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K.U.K Admission Notice: 2026-27
07/05/2026

K.U.K Admission Notice: 2026-27

03/01/2026
24/12/2025

♦एक राजा को राज भोगते हुए काफी समय हो गया था । बाल भी सफ़ेद होने लगे थे । एक दिन उसने अपने दरबार में एक उत्सव रखा और अपने गुरुदेव एवं मित्र देश के राजाओं को भी सादर आमन्त्रित किया । उत्सव को रोचक बनाने के लिए राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को भी बुलाया गया ।

♦ राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्रायें अपने गुरु जी को भी दीं, ताकि यदि वे चाहें तो नर्तकी के अच्छे गीत व नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें । सारी रात नृत्य चलता रहा । ब्रह्म मुहूर्त की बेला आयी । नर्तकी ने देखा कि मेरा तबले वाला ऊँघ रहा है, उसको जगाने के लिए नर्तकी ने एक दोहा पढ़ा -
"बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिताय।
एक पलक के कारने, क्यों कलंक लग जाय ।"

♦ अब इस दोहे का अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने अनुरुप अलग-अलग अर्थ निकाला । तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा ।

♦ जब यह बात गुरु जी ने सुनी तो उन्होंने सारी मोहरें उस नर्तकी के सामने फैंक दीं ।

♦ वही दोहा नर्तकी ने फिर पढ़ा तो राजा की लड़की ने अपना नवलखा हार नर्तकी को भेंट कर दिया ।

♦ उसने फिर वही दोहा दोहराया तो राजा के पुत्र युवराज ने अपना मुकट उतारकर नर्तकी को समर्पित कर दिया ।

♦ नर्तकी फिर वही दोहा दोहराने लगी तो राजा ने कहा - "बस कर, एक दोहे से तुमने वैश्या होकर भी सबको लूट लिया है ।"

♦ जब यह बात राजा के गुरु ने सुनी तो गुरु के नेत्रों में आँसू आ गए और गुरु जी कहने लगे - "राजा ! इसको तू वैश्या मत कह, ये तो अब मेरी गुरु बन गयी है । इसने मेरी आँखें खोल दी हैं । यह कह रही है कि मैं सारी उम्र संयमपूर्वक भक्ति करता रहा और आखिरी समय में नर्तकी का मुज़रा देखकर अपनी साधना नष्ट करने यहाँ चला आया हूँ, भाई ! मैं तो चला ।" यह कहकर गुरु जी तो अपना कमण्डल उठाकर जंगल की ओर चल पड़े ।

♦ राजा की लड़की ने कहा - "पिता जी ! मैं जवान हो गयी हूँ । आप आँखें बन्द किए बैठे हैं, मेरी शादी नहीं कर रहे थे और आज रात मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था । लेकिन इस नर्तकी ने मुझे सुमति दी है कि जल्दबाजी मत कर कभी तो तेरी शादी होगी ही । क्यों अपने पिता को कलंकित करने पर तुली है ?"

♦ युवराज ने कहा - "पिता जी ! आप वृद्ध हो चले हैं, फिर भी मुझे राज नहीं दे रहे थे । मैंने आज रात ही आपके सिपाहियों से मिलकर आपका कत्ल करवा देना था । लेकिन इस नर्तकी ने समझाया कि पगले ! आज नहीं तो कल आखिर राज तो तुम्हें ही मिलना है, क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेता है । धैर्य रख ।"

♦ जब ये सब बातें राजा ने सुनी तो राजा को भी आत्म ज्ञान हो गया । राजा के मन में वैराग्य आ गया । राजा ने तुरन्त फैसला लिया - "क्यों न मैं अभी युवराज का राजतिलक कर दूँ ।" फिर क्या था, उसी समय राजा ने युवराज का राजतिलक किया और अपनी पुत्री को कहा - "पुत्री ! दरबार में एक से एक राजकुमार आये हुए हैं । तुम अपनी इच्छा से किसी भी राजकुमार के गले में वरमाला डालकर पति रुप में चुन सकती हो ।" राजकुमारी ने ऐसा ही किया और राजा सब त्याग कर जंगल में गुरु की शरण में चला गया ।

♦ यह सब देखकर नर्तकी ने सोचा - "मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए, लेकिन मैं क्यूँ नहीं सुधर पायी ?" उसी समय नर्तकी में भी वैराग्य आ गया । उसने उसी समय निर्णय लिया कि आज से मैं अपना बुरा धंधा बन्द करती हूँ और कहा कि "हे प्रभु ! मेरे पापों से मुझे क्षमा करना । बस, आज से मैं सिर्फ तेरा नाम सुमिरन करुँगी ।"

♦ समझ आने की बात है, दुनिया बदलते देर नहीं लगती । एक दोहे की दो लाईनों से भी हृदय परिवर्तन हो सकता है । बस, केवल थोड़ा धैर्य रखकर चिन्तन करने की आवश्यकता है ।

♦ प्रशंसा से पिघलना नहीं चाहिए, आलोचना से उबलना नहीं चाहिए । नि:स्वार्थ भाव से कर्म करते रहें । क्योंकि इस धरा का, इस धरा पर, सब धरा रह जायेगा

🚩🚩 🙏🌹

HTET
24/12/2025

HTET

Kurukshetra University Private Forms for BA,MA FULL/IMPROVEMENT/ADDITIONAL
23/12/2025

Kurukshetra University Private Forms for BA,MA FULL/IMPROVEMENT/ADDITIONAL

15/12/2025

किसी चीज का अगर चोरी होने का अंदेशा हो तो
उसे किताबों मै छुपा दो,,क्यो कि ये कौम अब अपनी किताबें नहीं खोलती ✍🏻

23/11/2025

घर से भागी हुई बेटियों का पिता हो या ससुराल से भागी पत्नी का पति...???
इस दुनिया का सबसे अधिक टूटा हुआ व्यक्ति होता है,
पहले तो वो महीनों तक घर से निकलता ही नही और फिर जब निकलता है तो हमेशा सिर झुका कर चलता है, आस पास के मुस्कुराते चेहरों को देख उसे लगता है जैसे लोग उसी को देख कर हँस रहे हों, जीवन भर किसी से तेज स्वर में बात नहीं करता, डरता है कहीं कोई उसकी भागी हुई बेटी का नाम न ले ले, जीवन भर डरा रहता है, अंतिम सांस तक घुट घुट के जीता है, और अंदर ही अंदर रोता रहता है।

जानते हैं भारतीय समाज अपनी बेटियों को लेकर इतना संवेदन शील क्यों है,
भारतीय इतिहास में हर्षवर्धन के बाद तक अर्थात सातवीं आठवीं शताब्दी तक बसन्तोत्सव मनाए जाने के प्रमाण मौजूद हैं, बसन्तोत्सव बसन्त के दिनों में एक महीने का उत्सव था जिसमें विवाह योग्य युवक युवतियाँ अपनी इच्छा से जीवनसाथी चुनती थीं और समाज उसे पूरी प्रतिष्ठा के साथ मान्यता देता था,
आश्चर्यजनक है ना आज उसी देश में कुछ गांवों की पंचायतें जो प्रेम करने पर कथित रूप से मृत्यु दण्ड तक दे देती थी, पता है क्यों? इस क्यों का उत्तर भी उसी इतिहास में है, वो ये कि भारत पर आक्रमण करने आया मोहम्मद बिन कासिम भारत से धन के साथ और क्या लूट कर ले गया था जानते हैं, सिंधु नरेश दाहिर की दो बेटियां... उसके बाद से आज तक प्रत्येक आक्रमणकारी यही करता रहा है.. गोरी, गजनवी, तैमूर सबने एक साथ हजारों लाखों बेटियों का अपहरण किया, प्रेम के लिए...?
नहीं...
बिल्कुल नही...
उन्होंने अपहरण किया सिर्फ और सिर्फ बलात्कार व यौन दासी बनाने के लिए,

जबकि भारत ने किसी भी देश की बेटियों को नहीं लूटा, भारत की बेटियाँ सब से अधिक लूटी गई हैं, कासिम से ले कर गोरी तक, खिलजी से ले कर मुगलों तक, अंग्रेजों से ले राँची के उस रकीबुल हसन ने राष्ट्रीय निशानेबाज तारा सहदेव को, आफताब ने श्रद्धा को, सबने भारत की बेटियों को लूटा....

भारत का एक सामान्य पिता अपनी बेटी के प्रेम से नहीं डरता, वह डरता है अपनी बेटी के लूटे जाने से!

भागी हुई लड़कियों के समर्थन में खड़े होने वालों का गैंग अपने हजार विमर्शों में एक बार भी इस मुद्दे पर बोलना नहीं चाहता कि भागने के साल भर बाद ही उसका कथित प्रेमी अपने दोस्तों से उसके साथ दुष्कर्म क्यों करवाता है, उसे कोठे पर क्यों बेंच देता है या उसे अरब देशों में लड़की सप्लाई करने वालों के हाथ क्यों बेंच देता है, आश्चर्य हो रहा है न, पर सच्चाई यही है..!!

देश के हर रेडलाइट एरिया में सड़ रही प्रत्येक बेटी जिहादियों द्वारा प्रेम के नाम पर फँसा के यहां लाई जाती है,

उन बेटियों पर, उस "धूर्त प्रेम" पर कभी कोई चर्चा नहीं होती, उनके लिए कोई मानवाधिकार वादी, कोई स्त्री वादी विमर्श नहीं छेड़ता।

यही एक पिता की आज्ञा ना मान कर गलत व्यक्ति के साथ भागी हुई बेटियों का सच है...??
प्रेम के नाम पर "पट" जाने वाली मासूम बेटियां नहीं जानती कि वे अपने व अपने पिता के लिए कैसा अथाह दुःख का सागर खरीद रही हैं जानता और समझता है तो बस उनका बेबस निरीह पिता।

29/10/2025

दुनिया ने जितनी भी तरक्की की उसमें सबसे उम्दा थी लड़कियों के हाथ में किताब..

23/09/2025

संगत का जरा ध्यान रखिएगा क्योंकि संगति आपकी खराब होगी और बदनाम आपके पिता के संस्कार होंगे।

08/09/2025

'आपने कभी कोई मेहनत नहीं की तो अपने बच्चों से भी किसी चमत्कार की उम्मीद मत रखिये'

किसी जमाने में जब मैं युवा थी... मेरी शादी नारायणमूर्ति से हुई थी. एक दिन मूर्ति ने मुझे बताया मुंबई के एक बड़े रईस ने हमें डिनर पर बुलाया है. कफ परेड में उनका बड़ा सा बंगला था. मैं बेहद सामान्य परिवार की, एक डॉक्टर और प्रोफेसर की बेटी!

मैं पहली बार किसी रईस का घर देखने वाली थी. हम उनके घर गए चांदी की थाली में खाना परोसा गया. डिनर के बाद जब हम घर आए तो मेरे मुंह से निकला 'सो पुअर'! नारायणमूर्ति बोले- 'तुम ऐसा कैसे कह सकती हो?' मैंने कहा उनके ड्राइंग रूम में एक भी किताब नहीं थी'.

हाल ही में मेरी एक पुरानी स्टूडेंट मेरे पास अपनी बिटिया को लेकर आई और बोली- 'मेरी बेटी बिल्कुल नहीं पढ़ती है और आपको मेरी मदद करनी है कि वह पढ़ना शुरू करे '. मैंने स्टूडेंट से पूछा 'बताओ, आप कितनी किताबें पढ़ती हो?' उसका जवाब था 'मुझे क्यों बुक रीड करनी चाहिए?' मैंने कहा 'अगर आप रीडिंग नहीं करेंगी तो यह उम्मीद मत रखिएगा कि आपके बच्चे रीडिंग करेंगे'. स्टूडेंट का कहना था 'मैं चाहूंगी कि मेरे बच्चे स्टडी करें ना कि रीड.' मैंने कहा रीडिंग और स्टडी एक तरह से समान ही है.'

जब मां नहीं पढ़ेगी तो बच्चे भी नहीं पढ़ेंगे।मैं हर माँ से गुजारिश करूंगी कि वह जरूर किताबे पढ़ा करें. ऐसा नहीं है कि पिता नहीं पढ़ सकते दोनों बराबर हैं लेकिन लॉजिकली, मां ज्यादा जिम्मेदार होती है. मां का असर कुछ अधिक होता है. इसी वजह से तो हम कहते हैं मातृभाषा. फादर टंग आपने कभी नहीं सुना होगा. जिंदगी में हर चीज की कीमत है, सिवाय मां के प्यार के. इसलिए मां की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है.

आप अपने बच्चों से किसी चमत्कार की उम्मीद मत कीजिए, खासतौर पर तब जबकि आपने उसके लिए मेहनत नहीं की है. अगर आप चाहते हैं कि बच्चे पढ़ने की आदत डालें तो आप भी जनरल रीडिंग शुरू कीजिए. रीडिंग वाकई बेहतरीन आदत है. यह बात भी उतनी ही सही है जो लोग अच्छा लिख सकते हैं. वे पढ़ते काफी हैं.

मैं इस उम्र में भी 2 से 3 घंटे पढ़ती हूं. शायद इसी कारण हम कर्नाटक में ही 60000 लाइब्रेरी स्थापित कर पाए हैं. यह तभी संभव हुआ जब हमने समझा कि रीडिंग बेहद आवश्यक है. अगर किसी इंसान के पास भव्य बंगला है लेकिन एक किताब नहीं है उसे मैं अत्यधिक गरीब मानूंगी.

आपके पास कुछ भी स्थाई तौर पर नहीं रहने वाला है. महाभारत में किसी ने अर्जुन से पूछा कि तुम इतने खूबसूरत हो, तुम्हारी पत्नी भी बेहद खूबसूरत है, तुम राजकुमार हो... फिर क्यों तुम अपने गुरु द्रोण की इतनी चिंता करते हो? अर्जुन का जवाब था - 'उम्र के साथ खूबसूरती ढल जाएगी, राजपाट छीन सकता है, सोना चांदी तो कोई चुरा भी सकता है, ज्ञान ही है जो इंसान का साथ कभी नहीं छोड़ता.'

ज्ञान तो ऐसा है जो बांटने से बढ़ता है, इसलिए टीचर्स, आप पर भी भारी जिम्मेदारी है. मैं माँओं और टीचर से खासतौर पर कहूंगी कि रीडिंग की आदत बच्चों में आप ही डाल सकते हैं, मिसाल पेश कीजिए किसी को रोल मॉडल की जरूरत नहीं है. दस साल तक के बच्चों के रोल मॉडल उनके पेरेंट्स ही होते हैं. अगर आप नहीं पढ़ेंगे तो बच्चा भी नहीं पढ़ेगा. इसके लिए आपको घर से टीवी हटाना भी पड़े तो हटाइए. मैंने भी अपने बच्चों को 18 साल की उम्र तक टीवी नहीं देखने दिया. मैं उन्हें कहती थी कि तुम टीवी पर क्या देखोगे, मैं ही तुम्हें कहानियां सुना देती हूं. अगर टीवी है भी तो उसे देखने के वक्त को सीमित कीजिए, सप्ताह में एक घंटा काफी होगा.

पेरेंट्स बच्चों को केवल रेस्त्रां में नहीं ले जाएं. उन्हें घुमाने जाएं, तो कुछ सीखने का उद्देश्य हो. ऐसी जगह जहां उन्हें ज्ञान मिले. कभी लिटरेचर फेस्टिवल जाया जा सकता है तो कभी म्यूजियम. शुरुआती दस साल ऐसा कीजिए बच्चों को इसकी आदत हो जाएगी.

(2017 के नींव लिटरेचर में पढ़ने का महत्व समझाती सुधा मूर्ति)

23/08/2025

तुम्हें यह आदत छोड़नी होगी कि या तो किसी और जैसा बनो या फिर कुछ भी न बनो—
दूसरों की आवाज़ों की नकल करना और दूसरों के चेहरों को अपना समझने की भूल करना।

जब भाग्य बाहर से मनुष्य के पास आता है, तो वह उसे उसी तरह गिरा देता है जैसे तीर किसी हिरण को गिरा देता है।
लेकिन जब भाग्य भीतर से, उसके अंतःकरण से आता है, तो वह उसे मज़बूत बना देता है, उसे देवता बना देता है…

जिस मनुष्य ने अपने भाग्य को पहचान लिया, वह कभी उसे बदलने का प्रयास नहीं करता।
भाग्य को बदलने की कोशिश करना बचकाना काम है, जो मनुष्यों को आपस में झगड़ने और एक-दूसरे की हत्या करने तक ले जाता है।

सारा दुख, विष और मृत्यु बाहरी, थोपे गए भाग्य हैं।
लेकिन हर सच्चा कर्म, हर वह चीज़ जो पृथ्वी पर अच्छी है, आनंदमय है, फलदायी है—वह जीया हुआ भाग्य है,
वह भाग्य है जो स्वयं बन गया है।

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