23/12/2021
की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाए
त्याग और तपस्या का दूसरा नाम है किसान, उनकी निःस्वार्थ सेवा और कठोर परिश्रम को प्रणाम....
एक रचना किसान बंधुओ को समर्पित ...
" #किसान और #उम्मीद '
उम्मीद की किरण नजर आई है,
किसान के घर खुशहलाई छाई है
भगवान ने आज
देखो
बच्चे भूख से तड़प रहे।
रो रो के भूख से बिलख रहे
शायद आज कुछ अच्छा हो
लगता जैसे कुछ परिकल्पना हो
आशा की किरण नजर आई है।
फसलों में जैसे खुशहाली छाई है।
बादल शायद आज गरज रहे
जैसे लगता आज बर्षा ऋतु
आई है।
आज एक उम्मीद की किरण
नजर आई है।
किसान की पत्नी जैसे बिलख
रही।
दवा दारू के लिए जैसे तड़प
रही
अपने पति की जेब टटोल रही।
ये कैसे उदासी चेहरे पे छाई है।
आज पैसे के लिए घर में जैसे
त्राहि त्राहि है।
आज ये कैसे स्थिति आई हैं
आज बारिश से फिर एक बार
धान की फसल मुस्कुराई है।
आज जैसे लगता है बारिश
की फिर से उम्मीद छाई है।
किसान तन ढकने को तरस
रहा
बेवश नजरो से से सबको देख
रहा?
आज ये कैसे स्थिति आई है
आज बारिश से फिर एक बार
धान की फसल मुस्कुराई है।
आज लगता है बारिश की
उम्मीद नजर आई है।
फसल पानी से तड़प रहा
आशा की नजरों से देख रहा।
किसान भी आज उघड़े वदन
को कैसे आज ढक भी रहा
भूखे बच्चे खाना मांग रहे।
लाचार मांँ को जैसे ताक रहे।
यह कैसी विडम्बना आई है।
यह कैसी भुखमरी और गरीबता
छाई है?
अन्न जन्म दाता के ही घर,
आज कैसी भुखमरी छाई है
आज उम्मीद की किरण आई है,
मरते किसान के पास आज
जिंदगी जैसे नया सवेरा लाई है
किसान के हाथ जैसे कांप रहे,
बच्चे भी खाली बरतन जैसे ताक
रहे?
परिवार आज भूख से तड़प रहा
बारिश भी झमाझम बरस रहा
वर्षा ऋतु जैसे अब आया है
लगता जैसे कोई त्योहार अब
छाया है।
किसान के हाथ भी जैसे कांप
रहे?
हल भी हाथ में ना आ रहे
लोगो को बेवश नजरो से देख
रहा
उघड़े वदन को कैसे कैसे आज
ढक भी रहा।
भूखे बच्चे खाना मांग रहे?
लाचार मांँ को जैसे ताक रहे?
यह कैसी विडम्बना आई है?
यह कैसे भुखमरी और गरीब
छाई है?
अन्न जन्म दाता के ही घर
आज कैसी भुखमरी छाई है
आज उम्मीद की किरण आई है
मरते किसान के पास
जिंदगी की नई किरण नजर
आई है।
..
#किसान #किसानदिवस ...