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29/04/2023
05/04/2023
04/04/2023
13/02/2023

अकेलेपन से गुज़र रहे हो
मतलब सही रास्ते पर चल रहे हो।

13/02/2023

GHATAK : 8 NOV 1996
घातक एक कल्ट क्लासिक रचना है... ऐसी फिल्म अब दोबारा से बन ही नहीं सकती...इस फिल्म को लोग " ये मजदूर का हाथ है कात्या" जैसे डायलॉग की वजह से याद रखते हैं लेकिन ये फिल्म उससे कहीं अधिक है।

फिल्म के एक सीन में काशी का पिता अस्पताल में भर्ती होता है और उसे पता लगता है कि उसके पिता को कैंसर हो गया है और उसे ये बात अपने पिता से छुपानी होती है लेकिन काशी अपना दर्द छुपा नहीं पाता और अपने पिता के सामने रोने लगता है...ये सीन जितनी भी बार देखो हर बार इमोशनल कर देता है और साबित करता है सन्नी देओल भी उच्च लेवल के एक्टर हैं।

फिल्म के एक अन्य दृश्य में काशी का भाई काशी से कहता है कि मैं ये जगह छोड़कर गांव जा रहा हूं गांव में भी अपनी जमीन है... इसके जवाब में काशी कहता है कि कौनसी जमीं भैया?
बुजदिल की कही कोई जमीन नहीं होती...आज आप कात्या के डर से ये जगह छोड़ रहे हैं कल को गांव में कोई कात्या पैदा हो गया तो कहा जाओगे???
ये सीन भारतीय सिनेमा में ऐतिहासिक है... ऐसे डायलॉग वर्षों में एक दो बार ही लिखे जा सकते हैं... देखने वालों की रगों में भी ये सीन जोश भर देता है।

इस फिल्म से पहले अमरीश पुरी सैकड़ों फिल्मों में विलेन का रोल कर चुके थे लेकिन यहां पर उन्होंने एक रोगग्रस्त लाचार पिता की भुमिका निभाई थी... अपने बेटे काशी को बचाने के लिए वो कात्या के पैरों में जाकर गिर पड़े थे...ये सीन देखने में दर्दनाक था लेकिन इस सीन में अमरीश पुरी साहब ने अपनी अद्भुत अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किया है।

अपने पिता और भाई की मौत के बाद तो जब जब काशी का मुकाबला कात्या और कात्या के भाईयों से होता है तब तब लगता ही नहीं कि हम कोई फिल्म देख रहे हैं...ऐसा लगता है कि ये कोई फिल्म ना चलकर कोई लाइव घटना चल रही है...ये राजकुमार संतोषी के उम्दा निर्देशन का कमाल था....लास्ट के कुछ दृश्यों में तो ऐसा लगता है कि सन्नी देओल सचमुच में ही इन लोगों को मार देगा... सन्नी देओल को घायल के लिए नेशनल अवार्ड मिला था लेकिन घातक फिल्म घायल से भी ज्यादा बेहतर फिल्म है... घातक जैसी रचनाएं रोज रोज नहीं होती... आजकल के बनावटी एक्शन दृश्यों वाली फिल्मों जिसमें हीरो ज़मीन पर पैर रखता है और गुंडे हवा में उड़ने लगते हैं उन सीनों से लाख गुना बेहतर थे घातक के एक्शन दृश्य।

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12/02/2023

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10/02/2023

ताजमहल प्रेम का स्मारक नहीं है

तस्वीर में दिख रही महिला की फोटो को अगर आप जूम करके देखेंगे तो आपको उनके गले में पहना हुआ एक बड़ा सा हीरा नजर आएगा। यह 254 कैरेट का जुबली हीरा है जो आकार और वजन में विश्व प्रसिद्ध 'कोहेनूर' हीरे के बराबर है।

यह महिला हैं मेहरबाई टाटा जो जमशेदजी टाटा की बहू थीं और उनके सबसे बड़े बेटे सर दोराबजी टाटा की पत्नी थीं।

वर्ष 1924 में जब प्रथम विश्व युद्ध के कारण मंदी आई और टाटा कंपनी के पास कर्मचारियों को वेतन देने के लिए पैसे नहीं थे। तब मेहरबाई ने इम्पीरियल बैंक में अपना अमूल्य जुबली हीरा 1 करोड़ रुपये में गिरवी रख दिया था, जिससे कि कर्मचारियों को नियमित वेतन मिलता है और कंपनी चलती रहती है।

ब्लड कैंसर से उनकी असामयिक मृत्यु के बाद, सर दोराबजी टाटा ने भारत में कैंसर रोगियों के बेहतर इलाज के लिए इस हीरे को बेचकर टाटा मेमोरियल कैंसर रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना की।

प्यार के लिए बना यह स्मारक मानवता के लिए एक उपहार है। विडम्बना देखिए, हम ताजमहल को प्रेम का स्मारक बताकर उसका गुणगान करते रहते हैं और हमें जीवन देने वाले का इतिहास भी नहीं जानते।

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