20/05/2023
कबीर साहेब जी द्वारा गुरु धारण करने की लीला :-
परमेश्वर कबीर साहेब जी ने संसार की दृष्टि में एक मनुष्य की लीला की थी और इसी लीला के लिए उन्होंने गुरु बनाया था। संसार की दृष्टि में स्वामी रामानंद जी कबीर साहेब जी के गुरु थे किंतु वास्तविकता इसके विपरीत है। आइए जानते है इसके पीछे की सच्चाई को।
रामानंद जी का परिचय
ऋषि रामानंद मध्यकाल में प्रसिद्ध संत हुए थे। कबीर साहेब से भेंट के पहले तक रामानंद जी विष्णु जी के उपासक थे। स्वामी रामानंद जी पहुंचे हुए संत माने जाते थे जिनके कई शिष्य थे। रामानंद जी जाति और धर्म में भेदभाव भी किया करते थे। पूर्व जन्म में रामानंद जी विद्याधर ब्राह्मण थे जिन्हे परमेश्वर कबीर सत्य सुकृत नाम से मिले। त्रेतायुग में यही जीव आत्मा वेदविज्ञ नामक ऋषि हुए जिन्हें परमेश्वर पुनः लीलामय शरीर में मिले और उन्होंने परमात्मा को पुत्रवत प्रेम किया।
कबीर परमेश्वर द्वारा रामानंद जी को गुरु धारण करना
ऐसा संभव हो सका कबीर साहेब की लीला से। स्वामी रामानंद जी धानक जाति का शिष्य स्वीकार नहीं करते इसलिए कबीर साहेब ने कुछ ऐसी लीला की। हुआ यों कि कबीर साहेब ढाई वर्ष के बालक के रूप में ब्रह्म मूर्त (सुबाह सूर्य निकलने से पहले का समय) के समय गंगा घाट की सीढ़ियों पर लेट गए। जाते हुए रामानंद जी की खड़ाऊ शिशु रूप में लेटे कबीर साहेब के सिर पर लगी। कबीर साहेब जी ने रोने की लीला की और उन्हें गोद में उठाने के लिए जब रामानंद जी झुके तो उनके गले की कंठी माला (जो कि तुलसी के एक मनके की बनी होती थी) कबीर साहेब जी के गले में चली गई। रामानंद जी ने प्रेम से चुप कराते हुए कहा राम राम बोलो बेटा और इस तरह इस लीला के माध्यम से कबीर साहेब जी ने रामानंद जी को अपना गुरु चुना।
कबीर साहेब जी की रामानंद जी से भेंट
एक समय रामानंद जी के शिष्यों से हो रही चर्चा के दौरान जब शिष्यों ने ये सुना कि कबीर साहेब ने अपना गुरु रामानंद जी को बताया है तो वे उन्हें पकड़कर रामानंद जी के पास ले गए। कबीर साहेब जी की आयु उस समय 5 वर्ष थी। रामानंद जी ने उन्हें देखा और परिचय पूछा तो कबीर साहेब ने बताया कि वे स्वयं परमात्मा आए हुए हैं। तब रामानंद जी को यकीन नहीं हुआ और उन्होंने कहा कि वे अपनी साधना के पश्चात बात करेंगे और पर्दा लगाकर अपनी मनमुखी साधना करने लगे। रामानंद जी ठाकुर जी यानी अपने ईष्ट विष्णु जी की मानसिक पूजा किया करते थे यानि मूर्ति को मन ही मन नहलाते और उसका अभिषेक किया करते थे। उस दिन उन्होंने उन्हें विष्णु जी की मूर्ति को नहलाया, नए वस्त्र पहनाए और मुकुट धारण करवा दिया किंतु माला डालना भूल गए। अब वे बड़ी असमंजस में थे कि माला कैसे पहनाएं मुकुट ठाकुर जी के सर से उतारा नहीं जा सकता था क्योंकि ऐसा करने से पूजा खंडित होती है। मन ही मन वे दुखी हो रहे थे तब परदे के उस पार से कबीर साहेब जी ने कहा स्वामी जी आप माला की घुंडी खोलें और फिर मूर्ति को पहना दें। रामानंद जी ने ज्यों ही सुना त्यों ही वे भाव विभोर होकर उठे और स्वयं परदा अलग किया और कबीर साहेब को गले से लगा लिया। रामानंद जी ने कबीर साहेब को भगवान पुकारते हुए कहा कि हे प्रभु आपका शरीर रुई जैसा कोमल है। इस घटना को गरीबदास जी महाराज ने अपनी वाणी में बताया है।
स्वामी घुंडी खोलि करि, फिरि माला गल डार।
गरीबदास इस भजन कूं जानत है करतार ।।
ड्यौढ़ी पड़दा दूरि करि, लीया कंठ लगाय।
गरीबदास गुजरी बौहत, बदनैं बदन मिलाय।।
मनकी पूजा तुम लखी, मुकुट माल परबेश।
गरीबदास गति को लखै, कौन वरण क्या भेष ।।
यह तौ तुम शिक्षा दई, मानि लई मनमोर।
गरीबदास कोमल पुरूष, हमरा बदन कठोर।।
कबीर साहेब जी द्वारा रामानंद जी के आश्रम में दो रूप बनाना
तब रामानंद जी ने परमेश्वर कबीर से पूछा कि अब मुझे यकीन है आप ही पूर्ण ब्रह्म हैं किंतु आपने मुझसे झूठ क्यों कहा कि मैंने आपको नामदीक्षा दी है। तब कबीर साहेब बोले पंचगंगा घाट पर जब आपके पैरों की खड़ाऊ मुझे लगी थी तब आपने ही मुझे यह नाम दिया था। तब रामानंद जी ने कहा कि वह तो बहुत छोटा बच्चा था। उसी समय परमेश्वर कबीर ने दूसरा रूप उसी ढाई वर्ष के बालक का बनाया और दो रूपों में खड़े हुए तथा कहा देखिए स्वामी जी क्या मैं ऐसा दिखता था? रामानंद जी ने कई बार इधर देखा और कई बार उधर आंखें मलमल कर देखा और देखते देखते ढाई वर्ष के बालक वाला रूप उड़कर कबीर साहेब के 5 वर्ष के शरीर में समा गया। तब रामानंद जी को कबीर साहेब जी ने वह मंत्र भी बताया जो वे सभी शिष्यों को जाप करने के लिए देते थे एवं वह कंठीमाला भी दिखाई जो रामानंद जी के गले से कबीर साहेब के गले में गई थी। तब रामानंद जी को यकीन हो गया कि कबीर साहेब साधारण आत्मा नहीं बल्कि स्वंय परमात्मा हैं।
रामानंद जी का सतलोक भ्रमण तथा भगवान की पहचान
रामानंद जी ने कबीर साहेब से ज्ञानचर्चा आरंभ की और उस तत्वज्ञान से उन्हें ज्ञात हुआ कि वे पूर्ण ब्रह्म की भक्ति नहीं कर रहे हैं। कबीर साहेब ने रामानंद जी से समाधिस्थ होने के लिए कहा। रामानंद जी युगों युगों से साधना करते आ रहे थे। वे समाधिस्थ हुए किंतु त्रिकुटी के आगे नहीं जा पा रहे थे। तब कबीर परमेश्वर त्रिकुटी में प्रविष्ट हुए और उन्हें सत्यनाम के जाप से त्रिकुटी से आगे सभी लोकों की सैर करवाते हुए और प्रत्येक की स्थिति से परिचित करवाते हुए सतलोक लेकर गए। रास्ते में अठासी हजार ऋषियों के खेड़े, ब्रह्मलोक, धर्मराय का लोक, अक्षर पुरुष के लोक आदि का परिचय करवाते हुए सतलोक लेकर गए। रास्ते में ब्रह्मलोक और काल निरंजन द्वारा बनाए गए नकली अलख लोक, अनामी लोक, अगम लोक का परिचय भी करवाया। इस प्रकार परमात्मा कबीर जी रामानंद जी के जीव को सत्यलोक लेकर गए। सतलोक में सभी आत्माओं का नूरी शरीर है जिसका प्रकाश 16 सूर्यों के प्रकाश जितना है। परमेश्वर कबीर जी का उस स्थान पर तेजोमय शरीर का प्रकाश इतना है कि उनके एक रोम कूप का प्रकाश करोड़ों सूर्य और चंद्रमा के प्रकाश से भी अधिक है। सत्यलोक में परमेश्वर कबीर जी श्वेत गुम्बद में विराजमान थे। कबीर साहेब ने जाते ही अपने रूप पर चंवर किया। रामानंद जी ने विचार किया कि कबीर साहेब जरूर परमात्मा के जो सफेद गुम्बद पर तेजोमय शरीर में विराजमान थे उनके सेवक होंगे। रामानंद जी के इतना सोचत ही रहे थी कि कबीर साहेब जी का शरीर तेजोमय शरीर में समा गया और चंवर अपने आप डुलता रहा। यह नज़ारा दिखाकर और अपनी वास्तविक स्थिति से परिचित करवाकर परमेश्वर कबीर साहेब ने रामानंद जी के जीव को पुनः शरीर में छोड़ा। रामानंद जी ने पूर्ण विश्वास किया कि उनके सामने लीला करता हुआ बालक पूर्ण परमेश्वर का अवतार है। रामानंद जी ने इसके पश्चात परमेश्वर कबीर साहेब से नामदीक्षा ली और सत्यलोक परमधाम को प्राप्त किया। इसका वर्णन आदरणीय गरीबदास जी महाराज ने इस प्रकार किया है -
बोलत रामानन्द जी सुन कबीर करतार ।
गरीबदास सब रूप में तुमही बोलनहार ।।
दोहु ठोर है एक तू, भया एक से दोय ।
गरीबदास हम कारणें उतरे हो मग जोय।।
तुम साहेब तुम सन्त हो तुम सतगुरु तुम हंस ।
गरीबदास तुम रूप बिन और न दूजा अंस।।
तुम स्वामी मैं बाल बुद्धि भर्म कर्म किये नाश।
गरीबदास निज ब्रह्म तुम, हमरै दृढ़ विश्वास ।।
कबीर साहेब का प्रकट दिवस
ना मेरा जन्म न गर्भ बसेरा, बालक बन दिखलाया।
काशी नगर जल कमल पर डेरा, वहाँ जुलाहे ने पाया।।
जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी के सानिध्य में आदरणीय कबीर साहिब जी के प्रकट दिवस पर 2-3-4 जून 2023 को तीन दिवसीय महासमागम का आयोजन किया जा रहा है। इस पवित्र अवसर पर तीन दिवसीय अखण्ड पाठ, विशाल भंडारा, सत्संग समारोह जैसे कई भव्य कार्यक्रम होंगे। जिसमें आप परिवार सहित सादर आमंत्रित हैं। इस का सीधा प्रसारण आप 4 जून 2023 को सुबह 09:15 बजे से साधना TV और पॉपकॉर्न TV पर देख सकते हैं।
इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण आप हमारे निम्न सोशल मीडिया Platform पर भी देख सकते हैं
page:- Spiritual Leader Saint Rampal Ji Maharaj
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आयोजन स्थल हैं :
1. Satlok Ashram Rohtak (Haryana)
2. Satlok Ashram Mundka (Delhi)
3. Satlok Ashram Dhuri (Punjab)
4. Satlok Ashram Sojat (Rajasthan)
5. Satlok Ashram Shamli (Uttar Pradesh)
6. Satlok Ashram Kurukshetra (Haryana)
7. Satlok Ashram Bhiwani (Haryana)
8. Satlok Ashram khamano (Punjab)
9. Satlok Ashram Dhanusha (Nepal)
10. Satlok Ashram Betul (Madhya Pradesh)
11. Satlok Ashram Indore (MP)
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