07/08/2026
#हिंदी आलोचना की बदलती ज़मीन
हिंदी आलोचना के कई घर-घाट हैं, किंतु उसका पुराना ठाट अब नहीं रहा। इसका सबसे बड़ा कारण वही शिविरगत बंदरबाँट है जिसने आलोचना की स्वतंत्र वैचारिक परंपरा को धीरे-धीरे क्षीण कर दिया। हिंदी की जातीय और पारंपरिक आलोचना, जिसने एक समय भारतीय साहित्यिक चिंतन को अपनी विशिष्ट पहचान दी थी, उसका अपेक्षित विकास आगे नहीं हो सका। परिणामस्वरूप हिंदी में वैचारिक और सैद्धांतिक आलोचना का विकास लगभग अवरुद्ध हो गया। पिछली शताब्दी में आलोचना-दृष्टि का उल्लेखनीय विकास हुआ था, किंतु वह परंपरा आगे पर्याप्त विस्तार नहीं पा सकी। कुछ सर्जनात्मक समीक्षाएँ अवश्य सामने आयीं जिन्होंने पाठकों का ध्यान आकर्षित किया, पर आलोचना की सुदृढ़ सैद्धांतिकी धीरे-धीरे परिदृश्य से ओझल होती चली गयी। आज जो आलोचना बची है, वह प्रायः पुस्तक-समीक्षा तक सीमित होकर गौण होती जा रही है। समीक्षा की अंतर्दृष्टि भी प्रायः उतनी गहरी नहीं दिखती कि उससे आलोचना के नये प्रतिमान विकसित होने की आशा की जा सके। इसका कारण यह है कि आलोचक होने के लिए जिस सतत अध्ययन, मनन और बौद्धिक अनुशासन की आवश्यकता होती है, वह अब विरल होता जा रहा है। आज अधिकांशतः कवि, कथाकार और अन्य रचनाकार ही समीक्षा लिखते दिखाई देते हैं। यह अपने-आप में कोई बुरी बात नहीं है, किंतु आलोचना का कर्म एक विशिष्ट रससिद्धि और आजीवन समर्पण की माँग करता है। समकालीन हिंदी आलोचना का एक बड़ा भाग विमर्शात्मक और व्यावहारिक आलोचना तक सीमित दिखाई देता है। विचारोत्तेजक लेखन अवश्य हो रहा है, पर सैद्धांतिक आलोचना का रचनात्मक विकास नहीं दिखता । इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि सैद्धांतिक आलोचना का युग पीछे छूट चुका है और व्यावहारिक आलोचना अर्थात् पुस्तक-समीक्षा का समय चल रहा है।
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यही कारण है कि आज आलोचना और समीक्षा के बीच का भेद भी धुँधला पड़ गया है। समीक्षा अंततः रचना-आधारित आलोचना है और वही आगे चलकर मानदंड भी निर्मित करती है। उससे आलोचना के निष्कर्ष निकलने चाहिए। किंतु आज स्थिति यह है कि समीक्षक प्रायः समीक्षात्मक कृतियों की ही समीक्षा कर रहे हैं। परिणामस्वरूप नये रचनात्मक मानदंड विकसित नहीं हो पा रहे। जिन कृतियों में ऐसे मानदंडों की संभावना है, उन पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा। इस प्रकार हिंदी आलोचना पुस्तक-समीक्षा के रास्ते चलते हुए एक प्रकार के विचलन और बिखराव की शिकार हो गयी है। समीक्षक उस मूल आलोचनात्मक ध्वनि को अपने समीक्षा-कर्म में पूरी तरह विन्यस्त नहीं कर पा रहे हैं, जो हिंदी आलोचना की परंपरा की पहचान रही है। कुल मिलाकर इक्कीसवीं सदी में हिंदी आलोचना की पुरानी ज़मीन खिसक चुकी है, जबकि नयी ज़मीन अभी तैयार नहीं हो सकी है। पुस्तक-समीक्षाएँ, फ़ेसबुक टिप्पणियाँ और विमोचन-भाषणों के माध्यम से पुस्तकें हमारी आँखों के सामने आती-जाती रहती हैं, किंतु वे बाइस्कोप के दृश्य की तरह क्षणिक उपस्थिति भर बनकर रह जाती हैं। उनसे रचनाकारों को कोई स्थायी प्रेरणा नहीं मिलती। ऐसी स्थिति में यही आशा की जा सकती है कि लेखक और पाठकों के बीच से ही कोई ऐसा वर्ग तैयार होगा जो परंपरा, आधुनिकता और संक्रमण के बीच की रचनात्मक गति का निष्पक्ष जायज़ा ले सके और अपने समय की वास्तविक सर्जनात्मकता की पहचान कर सके। प्रतिभा हर युग में होती है, किंतु उसकी रचनात्मक अन्विति को पकड़ना, उसे स्थिर कर विश्लेषित करना सहज नहीं होता।
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नयी आमदः स्वर्ण झनक
इसी बीच आज यह किताब मिली। पुस्तक का नाम निराला जी की सुप्रसिद्ध शोकगीति ‘सरोज स्मृति’ के उस अंश से प्रेरित है जिसमें वह कहते हैं कि सरोज को नानी के घर से लेकर वह उसी तरह चले जैसे कोई भिक्षुक स्वर्ण के गहने लेकर चलता है। उसमें उन झनकते-खनकते (जो छिपाये न छिपे!) स्वर्णाभूषणों को सुरक्षित रखने का भय और लाचारी -दोनों बातें अनुस्यूत हैं। यह पुस्तक इस ब्याज से कई संकेत करना चाहती है, कुछ अपने बारे में और कुछ हिंदी आलोचना के वैभव और उसकी ध्वन्यात्मकता के बारे में।यह नहीं कहूँगा कि उनकी प्रत्येक स्थापना से मैं सहमत हूँ, किंतु जिन लेखकों और कृतियों के बहाने उन्होंने प्रश्न उठाए हैं, वे आकर्षित करते हैं और सोचने के लिए बाध्य करते हैं। लेखकद्वय ने पुस्तक को तीन खंडों—कारण, प्रतिस्मरण और उदाहरण—में विभाजित किया है। पहला खंड भक्ति आंदोलन, सूर, तुलसी और भारतेंदु पर केंद्रित है और प्रचलित आलोचना की भूमि पर आगे बढ़ता है। ‘प्रतिस्मरण’ शीर्षक विशेष रूप से ध्यान खींचता है, क्योंकि आलोचना का एक महत्त्वपूर्ण कार्य केवल स्मरण नहीं, स्मरण के कारणों और उसकी सांस्कृतिक निरंतरता की खोज भी है। हम अपने साहित्यिक आकार और उसकी व्यापकता को तो देखते हैं, पर उस आयतन को कम समझते हैं जिसमें महान कृतियाँ समय के भीतर सुरक्षित रहती हैं। वे जितनी प्रतिस्मृत होती हैं, हम उतने ही उनके रचनाकारों के प्रति प्रतिश्रुत भी बने रहते हैं। यही आलोचना की निरंतरता है।
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प्रतिस्मरण खंड में कुबेरनाथ राय पर दो निबंध हैं। विशेषतः रस आखेटक के संपादन के प्रसंग में उठाए गए प्रश्न विचारणीय हैं। कुँवर नारायण और विष्णु खरे पर लिखे गए लेख भी अनेक बहसों को जन्म देते हैं। ‘उदाहरण’ खंड में मुर्दहिया और चंद्रकांता पर लिखे गए लेख अधिक प्रभावी लगे। इन दोनों लेखकों के प्रयास का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि उन्होंने मिलकर हिंदी की वर्तमान रचनात्मकता को समझने का उद्यम किया है। भारतीय कविता की शास्त्रीय समझ को नये सिरे से देखने की उनकी आकांक्षा स्पष्ट दिखाई देती है। फिर भी एक प्रश्न अंत तक बना रहता है—जिस आलोचनात्मक दृष्टि के सहारे वे यह कार्य कर रहे हैं, उसके औज़ार क्या हैं? जब तक आलोचना अपने औज़ारों, अपनी पद्धति और अपनी सैद्धांतिकी को स्पष्ट नहीं करेगी, तब तक हिंदी आलोचना की नयी ज़मीन पूरी तरह तैयार नहीं हो सकेगी। इस पुस्तक का महत्त्व इसी बात में है कि वह इन प्रश्नों को पुनः हमारे सामने उपस्थित करती है। इन दोनों लेखकों से आशा होती है।
इन्हें शुभकामनाएँ ।
#आकुसि