12/05/2022
*प्राचीन भारतीय इतिहास का सच और मिथक।*
प्रमाणित है कि सिंधु घाटी की सभ्यता के बाद वैदिक युग आया? कहाँ सिंधु घाटी की सभ्यता का नगरीय जीवन और कहाँ वैदिक युग का ग्रामीण जीवन। भला कोई सभ्यता नगरीय जीवन से ग्रामीण जीवन की ओर चलती है क्या?
सिंधु घाटी के बड़े बड़े नगरों के आलीशान भवनों की जगह कैसे पूरे उत्तरी भारत के वैदिक युग में अचानक झोंपड़ी उग आईं? कमाल इस बात का है की झोंपड़ियाँ उसी पश्चिमोत्तर भारत में उगीं, जहाँ बड़े -बड़े सिंधु साम्राज्य के भवन थे। आपको ऐसा इतिहास बोध उलटा नहीं लगता है?
आप पढ़ाते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता में लेखन कला विकसित थी और फिर उसके बाद की वैदिक संस्कृति में पढ़ाने लगते हैं कि वैदिक युग में लेखन कला का विकास नहीं हुआ था। वैदिक युग में लोग मौखिक याद करते थे और लिखते नहीं थे। ऐसा भी होता है क्या ? पढ़ी - लिखी सभ्यता अचानक अनपढ़ हो जाती है क्या?
आप यह भी पढ़ाते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता में मूर्ति कला थी। फिर उसके बाद पढ़ाते हैं कि वैदिक युग में मूर्ति कला नहीं थी। क्या यह सब उलटा नहीं है?
भारत में स्तूप स्थापत्य, लेखन कला, मूर्ति कला आदि का विकास निरंतर हुआ है। कोई गैप नहीं है। क्योंकि अगर आप सिंधु घाटी के चित्रात्मक भाषा और उसके लिपि को अशोक कालीन अभिलेख में लिखे पाली भाषा और ब्राही लिपि से मिलते है तो आपको 50% के करीब भाषा मे समानताएं दिखेगी विश्वास न हो तो अशोक के शिलालेख के लिपि और सिंधु लिपि को मिलाकर देखे।
इतिहास में ऐसा गैप आपको दिखाई पड़ रहा है तो वह वैदिक संस्कृति को भारतीय इतिहास में ऐडजस्ट करने के कारण दिखाई पड़ रहा है।
स्तूपों का इतिहास, लेखन -कला का इतिहास, मूर्ति-कला का इतिहास सभी कुछ सिंधु घाटी सभ्यता से निरंतर मौर्य काल और आगे तक जाता है। बशर्ते कि आप मान लीजिए कि सिंधु साम्राज्य से लेकर मौर्य साम्राज्य और आगे तक टूटती जुड़ती बौद्ध सभ्यता की कड़ियाँ थीं।
जैन परंपरा की तरह बौद्ध परंपरा में भी महात्म्य बुद्ध से पहले कई भिक्षु का प्रमाण है जिस तरह महावीर जैन धर्म का 24 वे तीर्थंकर थे उसी तरह बौद्ध धर्म भी जैन धर्म का परिष्कृत रूप हो और इस आधार पर अगर आप काल गणना करते है तो ये परंपरा सिंधु काल तक स्पस्ट हो जाएगी।
मोहनजोदड़ो के स्नानागार के ऊपर बने गुम्बदाकार अवशेष निश्चित रूप से बौद्ध स्तूप है न कि मंदिर क्योंकि मंदिरो में गोपुरम होती है न कि गुबादकर स्तूप।
सिंधु घाटी सभ्यता की मुहर पर ध्यानमग्न कोई बुद्ध राजकुमार ही हैं, न कि कोई शिव आप मूर्ति के नीचे दर्शक - मुद्रा में अभूषन पहने उस योगी को देख सकते है आपको लगेगा कि वो राजकुमार है न कि शिव, नीचे दो हिरण को ध्यान से देखिए। दो हिरण बौद्ध सभ्यता के प्रतीक हैं। आपका इतिहास तभी सीधा होगा, जब सिंधु घाटी की सभ्यता को बौद्ध सभ्यता मानिएगा। स्तूप, पीपल - पूजा, लिपि में धम्म चक्र आदि के अनेकों प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता में हैं।
लोग कहते है कि ये सिंधु सभ्यता भी सनातन संस्कृति ही है तो सनातन संस्कृति की शुरूआत वेद से माना जाता है उसमें आप पीपल वृक्ष से संबंधित एक भी श्लोक नही देख सकते है। ऋग्वेद में करीब 65% श्लोक इंद्र से संबंधित है औऱ इंद्र के कैरेक्टर को देखते हुए सनातन संस्कृति में आज उसका कोई महत्व ही नही है।
सम्राज्यवाद की शुरूआत अर्थात हर्यक वंस के प्रथम राजा बिंबसार से लेकर कनिष्क काल तक आप कही भी हिन्दू देवी देवता या हिन्दू धर्म को मानते हुए किसी राजा को आप नही पा सकते और न ही किसी अभिलेख, शिलालेख ताम्रपत्र, भोजपत्र में आपको संस्कृत का कोई अभिलेख या हिन्दू देवी देवताओं का नाम आपको कही मिलेगा। आखिर इतने बड़े बड़े सम्राट और राजा तथाकथित महान सनातन धर्म का पालन क्यों नही किया? वेद की संस्कृति भाषा में शिलालेख क्यों नही लिखवाया ये सब सनातन की सच्चाई को इंगित करती है।
प्राचीन काल मे जो भी शैक्षणिक केंद्र रहा था जैसे तक्षशिला, विक्रमशिला, उदंतपुरी, सोमपुरी, नालंदा यहाँ ये केवल बौद्ध शिक्षा केन्द्र क्यों था एक भी संस्कृति या सनातन शिक्षा का केंद्र इतिहासकारों को क्यों नही मिला?
प्राचीन काल मे विदेशी साहित्यकार, विद्धान कुछ सिकन्दर के साथ भी आए और कुछ मौर्य काल के समय और उसके बाद जैसे मेगस्थनीज, स्ट्रेबो, टेसियास, हेनसांग, इतसिंग, फाह्यान, टॉलमी आदि आदि किसी ने अपने ग्रंथ में हिन्दू देवी देवताओं या सनातन मंत्र का उदाहरण क्यों नही दिया? सबने एक मत से बौद्ध धर्म के बारे में ही लिखा।
कई विदेशी आक्रमणकारी आए जैसे मिनांडर, कनिष्क और उसके वंसज, हुन, शक आदि उसने भारत के भूमि पर आकर बौद्ध धर्म को ही क्यों आत्मसात किया क्या वो सनातन कालीन धर्म और देवी देवताओं से परिचित नही थे?
प्रथम विशाल गुफा अर्थात अजंता, एलोरा और बाघ की गुफा बौद्ध धर्म या जैन धर्म से प्रभावित क्यों दिखा। वहां हिन्दू देवी देवताओं का प्रारंभिक चित्र क्यों नही पाया गया?
प्राचीन कालीन जो भी राजा महाराजाओं के नाम थे उनके शब्द में पाली भाषा का नाम क्यों देखा गया?
और अंत मे संस्कृत कभी भी जनभाषा नही रहा भला जो कभी जनभाषा रहा ही नही अर्थात जो भाषा खुद ही बाझ हो वो भला अन्य भाषा की जननी कैसे हुई? और संस्कृत भाषा और उसकी लिपि कनिष्क काल के बाद ही देखने को मिलता है।
इन तथ्यों पर गौर करने पर संस्कृति की स्वरूप सनातन तो बिल्कुल नही लगता बल्कि बौद्ध संस्कृति की ओर संकेत करता है क्योंकि आज भी भारतीय उप महादीप के से घिरे देशो में बौद्ध धर्म का प्रभाव निरंतरता के साथ है जैसे श्री लंका, भूटान, म्यांमार, चीन, और अब नेपाल भी आदि आदि केवल भारत और पाकिस्तान को छोड़कर। मतलब बौद्ध धर्म के बाद भारत और पाकिस्तान क्षेत्रो में एक नया धर्म का प्रभाव पनपा जिसे कुचलकर फिर मुस्लिम धर्म का प्रभाव देखा गया बाद में भारत हिन्दू और पाकिस्तान मुस्लिम देश बना।