14/07/2026
G D अग्रवाल इनका नाम है।
ज़रा गूगल करके या जैमिनी से चैट जीपीटी से जिससे पूछना होगा पूछ लीजिएगा। ग्रेटा थनबर्ग, सोनम वांगचुक जैसे तमाम लोगों से पहले ये आदमी था। जो हिंदुस्तान कहिये या यूं कहिए प्रकृति को बचाना चाहता था। और 111 दिन के अनशन के बाद इसने अपने प्राण त्याग दिए।
मुझे आज भी याद है बस एक छोटी सी ख़बर बनी। इस देश का दलाल मीडिया और उन्मादी लोग इस महान विचारक को खा गए। इनकी पढ़ाई देखिएगा ये कोई बाबा नहीं थे।
उच्च शिक्षा: उन्होंने IIT रुड़की (तब रुड़की यूनिवर्सिटी) से सिविल इंजीनियरिंग की और फिर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक, कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले से पर्यावरण इंजीनियरिंग में Ph.D. की।
अकादमिक और प्रशासनिक कद: वह IIT कानपुर में पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख (HOD) रहे। इसके साथ ही, वह भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के पहले सदस्य सचिव (Member Secretary) भी थे।
कभी दिमाग़ फिर गया होगा तो सोचा इस देश को बचा लें। तो गंगा को बचाने के लिए अनशन पर बैठ गए।
लेकिन हमको गंगा तो बचानी नहीं थी। हम पता नहीं क्या ही बचा रहे थे? जो न ख़त्म हुआ था। न ख़त्म होगा। लेकिन हमको बचाने का ज़िम्मा दिया गया था सो सब बचा ही रहे थे। इसलिए गंगा के नाम पर धंधा हुआ कि उसको बचाना है। लेकिन बचाया नहीं गया जेबें ज़रूर भर गई।
और एक शख़्स इस दुनिया से चला गया इस देश को बचाने के लिए। हम सब मरेंगे क्योंकि हमने सही लोगों को कभी नहीं पहचाना। हम बस दलालों को सिर आंखों पर बिठाकर रखते हैं।
जिस इंसान के पास आराम, शोहरत और विदेश में बसने के तमाम रास्ते खुले थे, उसने सब कुछ छोड़कर गंगा और प्रकृति के लिए लड़ना चुना।
111 दिनों का महा-अनशन और व्यवस्था की बेरुखी। साल 2018 में, 86 वर्ष की आयु में, उन्होंने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने, उस पर बन रहे बड़े बांधों को रुकवाने और 'गंगा महाधुत कानून' पास कराने के लिए हरिद्वार में अनशन शुरू किया।
111 दिनों तक वह केवल पानी और शहद पर रहे। एक ऐसा वैज्ञानिक, जिसने देश के विकास और पर्यावरण की नीतियों को गढ़ा था, वह घुट-घुट कर मर रहा था। मुख्यधारा की मीडिया के लिए यह कोई बड़ी खबर नहीं थी। वे धार्मिक ध्रुवीकरण, राजनीतिक नूराकुश्ती और खोखले राष्ट्रवाद को बेचने में व्यस्त थे।
जीडी अग्रवाल मर गए, वो भी विदेश में रह सकते थे लेकिन उन्होंने एक ऐसा कृतघ्न देश चुना जो उनका उपकार तक न माने, वहां उन्होंने लड़ते - लड़ते मरना चुना।