Crazy gardener

Crazy gardener किसानों और घरेलू बागवानी करने वाले लोगो की सहायता के लिए इस पेज का निर्माण किया गया है।

हुलहुल का बच्चा अभी दो दिन से व्हाट्सएप्प पर एक मंडी की पर्ची घूम रही है "लाल किनोवा" जो 25000 रुपये प्रति क्विंटल बिका।...
06/09/2024

हुलहुल का बच्चा

अभी दो दिन से व्हाट्सएप्प पर एक मंडी की पर्ची घूम रही है "लाल किनोवा" जो 25000 रुपये प्रति क्विंटल बिका। किनोवा को भारत में आये हुए लगभग 15 साल हुए है। इन 15 साल में बहुत से उतर चढाव इस फसल ने देखे है। राजस्थान सरकार के पूर्व कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी जी के कार्यकाल में किसानो को किनोवा बीज उपलब्ध करवाया गया था अब मंत्री जी को किसने इस चमत्कारी फसल के बारे में बताकर ये सुझाव दिया पता नहीं लेकिन बीज भरपूर दिया गया। हमारे यहाँ तो एग्रीमेंट वाले आ गए 1000 रुपये किलो बीज हमसे लेना और 100 रुपये किलो फसल वापस देना। मना करने के बाद भी कई लोग नहीं माने और लगाया।

नतीजा वही हुआ जिसका डर पहले ही था। जिस किनोवा के भाव कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में 100 रुपये किलो थे वो 8 और 10 रुपये किलो रह गए किसान को 10 -12 हजार रुपये एकड़ के पैसे भी नहीं मिले। कारण था सरकारी मशीनरी ने अखबारी समाचारों और ऑनलाइन भावों को ध्यान में रखा और उस समय अमेज़न पर 1200 रुपये किलो बिकते हुए देखकर एक झटके में किसानो की आय को दो गुना की जगह कई गुना करने का ठान लिया। इस बात का पता ही नहीं था उनको की ये कहाँ तो प्रोसेस होगा कहाँ बेचा जायेगा कोई मार्केटिंग चैनल है या नहीं है। मार्केटिंग नहीं हुई तो क्या होगा।

में गारंटी से कह सकता हूँ तब तक बीज बाँटने वालों ने खाकर भी नहीं देखा होगा की ये है क्या बला है।

खेर उसके बाद भारत में किनोवा की खपत भी बढ़ने लगी और बाजार भी स्थिर होने लगे और एक नई फसल के रूप में किसानो ने किनोवा को अपना लिया है। कम लागत में ठीक आय देने वाली फसल के रूप में इसने अपनी जगह बना ली है। किनोवा के भाव मांग और पूर्ति के संतुलन से चलते है। इस साल शायद मांग ज्यादा है या आपूर्ति कम है रेट सही चल रहे है। इस बीच "लाल किनोवा 25000 रुपये प्रति क्विंटल बिका" के मेसेज ने लोगो के दिमाग में कोतुहल पैदा कर दिया बिलकुल वैसे ही जैसे कभी काले गेहूं के लिए किया था।

खोज बीन करना शुरू किया तो जिसके पास उपलब्ध है बीज उन्होंने रेट बताया 1000 रुपये प्रति किलोग्राम। सक्षम है लोग 1000 रुपये कोई बड़ी राशि नहीं है। अगर कोई 25000 रुपये प्रति क्विंटल क्या 20000 में भी कोई कॉन्ट्रैक्ट करता हो तो लगाने में कोई बुराई नहीं है। बाकि बीज बेचने वाला तो एक-दो टन बीज बेचकर 12 - 15 लाख कमा लेगा लेकिन इस एक टन का जो 12 - 15 हजार क्विंटल उत्पादन आएगा अगर उसका रेट नहीं मिला तो क्या होगा ?

होगा यह की व्यापारी अगले 3 - 4 बेचकर पैसे कमायेगा और किसान के हाथ कुछ नहीं लगेगा। अगर कोई कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग करवा रहा है तो किया जा सकता है में भी इच्छुक हूँ।

Yatin Mehta

04/09/2024

:: जाहिर सुचना ::

सभी पाठकवर्ग को कुछ जानकारियां देना आवश्यक लगा है तो कृपया ध्यान से पढ़ें।

1. मुझे सरकार से तनख्वाह मिलती है।
2. मुझे आपको कोई सामग्री नहीं बेचना है।
3. में किसी कंपनी का प्रचारक नहीं हूँ।
4. पोस्ट पर कमेंट करने से पहले पोस्ट जरूर पढ़ें केवल फोटो देखकर या दो लाइन पढ़कर कमेंट नहीं करें।
5. कई बार पोस्ट सीरीज में होती है तो उसके पहले की पोस्ट देखने से जानकारी मिलेगी पोस्ट क्यों की गयी।
6. कमेंट की भाषा शालीन बनाये रखें बाकि किसी ज़माने में 10000 गलियों की वेबसाइट बनाई हुई है तो आप समझ सकते है।
7. ज्ञान देने से पहले मेरे प्रोफाइल में जाकर अबाउट में मेरा परिचय पढ़ लें। इतना समझ लीजिये जो लिखा है उसके बारे में आपसे ज्यादा जानकारी मुझे है। अगर जानकारी नहीं होगी तो पूछने में मुझे कोई दिक्कत नहीं होती है में सर्वज्ञानी नहीं हूँ।
8. इनबॉक्स में या कमेंट में नंबर मांगने से पहले प्रोफाइल देख लें वहां लिखा हुआ है।
9. किसी प्रकार की जानकारी के लिए फ़ोन की जगह व्हाट्सप्प का उपयोग करने पर जानकारी मिलने की ज्यादा सम्भावना है।
10. तर्क वितर्क और विचार विमर्श के लिए वाल हमेशा खुली है नए विचार और नया सिखने को यहीं से मिलता है।
11. में पिछले 34 साल से सिख ही रहा हूँ और सिखने की यात्रा अभी भी जारी है तो अपने 5 - 10 साल के अनुभव से तुलना नहीं करें।
12. अंत में इतना ही कहूंगा इस वाल से प्राप्त जानकारी पर आप विश्वास कर सकते है।

धन्यवाद्

Yatin Mehta

"क्रॉप मॉडलिंग" साल 1999 की बात आज से 25 साल पहले हबीबी तब कॉलेज में पीएचडी के पहले साल में होती। काजरी जोधपुर में एक 21...
22/08/2024

"क्रॉप मॉडलिंग"

साल 1999 की बात आज से 25 साल पहले हबीबी तब कॉलेज में पीएचडी के पहले साल में होती। काजरी जोधपुर में एक 21 दिन का ट्रेनिंग प्रोग्राम होती वैसे तो वो नौकरीशुदा वैज्ञानिको और प्रोफेसरों के लिए होती पर हबीबी अप्लाई करती तो उसका नंबर भी लग जाती। ट्रेनिंग का टॉपिक होती "क्रॉप सिमुलेशन मॉडलिंग" सीधा सीधा मतलब होती की कंप्यूटर में बैठकर मौसम, नमी, तापमान, सूरज की धुप, वैरायटी, जमीन में पोषक तत्वों की मात्रा, नमी की मात्रा आदि के आंकड़े डालकर उपज का अनुमान लगाना या मौसमी आंकड़ों के आधार पर कीड़े बिमारियों के फैलने की सम्भावना का पहले से पता लगाकर आवश्यक उपाय कर सकती। सोचकर देखती केवल कुछ आंकड़ों से उपज का अनुमान।

25 साल पहले हबीबी के लिए ये एकदम नई जानकारी होती। हबीबी जब ट्रेनिंग पूरा करके वापस आती तो साथ में एक लेक्चर नोट और फ्लॉपी भी मिलती जिसमे कई सारे प्रोग्राम भी होती। कंप्यूटर पर हबीबी एक्सपेरिमेंट करती पता चलती इस तरीके से किसी वैरायटी के स्थानीय मौसम में क्या परिणाम होती उसका भी आंकलन किया जा सकती।

जब तक यूनिवर्सिटी में होती एक्सपेरिमेंट चलती रहती उसके बाद सब ठन्डे बस्ते में चला गया होती। आज किसी मीटिंग में ब्रेन स्टॉर्मिंग होती तो वापस याद आ जाती। फ्लॉपी तो मिल गयी लेकिन अब ड्राइवर कहाँ से मिलेगी और ड्राइवर मिल भी गयी तो आगे फ्लॉपी चलेगी की नहीं चलेगी पता नहीं होती। लेकिन खोजबीन चालू होती कुछ तो निकलती अब तो साधन सुविधा भी होती।

कितना मजा होती किसान को पहले से पता होती कितनी उपज होती, एडवांस में पता होती कब बीमारी आएगी कब कीड़ा आती कब पानी देना होती और कब नहीं देना होती। मुझे लग रहा होती की ये दिन बहुत जल्दी ही आती।

Yatin Mehta

और मेहमान आ गए ......................सफेद लट एक महत्वपूर्ण हानिकारक कृषि कीट है क्योंकि यह फसलों सहित विभिन्न पौधों की ज...
21/08/2024

और मेहमान आ गए ......................

सफेद लट एक महत्वपूर्ण हानिकारक कृषि कीट है क्योंकि यह फसलों सहित विभिन्न पौधों की जड़ों को खाते हैं। लगभग सभी फसलों में इसका प्रकोप बहुतायत में होता है और जड़ काटने के कारण पौधा ख़त्म हो जाता है और उपज में बहुत नुकसान होता है। इस कीट से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए इसके जीवन चक्र को समझना और उसी के अनुसार प्रभावी नियंत्रण के उपाय करना अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

सफेद लट के भारत में दो प्रकार पाए जाते है। सफ़ेद लट के जीवन में चार चरण या कह लीजिये इसकी चार अवस्थाएं होती है अंडा, लार्वा, प्यूपा और वयस्क। इसके प्रकोप का समय मध्य मई से लेकर दिसंबर तक होता है।

अंडा : वयस्क बीटल गर्मियों के अंत में पहली मानसूनी बरसात के साथ मिट्टी में अपने अंडे देते हैं। अंडे छोटे, अंडाकार आकार के और सफेद से पीले रंग के होते हैं जो गुच्छो में या अलग अलग हो सकते है। एक मादा कीट अपने जीवनकाल में सैकड़ों अंडे दे सकती है।

लार्वा : एक बार अंडे फूटने के बाद, सफेद लार्वा निकलते हैं और पौधों की जड़ों को खाना शुरू कर देते हैं। लार्वा सी-आकार के सफेद होते हैं, और उनके सिर का कैप्सूल भूरे रंग का होता है। उनके सिर के पास तीन जोड़ी पैर होते हैं और उनके नीचे की तरफ एक विशेष धारीदार पैटर्न होता है। प्रजाति और वातावरणीय स्थितियों के आधार पर, सफेद लट का लार्वा चरण कई महीनों से लेकर एक वर्ष तक रह सकता है।

प्यूपा: अपना भोजन चरण पूरा करने के बाद, सफेद लट का लार्वा प्यूपा बनने के लिए मिट्टी में गहराई तक चला जाता है जो 40 से 70 सेंटीमीटर तक हो सकता है और प्यूपा में बदल जाता है। सफ़ेद लट का लार्वा इस प्यूपा के अंदर एक वयस्क बीटल में बदल जाता है। प्यूपा बनने की अवधि कुछ हफ्तों से लेकर कई महीनों तक रह सकती है।

वयस्क : एक बार कायान्तरण पूरा हो जाने पर, वयस्क बीटल प्यूपा से निकलता है और मिट्टी की सतह पर आने के लिए अपना रास्ता बनाता है। वयस्क मादा बीटल फिर अंडे देने की प्रक्रिया शुरू करता है, जिससे जीवन चक्र नए सिरे से शुरू होता है।

काम की बातें :-

1. यह कीट जमीन में रहता है।
2. मेटिंग के लिए यह जमींन से बाहर आता है। जो पहली वर्षा के बाद शुरू होता है और लगभग एक माह तक चलता है।
3. इसके मिटटी से बाहर आने का समय शाम 6 - 7 बजे से लेकर रात्रि 10 बजे तक रहता है। और ये नियमित होता है इसके बाद सुबह मादा कीट वापस भूमि में चले जाते है। किसान अक्सर इस समय खेत पर नहीं होता है तो उसको पता नहीं चलता है। लेकिन आसपास के पेड़ों को पत्तिया रहित देखकर इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
4. जब वयस्क भूमि से बाहर होता है तो आसपास के पेड़ों/मेड़ पर विचरण करता है और उसकी पत्तियों को खाता है।
5. इसकी H. consanguine प्रजाति 76 से 96 दिन में अपना जीवन पूरा करती है और जिसमे अंडा अवस्था 8-10 दिन लार्वा अवस्था 56-70 दिन और प्यूपा अवस्था 12-16 दिन की होती है। H. serrata प्रजाति 141-228 दिन में अपना जीवन पूरा करती है और जिसमे अंडा अवस्था 10 - 12 दिन लार्वा अवस्था 121 -202 दिन और प्यूपा अवस्था 10-14 दिन की होती है।
6. इसके लार्वा की दूसरी, तीसरी और चौथी अवस्था ही सबसे ज्यादा नुकसान करती है जिसका समय जुलाई से लेकर अक्टूबर तक हो सकता है।

व्हाइट ग्रब संक्रमण का नियंत्रण करने के लिए उसके जीवन चक्र की कमियों को ध्यान में रखकर सामूहिक उपाय किये जाने की आवश्यकता है।
वयस्क का नियंत्रण :
1. शाम के समय बीटल के लिए लाइट ट्रैप लगाएं।
2. वयस्क नर बीटल के लिए फेरोमोन ट्रैप लगाएं।
3. खेत के आसपास के पेड़ और झाड़ियों की प्रूनिंग कर दें।
4. खेत के आसपास के पेड़ और झाड़ियों पर शाम के समय कीटनाशी का छिड़काव करें।
5.
लार्वा नियंत्रण :
1. ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई ।
2. अच्छी तरह सड़े गोबर खाद का उपयोग (ज्यादातर ये गोबर की खाद के साथ ही खेत में पहुँचते है)।
3. मिटटी में उपयुक्त कीटनाशी का प्रयोग
4. परजीवी कवक और कीट रोगकारी निमेटोड (EPN) का प्रयोग ।

नोट :
1. सफ़ेद लट का नियंत्रण करने के लिए मानसून की प्रथम वर्षा के साथ ही उपाय किये जाने चाहिए जिससे नियंत्रण के लिए किये जा रहे उपायों का प्रभाव बढ़ जाता है। सफेद लट के जीवन चक्र को समझकर और उचित नियंत्रण उपायों को अपनाकर किसान इन कीटों का प्रभावी ढंग से प्रबंधन कर सकते हैं और अपनी फसलों और पौधों को महत्वपूर्ण नुकसान से बचा सकते हैं।

2. इसवर्ष मेने लाइट ट्रैप के साथ फेरोमोन ट्रैप का प्रयोग किया था काफी कीड़े आये चूँकि प्रयोग लेट था तो खेत में प्रभाव कैसा रहा इसका पता अब लगेगा।

्री
#सफेदलट
#उन्नतखेती
#कृषिजानकारी

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Yatin Mehta
फोटो : हमारे ही एक किसान भाई ने भेजा है।

अथ श्री लहसुन कथा भाग - 2 लहसुन के भाव देखकर लोग ऊटी लहसुन के लिए दूर दूर से बीज लेने के लिए आ रहे है। भीड़ कितनी होती है...
20/08/2024

अथ श्री लहसुन कथा भाग - 2

लहसुन के भाव देखकर लोग ऊटी लहसुन के लिए दूर दूर से बीज लेने के लिए आ रहे है। भीड़ कितनी होती है इसका अंदाज जो बीज खरीदने जाता है उससे पूछने की आवश्यकता है। ऊटी के प्रति इतना रूझान पहले कभी नहीं देखा गया। मुखबिर से पता चला है की दूरस्त स्थानों से भी बीज की खरीद के लिए लोग पहुँच रहे है और मांग को देखते हुए इस समय जो भाव होना चाहिए वो अभी तक नहीं आया है। कई लोगो ने बीज की भारी बिक्री देखते हुए देसी किस्मो की और रुख किया है।

कुछ ज्ञात लोगो ने बड़ी अज्ञात बाते बताई है। चूँकि आने वाला बीज का लहसुन गीला होता है उसमे नमी की बड़ी मात्रा होती है जिसको कम करने के लिए अलग अलग किस्म के उपाय अपनाये जा रहे है कोई पंखे लगाकर सूखा रहा है तो किसी ने हेलोजन का प्रबंध किया हुआ है कोई ब्लोअर लगाकर सूखा रहा है। कुल मिलकर सभी जल्दी में है। इसी बात के प्रयास चल रहे है कौन कितना जल्दी बुवाई करता है।

हमारे खास जासूस ने एक विशेष जानकारी दी है की कुछ देसी वैज्ञानिक, कुछ विशेष पदार्थो का उपयोग नमी कम करने के लिए कर रहे है। उन विशेष पदार्थो का अगर किसी ने उपयोग किया है तो पोस्ट पढ़ने के बाद मेरा ज्ञान वर्धन अवश्य करें की वो विशेष पदार्थ क्या है। कहीं ऐसा नहीं हो जाये की जल्दी सुखाने के चक्कर में आप कुछ ऐसा कर जाएँ की बाद में अंकुरण ही नहीं हो।

ऊटी लहसुन दो प्रकार का है पहला ऊटी 1 जो सफ़ेद रंग का है इसकी अवधि 120 से 130 दिन है दूसरा गुलाबी जिसकी अवधि 90 से 100 दिन है। जो गुलाबी है उसका कंद सफ़ेद से छोटा और औसत उपज भी सफ़ेद से कम होती है। इसलिए किस्म का चयन अपनी आवश्यकता के अनुसार करें। इस बार लहसुन की उत्पादन लागत 10 से 12 हजार रुपये प्रति क्विंटल रहने वाली है तो फसल का प्रबंधन बहुत ही महत्वपूर्ण होगा।

विश्व में लहसुन निर्यात में हमारा हिस्सा बहुत कम है। लेकिन ऊटी लहसुन का बढ़ता हुआ क्षेत्र और किसानो का रुझान आने वाले समय में निर्यात की बहुत सी संभावनाओं को खोलेगा ऐसे में आवश्यक है की इसको गंभीरता से लिया जाकर निर्यात आधारित लहसुन की खेती को बढ़ाने के विशेष प्रयास किये जाएँ।

बने रहिये हमारे साथ आगे भी लहसुन को सोना बनाने के लिए

Yatin Mehta
#ऊटीलहसुन
#लहसुनकीखेती
#सफ़ेदसोना

अथ श्री प्याज कथा प्याज से सभी लोग परिचित है खाने वाले भी और नहीं खाने वाले भी। यह एक महत्वपूर्ण सब्जी फसल है जिसके बिना...
14/08/2024

अथ श्री प्याज कथा

प्याज से सभी लोग परिचित है खाने वाले भी और नहीं खाने वाले भी। यह एक महत्वपूर्ण सब्जी फसल है जिसके बिना ग्रेवी बनाने में मजा नहीं आता है। सलाद में इसकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है वहीँ सिरके में भीगी मीठी प्याज और हरी प्याज की सब्जी की बात ही कुछ और है। प्याज को वो महिमा है की रसोई का ये बजट बिगड़ सकती है तो किसान को कार खरीदने में सक्षम बना सकती है वहीँ दूसरी और किसान के लिए आर्थिक संकट भी पैदा कर सकती है।

भारत में प्याज की खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, कर्नाटक, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और बिहार में की जाती है। अच्छी नकदी फसल होने के कारण किसान रिस्क लेकर प्याज की खेती करता है जिससे अच्छी आय प्राप्त हो सके कभी होती है तो कभी गिरे हुए भाव के चलते नहीं होती है। प्याज के भाव निर्यात पर निर्भर करते है और बड़े खिलाडी यहाँ खेल कर जाते है क्योकि किसानो के पास भण्डारण की व्यवस्था नहीं होती है। जो सक्षम किसान है भण्डारण करते है और अपनी आय बढ़ा लेते है।

प्याज साल में 2 बार उगाई जाती है खरीफ प्याज जिसे मई से लेकर जुलाई तक लगाया जाता है दूसरा रबी जिसमे फसल नवंबर से जनवरी तक लगाई जाती है। लगाने का तरीका सीधे बीज से खेत में बुवाई या बीज से नर्सरी तैयार कर या छोटी प्याज की बुवाई करके की जाती है। विगत कुछ वर्षो में छोटी प्याज की बुवाई बड़े पैमाने पर की जाने लगी है छोटी प्याज लगाने से फसल जल्दी आ जाती है और किसान को भाव का लाभ मिल जाता है। सबसे ज्यादा दिक्कत होती है खरीफ फसल में जिसमे बीज को सीधे खेत में बोया गया हो या नर्सरी की गयी हो। यदि नर्सरी मई या जून में की गई नर्सरी को गर्मी से बचने के उपाय किये जाने चाहिए और सीधे खेत में बुवाई करने पर नमी को नियंत्रित उपाय करने की आवश्यकता होती है अन्यथा बहुत लोग अगस्त तक आते आते अपनी फसल खो देते है।

यहाँ ध्यान रखने वाली बात है की आप अपनी मौसमी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बुवाई का तरीका और समय निर्धारित करें। आप तजा बेचेंगे, सुखाकर बेचेंगे बीज से नर्सरी करके लगाना ठीक रहेगा या सीधे बुवाई उचित रहेगी या छोटी प्याज लाकर लगाना सही है। इसके साथ ही बीज का चयन भी महत्वपूर्ण है मौसम के अनुकूल किसम का चयन करके ही बुवाई की जानी चाहिए। एक्सपोर्ट के लिए लगाएं तो उसी के अनुरूप किस्म का चयन करें बहुत बड़े आकार या बहुत छोटे आकर की प्याज का बाजार में उचित भाव नहीं मिलता है। 5 सेंटीमीटर आकर का प्याज हर लिहाज से अच्छा माना जाता है।

निजी क्षेत्र की अनेको किस्म बाजार में प्रचलित है जिनके समतुल्य सरकारी संस्थानों से निकली किस्मे भी है। प्याज बीज के लिए किसान एक अच्छी खासी कीमत चुकाता है। इस बीज की लागत को काम करने के लिए जहाँ प्याज अधिक होती है उन क्षेत्रों के किसान स्वयं और आसपास के अन्य किसानो के लिए बीज उत्पादन का काम कर सकते है लेकिन उसके लिए आवश्यक होगा की किसान समूह में संगठित हो।

खरीफ प्याज में कुछ सावधानियां रखकर अच्छी उपज ली जा सकती है :-

1. सही किस्म का चुनाव करके फसल लगाएं।
2. बीज उपचार आवश्यक रूप से करें।
3. जलनिकासी का अच्छा प्रबंध करें।
4. फफूंदनाशी का छिड़काव नियमित रूप से करें।
5. लम्बे समय तक अवर्षा की स्थिति में सिंचाई करें।
6. ड्रिप या स्प्रिंकलर विधि से सिंचाई करने कर प्याज की उपज और गुणवत्ता बढ़ती है।
7. खरीफ प्याज में मौसम गरम और नमी युक्त होता है जो कई प्रकार की फफूंद और बैक्टीरिया के लिए बहुत अच्छा होता है। ऐसे में बीमारी की पहचान करवाकर सही फफूंदनाशी का छिड़काव आवश्यक होता है।
8. कंद बनने पर कंद में कई प्रकार का संक्रमण हो सकता है और कंद सड़ने लगते है जैसे फ्यूजेरियम रॉट, ब्लैक रॉट उसके लिए समय पर उपचार आवश्यक होता है।

ये छोटी छोटी बातें ध्यान में रखकर किसान अपनी फसल को स्वस्थ्य रख सकता है और फसल स्वस्थ्य होगी तो उपज और गुणवत्ता तो बढ़िया होनी ही होनी है।

Yatin Mehta

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अथ श्री अमरबेल कथा अमरबेल, जिसे डोडर के नाम से जाना जाता है, एक परजीवी खरपतवार है। अमरबेल वंश में लगभग 200 प्रजातियां पा...
29/07/2024

अथ श्री अमरबेल कथा

अमरबेल, जिसे डोडर के नाम से जाना जाता है, एक परजीवी खरपतवार है। अमरबेल वंश में लगभग 200 प्रजातियां पायी जाती है। इस परजीवी खरपतवार की पहचान इसके धागे जैसे पतले पत्ती रहित तने हैं जो दूसरे पौधों से जुड़ते हैं और उनसे पोषक तत्व प्राप्त करते हैं। इसके टूटे तने किसी दूसरे पौधे पर दाल दिया जाए तो वहां भी ये अपना कब्ज़ा जमा लेते है। गावों में अक्सर ये बबूल और अन्य दूसरे पौधों पर पायी जाती है। निरंतर पोषक तत्वों के अवशोषण से मुख्य फसल की बढ़वार रुक जाती है और अत्यधिक प्रकोप की स्थिति में कुछ नहीं मिलता है।

अमरबेल का प्रसार खेत में बीजों के माध्यम से होता है। इसके बीज छोटे होते है और कई वर्षो तक भूमि में जीवित रह सकते है जब तक की अनुकूल परिस्थितियां नहीं मिले। बीज मिट्टी की सतह पर अंकुरित होते हैं, और अंकुरों को जीवित रहने के लिए कुछ दिनों के भीतर एक मेजबान ढूंढना होता है। एक बार जब अमरबेल का अंकुर मेजबान को ढूंढ लेता है, तो वह हौस्टोरिया नामक विशेष संरचनाओं का उपयोग करके खुद को उस पौधे से जोड़ लेता है। हौस्टोरिया मेजबान पौधे के ऊतकों में प्रवेश करता है, पानी और पोषक तत्व निकालता है, जिससे कुस्कुटा को पनपने का मौका मिलता है जबकि मूल पौधा कमजोर हो जाता है।

अमरबेल से नुकसान : अमरबेल पूरी तरह से परजीवी होती है अपने पोषी पौधे से पोषण और पानी को लेती है जिससे मुख्य पौधा कमजोर हो जाता है और उसकी बढ़वार और विकास रूक जाता है। यह खरपतवार मेज़बान पौधे को ढक लेते है जिससे पौधे की प्रकाश संश्लेषण करने की क्षमता कम हो जाती है। इस प्रकार पोषक तत्वों की कमी और कम प्रकाश संश्लेषण होने से उपज बुरी तरह से प्रभावित होती है।

प्रकोप : रिजका में इसका प्रकोप सर्वाधिक होता है। इसके अलावा सोलेनेसी कुल की फसलें जैसे टमाटर, बेंगन, अश्वगंधा में भी इसका प्रकोप बहुतायत में देखा गया है। पिछले कुछ वर्षो में इसका प्रकोप गेहूं, जौ और अलसी में भी देखा गया है। इस वर्ष पड़ौसी जिले के किसान द्वारा सोयाबीन की फसल में भी इसका प्रकोप बहुतायत में देखा गया है। सोयाबीन से पूर्व किसानो द्वारा अलसी की फसल लगायी गयी थी जिसमे अमरबेल के संक्रमण का ध्यान नहीं रखने से अमरबेल का बीज बना और वर्तमान में वो सोयाबीन को प्रभावित कर रहा है।

नियंत्रण उपाय : अमरबेल उन कुछ खरपतवारों में शामिल है जिन्हे आसानी से ख़त्म नहीं किया जा सकता है। इसके लिए एकीकृत खरपतवार नियंत्रण प्रणाली को अपनाने की आवश्यकता होती है।
गैर पोषी फसलें: उन फसलों का चुनाव फसल चक्र में किया जाना चाहिए जिनपर इसका प्रकोप नहीं हो या बहुत कम हो।
आवरण फसलें : उन फसलों का चुनाव करें जो अमरबेल की बढ़वार को रोकती हो।
गहरी जुताई : गहरी जुताई से अमरबेल के बीजों को गहराई में दबा कर अंकुरण को कम किया जा सकता है।
हाथ से निराई : संक्रमण के शुरुआती चरणों इसके प्रकोप वाले पौधों को जड़ सहित निकालकर जला देना चाहिए।
रासायनिक नियंत्रण : फसल के अनुसार उपयुक्त खरपतवारनाशी का प्रयोग करके इसको नियंत्रित किया जा सकता है। फसल उगने से पूर्व प्रयोग किये जाने वाले खरपतवारनाशी के प्रयोग से अंकुरण को रोका जा सकता है। खडी फसल में चयनात्मक खरपतवारनाशी का उपयोग किया जा सकता है।

विशेष नोट : अमरबेल एक परजीवी खरपतवार है जब भी इसे खेत में देखे तत्काल हटाएँ और जलाकर नष्ट करें। लेखक स्वयं किसानो के खेत में किसानो की लापरवाही देख चूका है जब अमरबेल में बीज बन गए थे जो उसकी आगामी फसल को प्रभावित करेंगे।

Yatin Mehta

अथ श्री काचरी कथा काचरी कद्दू वर्ग की बेल वाली फसल है, यह सामान्य रूप से खरीफ में उगती है। कहीं अपने आप उगती है तो कहीं ...
22/07/2024

अथ श्री काचरी कथा

काचरी कद्दू वर्ग की बेल वाली फसल है, यह सामान्य रूप से खरीफ में उगती है। कहीं अपने आप उगती है तो कहीं उगाई भी जाती है। हमारे इधर मक्का के खेत में अक्सर दिख जाती थी आजकल दर्शन दुर्लभ है खरपतवारनाशियों की वजह से। देश के अलग अलग भाग में इसके अलग अलग नाम है। इसे काचरा, काचरिया, काचरी जैसे नाम के अलावा स्थानीय दूसरे नामों से भी जाना जाता है। इसके कच्चे फल सब्जी बनाने, चटनी बनाने के काम आते है और सूखे फल अनेको प्रकार के मसाले बनाने में उपयोग किये जाते है। मरू प्रदेश के लोग इसे बहुत अच्छे से जानते है। ग्वार और काचरे की सब्जी बड़ी लाजवाब होती है। बाजरे की रोटी घी में डूबी हुई के साथ ग्वार काचरी की सब्जी और गुड़ सर्दी में एक अलग ही आनंद देता है इस आनंद को जिसने लिया है वही समझ सकता है।

खेर यह सिमित संसाधनों में होने वाली फसल है जिसे बहुत अधिक वर्षा की जरुरत नहीं होती है और कम संसाधन में भी अच्छी आय देने में सक्षम फसल है ऐसा मुझे इसके बाजार भाव और मांग देखकर लगता है। सुखी काचरी का मसाले में उपयोग इसे एक व्यावसायिक फसल बनाता है। इसकी बढ़ती मांग और प्रोसेसिंग की संभावनाएं इसकी खेती में अच्छे रोजगार और आय की सम्भावना बनाती है । पश्चिमी राजस्थान में स्वयं उपयोग के लिए भी इसे सुखाकर रखा जाता है वहीँ नाते रिश्तेदारों को भी सूखे फल दिए जाते है। सूखे फलों का मसाला उत्पादकों द्वारा उपयोग किया जाना इसे व्यावसायिक फसल के रूप में स्थापित करता है और इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए इसके संरक्षण और संवर्धन का कार्य कृषि विश्विद्यालय और शोध संसथान कर रहे है।

काचरी पर किये गए वैज्ञानिक अनुसंधानों से इसकी कृषि तकनीकियां विक्सित की गयी और कुछ उन्नत और अच्छी किस्मो का विकास भी किया गया। लेकिन पश्चिमी राजस्थान से बाहर किसानो द्वारा इस विषय पर ना सोचा गया ना काम किया गया। 100 से 200 रुपये किलो के थोक भाव से लेकर ऑनलाइन स्टोर पर यह 400 से 1000 रुपये प्रति किलोग्राम यह बिक रही है।

विगत 2 वर्ष से इसका बीज प्राप्त करने के प्रयास में कर रहा था। जो सफल नहीं हुए लेकिन इस वर्ष संसथान के दो वैज्ञानिक डॉ नरेंद्र पारीक और डॉ दीपक सुरोलिया के सहयोग से 2 उन्नत किस्मो का बीज कुछ मात्रा में प्राप्त हुआ है। जिसे आज ही आर्गेनिक फार्म में लगा दिया जायेगा। नफे नुकसान की गिनती बाद में लगाएंगे वैसे जो बागवानी करनेवाले किसान है अपने बगीचे में फलदार पौधों के बीच अगर अतिरिक्त आय के लिए इसे लगाए तो कैसा रहेगा ?

पुरानी पोस्ट कुछ संवर्धन के बाद

्री
© Crazy gardener
Yatin Mehta
Photo : फोटो के अधिकार उनके मालिकों के पास सुरक्षित है।

"रिले क्रॉपिंग"कुछ ने नाम सुना होगा और कुछ इससे अनजान होंगे। जैसे रिले रेस होती है एक आदमी दौड़ता हुआ आता है दूसरा साथ दौ...
11/07/2024

"रिले क्रॉपिंग"

कुछ ने नाम सुना होगा और कुछ इससे अनजान होंगे। जैसे रिले रेस होती है एक आदमी दौड़ता हुआ आता है दूसरा साथ दौड़ते हुए बेटन लेता है और पहला बाहर हो जाता है वैसा ही कुछ यहाँ होता है। इसमें किसान यह काम फसल के साथ करता है एक फसल उगाई उसके कुछ समय बाद कड़ी फसल में दूसरी फसल को बो दिया कुछ समय दोनों फसल साथ रहेंगी फिर पहली फसल निकल जायेगी और बाद में दूसरी फसल। छोटे और मझोले किसानो के लिए ये तरीका लाभकारी सिद्ध हो रहा है जहाँ काम खर्च और सिमित संसाधनों के साथ कुछ अतिरिक्त आय ले सकता है।

रिले क्रॉपिंग के लाभ:

1. उत्पादकता में वृद्धि : रिले क्रॉपिंग में किसान एक ही सीजन में एक ही खेत में दो फसलें उगाता है, जिससे भूमि उपयोग दक्षता बढ़ती है। यह सीमित भूमि और कम संसाधनों वाले छोटे किसानों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है।

2. आय में वृद्धि : एक ही सीजन में दो फसलें होने से किसान की आय बढ़ती है।

3. खर्च में बचत : दूसरी फसल के लिए होने वाला जुताई का खर्च बच जाता है। कीटनाशी दवाइयों और खाद का अतिरिक्त खर्च नहीं करना पड़ता है।

4. कीट और रोगों के प्रकोप में कमी : खेत में फसलों की विविधता कीटों के जीवन चक्र को बाधित करती है, जिससे उनके लिए स्थापित होना कठिन हो जाता है।

5. संसाधनों का कुशल उपयोग: रिले क्रॉपिंग पानी, सूर्य के प्रकाश, उर्वरक के बेहतर उपयोग सुनिश्चित करती है। लंबी मुख्य फसल, छोटी रिले फसल को छाया प्रदान करती है और उसकी सुरक्षा करती है जिससे फसल प्रतिकूल परिस्थितियों से बची रहती है।

रिले क्रॉपिंग को कौन अपना सकता है : रिले क्रॉपिंग की सुविधा और परिस्थिति संसाधनों को देखकर कोई भी किसान अपना सकता है।

हमारे यहाँ रिले क्रॉपिंग के उदाहरण :

1. लहसुन के साथ : मिर्च
2. लहसुन के साथ : इसबगोल
3. उड़द के साथ तुलसी और उसके साथ इसबगोल
4. गेहूं के साथ अगेती सब्जियां
5. मिर्च के साथ खरबूजा
6. मक्का के साथ लोबिया

आपके यहाँ भी आप अपनी सुविधा के आधार पर रिले क्रॉपिंग थोड़े क्षेत्र में करके देख सकते है। रिले क्रॉपिंग छोटे और मझोले किसानों के लिए एक टिकाऊ अतिरिक्त आय का विकल्प प्रदान करती है।

Yatin Mehta

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कृषि बुलेटिन दिनांक 8 जुलाई 2024 किसानो के बहुत से प्रश्न और समस्याएं व्हाट्सप्प पर प्राप्त होती रहती है। प्रत्येक को व्...
08/07/2024

कृषि बुलेटिन दिनांक 8 जुलाई 2024

किसानो के बहुत से प्रश्न और समस्याएं व्हाट्सप्प पर प्राप्त होती रहती है। प्रत्येक को व्यक्तिगत उत्तर एक ही समय में देना बहुत मुश्किल होता है। लेकिन जो समस्या एक को हो रही है अन्य के यहाँ भी हो सकती है ऐसे में पोस्ट लिखकर उत्तर देना सही है ताकि बाकि लोग भी उसको देख समझकर उसका उपयोग कर सके। पिछले दो दिनों में जो कुछ समस्याएं मुझे देखने को मिली है और उनके लिए किये जा सकने वाले उपाय और आंकलन के लिए फोटो आपको इस पोस्ट में देखने को मिलेंगे। उचित लगता है तो पोस्ट को शेयर कर दें ताकि दूसरे लोग भी पढ़ सकें।

1. मूंगफली में कॉलर रॉट या सीडलिंग ब्लाइट या क्राउन रॉट : फोटो 1 और 2 में ध्यान से देखने पर पता चलता है मूंगफली में जड़ और तना जहाँ मिलता है वहां से सड़कर ख़त्म हो गया है और काले रंग की फफूंद दिख रही है। इसके लिए हेक्साकोनाज़ोल 2 मिली लीटर प्रति लीटर के हिसाब से ड्रेंचिंग करें।

2. सोयाबीन में सीडलिंग ब्लाइट : फोटो 2 में जड़ और तने के मिलने वाले क्षेत्र में सफ़ेद रंग की फफूंद लगी हुई है और पौधा ख़त्म हो गया है। प्रभावित क्षेत्र में कार्बेन्डाजिम 50 % WP 2 ग्राम प्रति लीटर से ड्रेंचिंग करें।

3. सोयाबीन में सफ़ेद लट : फोटो 6 और 7 में जड़ कटा हुआ पौधा और दूसरे में छोटी अवस्था में सफ़ेद लट। कार्बोफुरान 3 % दानेदार 13.3 किलोग्राम प्रति एकड़ का प्रयोग करें।

Yatin Mehta

सब्जियों के भावसाल में तीन बार ऐसा होता है जब सब्जियों के भाव आसमान छूने लग जाते है। उस समय उपभोक्ता सरकार को कोसने लग ज...
02/07/2024

सब्जियों के भाव

साल में तीन बार ऐसा होता है जब सब्जियों के भाव आसमान छूने लग जाते है। उस समय उपभोक्ता सरकार को कोसने लग जाते है। लेकिन सब्जी उत्पादक किसानों का भला हो जाता है। वहीं साल में 3 मौके ऐसे होते है जब किसान की तुड़ाई की मजदूरी भी नही निकलती है लेकिन उपभोक्ता ये नही सोचता है।

जब भाव बहुत ऊंचे होते है वो समय होता है मार्च अप्रैल, जुलाई अगस्त और अक्टूबर नवंबर। इनके बाद के दो महीने होते है किसान के लिए हाहाकारी जब मंडियों में सब्जी के ढेर किलो नही क्विंटल से बिकते है।

जो नियमित सब्जी उत्पादक किसान है उन्हे पता होता है कब क्या लगाना है, कितना लगाना है और कहां बेचना है। वो एक अंतराल पर अपनी फसलें लगाते है ताकि वर्ष भर नियमित रूप से सब्जी बेच सके। मरण होता है उन किसानों का जो अच्छे भाव की उम्मीद में फसल लगा लेते है।

जायद में कद्दू वर्गीय सभी सब्जियां लगाई जाती है। अच्छे किसान फरवरी के आरंभ में लगा देते है जिसका उत्पादन आधे मार्च के बाद शुरू हो जाता है। अप्रैल अंत तक अच्छे भाव मिलते है। लेकिन फिर बाजार में भरपूर सब्जी आने लगती है। भाव गिर जाते है। यहां नए किसान कुछ दिन मोर्चा सम्हालते है फिर खरीफ फसलों के लिए धीरे धीरे खेत खाली करने लगते है। भाव वापस बढ़ने लगते है और जो किसान फसल रख लेते है वो एक महीने में पूरे खरीफ का पैसा वसूल कर लेते है।

4 साल पहले की बात है। एक किसान ने तुरई की फसल लगाई एक एकड़ में फसल वायरस से ग्रस्त हो गई थी और उत्पादन भी 50 किलो जितना ही हो रहा था। उखाड़ने की तैयारी थी। अब 1 एकड़ में सोयाबीन लगाता तो अधिकतम मुनाफा 15 से 20 हजार ही बचता सभी खर्च काटने के बाद। मैंने कुछ आवश्यक सुझाव दिए और एक महीने और रुकने के लिए कहा और आश्वस्त किया की सोयाबीन जितना मुनाफा एक महीने में मिल जाएगा।

किसान मान गया फसल को रहने दिया इस दौरान आवश्यक उपाय करने से उत्पादन 100 किलो हो गया और बाजार भाव भी ठीक मिलने लगे। एक महीने में 18000 की फसल बेच दी। बाद में अत्यधिक वर्षा से फसल खराब हुई लेकिन किसान संतुष्ट था की बिना किसी खर्च के ये शुद्ध मुनाफा रहा। अगर फसल खराब नही होती तो और होता।

ऐसा ही मिर्च उत्पादक किसान के साथ हुआ। भाव कम होने पर उसने उखाड़ने का मन बनाया। उसको कहा एक महीने की बात है। माल की तुड़ाई 50 प्रतिशत कर देना। अगर लेबर जितना पैसा भी मिल रहा है तो चलेगा। बात मान ली आगे अच्छा मुनाफा कमाया।

भाई उखाड़ना उपाय नहीं है। थोड़ा सब्र करोगे तो फल अच्छा मिलेगा। उखाड़ने में तो एक दिन लगेगा वापस फल आने में 60 दिन लगते है। 15 दिन का सब्र अगले 45 दिन अच्छे निकालेगा।

"इसलिए फसल बेचने और फसल उखाड़ते समय सोच समझकर निर्णय करें"

Yatin Mehta

फसल लागत बढ़ाने वाले ...................................कृषि में लागत का अपना ही महत्त्व है। एक बात हमेशा होती है खेती मे...
01/07/2024

फसल लागत बढ़ाने वाले ...................................

कृषि में लागत का अपना ही महत्त्व है। एक बात हमेशा होती है खेती में लागत बढ़ रही है। निश्चित रूप से लागत बढ़ रही है। खाद, बीज, दवाईयां, मशीनों का किराया, बिजली, डीजल और सबसे महत्वपूर्ण है मानव श्रम। कुछ चीजे है जो किसान के हाथ में नहीं है जैसे मानव श्रम की बढती कीमत, डीजल, पेट्रोल, बिजली के दाम। लेकिन बहुत से खर्च ऐसे है जो किसान या तो अनजाने में कर देता है, या जानते हुए करता है या किसी और को देखकर करता है। ऐसे ही कुछ खर्च जिसे किसान कम कर सकता है लेकिन करता नहीं है या करना नहीं चाहता ये नहीं पता इसके पीछे क्या कारण है वो विचारणीय जरूर है।

तीन चीजों पर किसान जो अनावश्यक खर्च करता है बहुत अखरता है। पहला है बीज, दूसरा उर्वरक और तीसरा कृषि रसायन।

बीज : एक तरफ पुराने बीज की बात चलती है, दूसरी तरफ उन्नत और संकर बीज की बात चलती है। किसान हर साल नए बीज और नई किस्म की तलाश में रहता है। बाजार में अलग ही तरह का माहौल बनाकर कई बार फसल विशेष के बीज की काला बाजारी होने लगती है। हाइब्रिड बीज (एफ - 1) को छोड़कर किसी भी बीज को हर साल नया खरीदने की जरुरत नहीं होती है। अधिकांश दलहन और तिलहन, अनाज जैसे गेहूं, जौ, बीज मसाले, औषधीय फसलों में प्रतिवर्ष बीज खरीदने की जरुरत नहीं होती है। मक्का, ज्वार, बाजरा, धान की नॉन हाइब्रिड किस्म का बीज भी हर साल खरीदने की जरुरत नहीं पड़ती है। 2 से 3 साल में एक बार बीज लेकर आगामी साल में उसी का उपयोग किया जा सकता है। एक बड़ी लागत इससे किसान की बच सकती है। लेकिन ज्यादातर किसान प्रतिवर्ष नया बीज खरीदते है।

उर्वरक : संतुलित उर्वरको का प्रयोग करने वाले किसान उंगली पर गिनने लायक भी नहीं मिलते है। जरुरत से ज्यादा या असंतुलित उर्वरको का प्रयोग करने वाले किसानो की संख्या बहुत अधिक है। हर फसल की उर्वरक आवश्यकता अलग अलग होती है। और उसी के अनुसार पूर्ति की जाने पर सर्वाधिक उत्पादन मिलता है। लेकिन वास्तविकता देखते है तो स्थिति नजर आती है की पोटाश का उपयोग बहुत कम है। सल्फर, जिंक और बोरोन का उपयोग केवल कुछ खास फसलों में किया जाता है। मैग्नेसियम, कॉपर, आयरन और मेंगनीज की कमी भी हो सकती है इस पर कभी ध्यान ही नहीं दिया जाता है। बाकि सभी बिमारियों का इलाज यूरिया के बैग में मिल ही जाता है। जबकि संतुलित उर्वरक देना ना केवल उत्पादन बढ़ाता है बल्कि किसान की लागत को भी कम करता है।

दवाईयां : तीसरा बड़ा खर्च होता है, कृषि रसायनो पर। किसान आर्थिक क्षति स्तर को नहीं जानता है। किस स्थिति में दवाई के स्प्रे की जरुरत है, कितनी मात्रा में कौनसी दवाई का उपयोग किया जाना सही होगा, दवाइयों को मिलाकर स्प्रे की जाना है। इन सब बातो से किसान अनभिज्ञ होता है। एक या दो कीटनाशी, एक फफूंदनाशी, एक एंटीबायोटिक और एक टॉनिक या NPK मिलाकर सभी फसलों में स्प्रे किया जाता है। हो सकता है इसमें से किसी एक या दो की जरुरत हो लेकिन सही पहचान नहीं होने से कॉकटेल बनाकर दिया जाता है ताकि कोई न कोई तो असर करेगा ही और नहीं किया तो अगले सप्ताह या कई बार उसके भी पहले दूसरा कॉकटेल तैयार होता है। इस कॉकटेल से बचकर किसान अपनी बहुत सी लागत को कम कर सकता है।

"लागत का कम होना मुनाफे की पहली सीढ़ी है"

Yatin Mehta

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