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27/11/2022

ایک عراقی کہتا ہے:
ہم دنیا کی سب سے بڑی اور مضبوط اقتصادی قوت ہوا کرتے تھے، ہمارے ایک دینار کی قیمت گیارہ سعودی ریال ہوا کرتی تھی، اس دھرتی پر سب سے بڑا تیل کا ذخیرہ ہمارا ذخیرہ ہوا کرتا تھا۔ ہم ہی دنیا کی سب سے بڑی متمدن تاریخ اور علمی ورثے کے مالک ہوا کرتے تھے۔
ہم امن و سلامتی سے رہتے تھے، نعمتیں تھیں کہ دنیا بھر سے ہماری طرف کھینچی چلی آیا کرتی تھیں۔ کسی بھی عراقی کا پیدائشی حق تھا کہ جا کر حکومت سے مفت زرعی زمین کا ٹکڑا لیکر بینک سے بغیر کسی سود کے قرضہ اٹھائے اور اپنا روزگار بنا لے۔
تعلیم کا تو قصہ ہی مختلف تھا، سب کیلیئے لازمی ہوا کرتی تھی۔ جدھر دیکھو عمارتیں بنتی نظر آیا کرتی تھیں، ہمارے پاس دنیا جہان سے آ کر لوگ محنت و مزدوری کرتے تھے۔ صرف ایک ملک مصر سے ہی ہمارے پاس نوے لاکھ لوگ کما رہے تھے۔
ہماری ایران کے ساتھ چل رہی جنگ میں تو ہمیں اشد ضرورت تھی یہ غیر ملکی ملازمین ہمارے ملک کی اندرونی ضروریات کیلیئے ہمارے پاس موجود رہیں مگر جیسے ہی ہماری جنگ ختم ہوئی ہمیں ان میں سے بہت سوں کی ضرورت نا رہی۔ بہت سے لوگوں کو ہم نے عزت کے ساتھ فارغ کیا گیا تو بہت سوں کو ہمارا ملک روتے منہ بسورتے چھوڑنا پڑا اور کئیوں کے ساتھ تو زیادتی بھی ہوئی کہ ان کے مال و متاع یا کمائی پر عراقیوں نے زور و ظلم سے قبضہ کیا اور وہ روتے دھوتے اپنے ملکوں کو بھیج دیئے گئے۔
اس زمانے میں کئی روح فرسا قصے بھی دیکھنے سننے کو ملے کہ کئی غیر ملکیوں نے ان آٹھ دس سالوں میں یہاں عراق میں اپنے گھر تک بنا لیئے تھے، یہ وہ لوگ تھے جن پر سب سے زیادہ ظلم ہوا کہ اپنے گھروں کو چھوڑ کر ان کو جانا پڑا۔ ہم عراقیوں کو ایسے لگتا تھا کہ اب ہم پر کوئی زوال نہیں آنے لگا۔ نعمتیں ہماری باندیاں بنی رہیں گی اور ہم دنیا میں بہشت بریں جیسے رہیں گے۔
مگر خدا کے پاس دیر ہے اندھیر نہیں، اس کی لاٹھی حرکت میں آئی، ہم پر زوال آ گیا، ہم تقریبا بارہ سال دنیا سے کٹ کر حصار کی حالت میں ہو گئے۔ بھوک نے ہمارے گھروں کا راستہ دیکھ لیا، جنہیں ہم نے جوتے مار کر بھگایا تھا ہم انہی کے دروں پر جا پڑے اور کام اور امداد کی سبیلیں دیکھنے لگے۔ اگلے چار سالوں میں تو جس عراقی کو یمن جیسے بھوکے ملک میں کام کرنے کا لیٹر مل جاتا وہ اپنے آپ کو خوش قسمت گردانتا۔
حصار کے سال بڑھتے گئے، ہم عراقیوں نے کھجوروں کی گھٹلیوں تک کو پیس کر جو کے متبادل کے طور پر کھایا۔ گندم کھا لینا تو خواب ہی بن کر رہ گیا تھا۔ یہ سب کچھ ہمارا اپنا کیا دھرا تھا کہ جب دولت ہمارے گھر کی باندی ہوا کرتی تھی تو ہم نے کوئی ظلم روا رکھنا نہیں چھوڑا ہوا تھا اور آج ہم خود اس ظلم کی چکی تلے آ گئے تھے۔ لاچاروں اور بیکسوں پر ہمارے کیئے ہوئے ظلم اپنا رنگ دکھا رہے تھے، اس حصار میں ہم عراقیوں کے دس لاکھ سے زیادہ بچے بھوک اور بیماریوں کی وجہ سے مر گئے۔
اس حصار کے بعد سن 2003 تو ہمارے لیئے اور بھی کٹھن ہو گیا کہ امریکہ نے ہم پر قابض ہو کر ہمارا جینا مزید بیحال کر دیا۔ قتل و غارت، جان بچانے کے لالے، اور بھوک و ننگ ہمارا مقدر بن ٹھہری۔ موت ہر عراقی کے گھر میں اول جزو بن گئی۔ سن 2005 سے 2007 تک ہمارے دس لاکھ سے زیادہ لوگ قتل کر دیئے گئے، اقوام متحدہ کی رپورٹوں کے مطابق پچاس لاکھ سے زیادہ عراقی بچے یتیم ہوئے۔
ان سب حالات میں زندگی ضروریات تو عنقا ہوئیں سو ہوئیں جو مل پاتی تھیں ان کی قیمتیں آسمانوں سے باتیں کیا کرتی تھیں۔ عراق میں زندہ رہنا دنیا بھر سے زیادہ مہنگا کام ہو گیا۔ دنیا کی کوئی ایسی نکڑ نا بچی جدھر عراقی نے گھر سے بے گھر ہو جا کر پناہ نا لی۔
میں دنیا بھر میں موجود اپنے کلمہ گو مسلمانوں سے التجا کرتا ہوں کہ جو کچھ اس ملک اور اس ملک کے باشندوں کے ساتھ ہوا ہے سے سبق لے لو۔ لوگوں پر ظلم کرنے ڈرو، اپنے در پر آئے مہمانوں کی قدر کرو اس سے پہلے اللہ کی ذات تم سے اپنی نعمتیں واپس چھین لے۔
اللہ گواہ ہے جب ہم ترکی کے کسی ہوٹل میں جایا کرتے تھے تو یہ اتراک ہمیں دیکھ کر یہ کہتے ہوئے کھڑے ہوجایا کرتے تھے کہ زہے نصیب ہمارے پاس پیٹرول کا کنواں آ گیا ہے۔ اور آج ترکی کا کوئی ایسا ہوٹل نہیں ہے جس میں کوئی نا کوئی عراقی نچلے درجے کی ملازمت نا کرہا ہو۔
میں نے کچھ غلط کہا ہو تو معافی مانگتا ہوں مگر ایک بات ابھی بھی کہنا چاہتا ہوں کہ اس دنیا کی چھاؤں ڈھلتی بڑھتی رہتی ہے اور اللہ کے نظام میں دیر ہو جایا کرتی ہے اندھیر نہیں ہوا کرتا۔ اگر تم لوگ آج امن و امان اور نعمتوں میں رہ رہے ہو تو اللہ کے شکر گزار رہتے ہوئے دعا کیا کرو کہ وہ تم پر اپنا فضل قائم رکھے۔ یہ وہ سب ہے جو ہم نا کرسکے اور آج در بدر ہو کر اس کا خمیازہ بھگت رہے ہیں۔

30/05/2022
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24/05/2022

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11/05/2022

#सऊदीअरब #मुसलमान #इंडिया #पाकिस्तान #बांग्लादेश

मैं इस पोस्ट में इंडिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश के मुसलमानों को खिताब करना चाहता हूं। हिंदी में पोस्ट करने का मक़सद सिर्फ़ ये है की बात सब तक पहुंच पाए। निवेदन है की पढ़िएगा जब भी समय मिले। 95% को कड़वी लगेगी, लेकिन आईना है।

तुम समुंदर के इस पार बैठ कर अरबों को गालियां देते हो, वहां बहुत बुराई आ गई, वहां ऐसा हो गया, वहां वैसा हो गया, ये नहीं होना चाहिए था, वो नहीं होना चाहिए था। कयामत नज़दीक है। कभी सऊदी को यहूदी, तो कभी अमेरिका से जोड़ते रहते हो। यही है न???

तुम को फिक्र है की अरब में सिनेमा आ गया, तुम बहुत जायदा उनकी बुराई से परेशान हो। है ना??? लेकिन जो तुम्हारे घर में टेलीविजन की शक्ल में सिनेमा है, उसका क्या??? अल्लाह की कसम खा कर बताओ अगर नहीं है तो। जो तुम्हारे घर के मर्द और औरतें सिनेमा देखते हैं, जो तुम्हारे बच्चे इन्टरनेट और टेलीविजन पर रियलिटी शोज देखते हैं??? वो हलाल है तुम्हारे लिए??? तुम्हारे मोहल्ले में जो गाने बजाने होते हैं वो बंद करवा दिया तुम ने??? जो जाहिलो की मजलीस में कव्वाली होती हैं वो???तुम्हारी शादियों में रस्म रिवाज़ के नाम पर जो तमाशे होते हैं, वो रूकवा लिया तुम ने??? तुम्हारे लड़के जब सड़कों पर निकल कर मां बहन की गालियां देते हैं, उन्हें समझा लिया तुम ने??? जहां पर तुम अभी रहते हो, क्या वहां शरियत के हिसाब से काम हो रहे हैं??? क्यूं की वहां पर तो न यहूदी हैं, ना अमेरिका है। वहां पर तो बुराई नहीं होनी चाहीए??? तुम्हारे रिश्तेदारों के यहां जो बुराईयां हैं वो खत्म करवा लिया तुमने??? रिश्तेदार छोड़ो, जो तुम्हारे खुद के घर के अन्दर बुराईयां हैं, और तुम्हारे खुद के अंदर की बुराई है, सब मिटा ली??? चलो ये बताओ, कौम को क्या दिया तुम ने??? अरब वाले कम से कम तुम्हें काम दे रहे हैं जो तुम्हें अपने मुल्क में नही मिल रहा। वहां से पैसे ला कर तुम घर बना रहे हो, अपने परिवार की परवरिश कर रहे हो, बेटियों की शादी कर रहे हो। सच्चाई है या नहीं इस बात में???

दीन के भी मामले में कौन सा तीर मार लिया है तुम ने यही बता दो। अरबों ने कई ज़माने तक यहां की मस्जिदों और मदरसों को पैसे भेजे हैं। और यहां से वहां जा कर हर फिरके ने झूठ या सच बोल कर दीन के नाम पर चंदे लिए हैं, आज भी ले रहे हैं। कोई फिरका नही कह सकता की हम ने नहीं लिया। अगर कोई कहता है तो उससे बड़ा एहसान फरामोश कोई नहीं। तुम अपनी बताओ क्या किया??? मोहल्ले की मस्जिदें तुम से संभाली नहीं जाती। तुम्हारी इतनी भी औकात नहीं की मस्जिद के ईमाम को इतना तनखाह दे सकें की वो पूरी इज्ज़त के साथ अपने परिवार की देख भाल कर सके। तुम अपने घर के महीने का जो खर्च है वो हिसाब कर के देखना टोटल कितना होता है, और उसके बाद अपने मोहल्ले की मस्जिद के ईमाम साहब की सैलरी पूछ कर आना। मुझे मत बताना, खुद गौर करना की उनका घर कैसे चलता होगा। और पैसे की तंगी की वजह से मजबूर हो कर वो लोग फिर क़ुरानखानी, मिलाद, पीरी मूरीदी, तावीज और झाड़ फूंक का धंधा शुरू करते हैं। ताकी कुछ हज़ार रुपए इंतेजाम उपर से हो सके और परिवार की ज़रूरतें पुरी की जा सके। धंधा चलता रहे इसके लिए वो ऐसे सारे गलत चीज़ों को इस्लाम का हिस्सा बताने पर मजबूर होते हैं। क्या करें बेचारे, हक़ और सच बता कर उन्हें भूखे थोड़े ही मरना है। तो ये दिया है तुम लोगों ने कौम को। अभी और आगे चलो। इल्म के नाम पर तो तुम्हारा और भी बेड़ा गड़क है। अगर किसी दीवार पर अरबी में लिखा होगा 'यहां मत मूतिए', तुम उसको भी कुछ अच्छा समझ कर चूमने और चाटने लगोगे। इसलिए तुम को कोई कुछ भी इस्लाम के नाम पर बता कर चला जाता है तुम उस बात को ले कर झूमने लगते हो की यही दीन है। तुम्हारी इतनी भी सलाहियत नहीं की किसी बात को सही हदीस की कसौटी पर परख कर देखा जाए। तुम्हारी इतनी भी सलाहियत नहीं की तुम तहकीक कर सको की तुम्हारी मस्जिदों में इस्लाम की तालीम किन किताबों से हो रही है, और उसका नुकसान अकीदे के एतबार से उम्मत को किस तरह हो रहा है। तुम्हारी इल्मी सलाहियत इतनी भी नहीं की फरक कर सको कहानी किस्सों की किताबों और सही हदीस की किताबों में। तुम्हारे अन्दर इतना भी अकल नहीं की तबलीग का काम, अल्लाह का काम है, और वो झूठी कहानियों, और मनगढ़ंत रिवायतों से नहीं होता। तुम ने दूसरों को ठेकेदारी दे दी, और खुद बरी हो गए। तुम्हारी जाहिलयात का फायदा उठा कर तुम्हे क़ुरान को मानी-मतलब के साथ पढ़ने से रोक दिया गया। सही हादिसों का मुतालाह करने से रोक दिया गया। जो किताबें तुम्हारे हिदायत की थी, तुम्हें रौशनी की तरफ़ ले जाती, उसके बारे में तुमसे कहा गया की अगर समझ कर पढ़ोगे तो गुमराह हो जाओगे। तुम इनसे दूर रहो। बस मुर्दे बक्शवाते रहो, और फातेहा करते रहो। क़ुरान खानी और मिलाद के ज़रिए कलेजी रोटी बिरयानी खिलाते रहो। तुम्हारे मोटे अकल ने आंख बंद कर के सब मान लिया। कभी तहकीक करने की कोशिश भी नहीं की। और अब भी वही कर रहे हो। शरियत में ये योगदान है तुम्हारा। मजारों पर तुम्हारे तमाशों से दुनिया बेखबर नहीं है। गर्व महसूस करो। घर के अन्दर तुम बर्थ डे और एनिवर्सरी मना रहे हो, और सोशल मीडिया पर आकर दूसरों को यहूदी होने का फतवा लगा रहे हो। बहुत इमान वाले हो।

अमेरिका ये, अमेरिका वो, अरे अकल के अंधों वहां मुसलमान नहीं रह रहे हैं क्या??? वो मुसलमान नहीं हैं जो वहां रह रहे???? उनका अकीदा और तरीका कैसा है, कभी जानने की कोशिश की। अगर खुद से तुलना करोगे तो अपने आप पर शर्म आयेगी तुम्हें। तुम बाप दादा के दीन पर चल रहे हो, और वो लोग इस्लाम पढ़ कर, क़ुरान और हदीस समझ कर इसको अपना रहे हैं। दोनों में बहुत फरक है मंदबुद्धियों। वहां इस्लाम किस रफ्तार से फैल रहा है, तुम को अंदाज़ा है। तुम जैसे मुसलमान जब पाखण्डी और गुमराह हो गए तो अल्लाह ने वहां से नए लोगों को उठाना शुरू किया। वो लोग चांद पर पहुंच रहे हैं, और तुम क्या कर रहे हो??? तुम दीन के तो हुए नही, दुनिया को भी ले कर कुछ ख़ास नहीं कर पाए अब तक। सबसे ज़्यादा फिरके भी तुम ने ही बनाए हैं। तुम ने तो शहरों के नाम पर फिरके बना लिए। तुम्हारे यहां जो रस्म और रिवाज़ हैं, वो यहूदियों से कम हैं क्या। जो तुम यहां मार खा रहे हो, किसके हाथ की कमाई है??? अरबों की??? अमेरिकन की??? या फिर यहूदियों की???? ये तुम्हारे खुद के हाथ की कमाई है। तुम ने तीन तलाक और हलाला के नाम पर अपनी नाक कटवाई। अरबों ने नहीं काटा है। बड़ा कौम कौम करते हो। जब तुम्हारे अपने ही कौम के भाई शिर्क और बिद्दत के बारे में समझाते थे तब तो तुम मूंह फूला लेते थे। वो फलाने फिरक़ा का है इसलिए नहीं सुनेंगे। जब गैर कौम ने इज्ज़त उतारी तो तलाक-उल-बिद्दत फट से समझ में आ गई और मान भी लिया। इतना जलील और रुसवा होने के बाद भी तुम नहीं संभले तो तुम से बड़ा बेगैरत और बदकिस्मत कोई नहीं। तुम्हारी हरकतों की वजह से आने वाले वक्त में ज़ालिम और मुसल्लत कर दिए जायेंगे। खाते रहो डंडे। यहां बैठ कर उनको गाली देते हो इसलिए की वो पलट कर तुम्हें जवाब नहीं देते। या तुम्हारे घर में ताक झांक नहीं करते। वीजा लगा कर जाओ और वहां मूंह पर गाली दे कर आओ। कर पाओगे??? इसलिए अरबों के यहां ताक झांक बंद करो, अपना घर ठीक करो। बाज़ार जाओ और आईने खरीदो। यहां के मुसलमानों को आईने की बहुत जरूरत है। ख़ुद भी आईना देखो, अपने रिश्तेदारों को भी दिखाओ। किसी को तो गैरत आएगी। यकीन मानों अरब का बूरा से बूरा इंसान भी तुमसे बहुत बेहतर है। उनके यहां बहुत कुछ बचा है अभी। तुम अपनी सब लुटवा चुके हो, और कटवा भी चुके हो। फिरकावरियत की आग में जल रहे हो तुम। और उसी फिरकावरीयत की आड़ में हक़ और सही का इंकार करते आए हो तुम। तबलीग के नाम पर खोकले ईमान की भीड़ जमा की है बस, जिसके अन्दर न तकवा है, ना तौहीद। थूक से जोड़ा है उम्मत को तुम ने। बस मस्जिदें भर जाएं, भीड़ लग जाए मसजिदों में। पूरी ज़िंदगी गुज़र जाती है तबलीग में लेकिन सही हदीस की रौशनी में नमाज़ पढ़ना नहीं आता तुमको। मरने से पहले एक बार सही बुखारी खोल कर नमाज़ का तरीक़ा अपने तरीके से मैच करना तो। आंखें फटी रह जाएंगी। शर्म आयेगी तुम को। अकीदे की बात तो छोड़ो। क्वांटिटी चाहिए तुमको, क्वालिटी चूल्हे में जाए। बस टोपी की भीड़ लग जाए सड़कों और गलियों में। यही दीन समझ में आता है तुम को। इसलिए तो तुम को बुखारी-मुस्लिम पढ़ने से रोका गया है ताकी कहीं सही दीन न सीख लो। बाकी धंधे बंद न हो जाएं। इसलिए कम से कम तुम्हारा तो मूंह नही है किसी को कुछ बोलने का। वो अपना हिसाब दे देंगे, तुम अपना हिसाब ठीक करो। तुम्हारे हालात यहूदियों से भी ख़राब हैं। तुम ने मुनाफिकाना रवईया अपनाया हुआ है। तुम्हारी बहुत बड़ी तादाद मुशरिक होने की कगार पर है। तौहीद तुम्हारे घरों से लगभग लगभग निकल चुका है। दूसरों का छोड़ो, अपनी डूबती नईया संभालो। दौरे जाहिलियत के सारे रस्मों रिवाज़ तुम ने वापिस अपना लिए हैं।

अब इन बातों में तुम मेरा फिरका ढूंढोगे। नहीं??? यही और इतना ही आता है तुम को। मेरे बातों का बूरा मान लेना, लेकिन सोचना ज़रूर जो मैं ने बोला है।

02/04/2022
Mau
21/11/2021

Mau

17/09/2021

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