जा सकता है और आत्मा के विकास के लिए पृथ्वी को भी बलिदान दिया जा सकता है ” |
इसलिए उन्होंने देश और मानवता की भलाई के लिए गांधारी को अपने पुत्रो का बलिदान देने को कहा | लेकिन गांधारी और धृतराष्ट्र अटल थे कि उनके पुत्र किसी को नुकसान नही पहुचाएंगे और विदुर करर इच्छा के विरुद्ध उन्होंने संतानों को अपना लिया | धृतराष्ट्र की एक वैश्य दासी सुखदा से उनके एक पुत्र का ओर जन्म हुआ जिसका नाम युयुत्सु था | अब गांधारी ने दुसरी संतानों को भी घड़े से बाहर निकाला और अब गांधारी के 100 पुत्र और एक पुत्री दुशाला थी | उनके सभी पुत्र शक्तिशाली योद्धा की तरह बड़े हुए | आइये अब गांधारी और धृतराष्ट्र के सारे पुत्रो के नाम आपको बताते है
दुर्योधन दुर्मर्शाना चित्र
युयुत्सु दुर्विशाहा चित्र
दुसाशन दुर्विमोचना सुवार्
विकर्ण दुशप्र्दर्षा सुदार्
विविन्स्ती दुर्जय धनुर्ग्रह
दुर्मुख दुशपराजय विव
दुशालन जैत्र सुबाहु
जालगंध भुरिवल नन्द
पोंगा रावी उपनंद
साहा जयत्सेन कृत
विंदा सुजाता वतवेग
अनुविन्धा स्रुत्वन निश
चित्रसेन स्रुतंत कवशि
दुर्द्रशा जय पास
दुर्मर्षा चित्र विकट
दुसाहा उपचित्र सोम
दुर्मदा चरुचित्र सुर्व्चश्
दुश्करण चिताक्ष धनुर्धर
दुर्धरा सरासन अयोब
अब गांधारी के पुत्रो का जन्म साम्राज्य के सिंहासन के लिए विवाद था क्योंकि युधिष्टर का जन्म दुर्योधन से पहले हुआ था | इसलिए बड़ा होने के नाते वंश का सबसे बड़ा पुत्र सिंहासन का उत्तराधिकारी होता है | कुरुक्षेत्र के युद्ध में कौरवो में युयुत्सु को छोडकर सभी मारे गये थे

Address

Salkhan

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when geeta updesh posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to geeta updesh:

Share

Category