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Vera Prakashan साहित्यिक पुस्तकों का नया घर

किताब : जैसे नदियाँ सावन में | छंदोबद्ध कविताएँलेखक : प्रकाश प्रियमअमेज़न, फ्लिपकार्ट एवं रेख़्ता बुक्स पर उपलब्ध
11/08/2026

किताब : जैसे नदियाँ सावन में | छंदोबद्ध कविताएँ
लेखक : प्रकाश प्रियम

अमेज़न, फ्लिपकार्ट एवं रेख़्ता बुक्स पर उपलब्ध

किताब : ऑफ़लाइन बचपन के क़िस्से | संस्मरणलेखक : डॉ. अमित भारद्वाजअमेज़न, फ्लिपकार्ट एवं रेख़्ता बुक्स पर उपलब्ध
11/08/2026

किताब : ऑफ़लाइन बचपन के क़िस्से | संस्मरण
लेखक : डॉ. अमित भारद्वाज

अमेज़न, फ्लिपकार्ट एवं रेख़्ता बुक्स पर उपलब्ध

गुनाह क्या है? सही और गलत की परिभाषा कौन तय करता है? ये सवाल जितना पुराना है, उतना ही जटिल भी। समाज और इंसान, दोनों ही अ...
11/08/2026

गुनाह क्या है? सही और गलत की परिभाषा कौन तय करता है? ये सवाल जितना पुराना है, उतना ही जटिल भी। समाज और इंसान, दोनों ही अपने-अपने अनुभव, संस्कार, परिस्थितियों और स्वार्थ के अनुसार गुनाह की परिभाषा अपने हिसाब से गढ़ लेते हैं। सदियों से धर्म और परंपराओं का सहारा लेकर स्त्रियों को मर्यादा, लज्जा और संस्कारों की बेड़ियों में जकड़ा गया है। स्त्री के लिए धर्म ने नियम बनाए- वह कैसी दिखेगी, कैसे बोलेगी, किससे मिलेगी, किससे प्रेम करेगी और किससे प्रेम नहीं करेगी। वह जिससे प्रेम करे वह उसके धर्म का होना चाहिए। यहाँ तक कि क्या सोचेगी, इसका भी निर्धारण कर दिया गया। जब वह इन दायरों को लांघने की कोशिश करती, तो उसे संस्कारहीन, गुनहगार ना जाने क्या-क्या कह दिया जाता है। कौन तय करेगा कि असली गुनाहगार कौन है? कानून, धर्म, परंपराएँ या फिर वो शक्तिशाली लोग, जो अपने फायदे के हिसाब से सही-गलत की लकीरें खींचते हैं?

*हरिशंकर शर्मा की नई पुस्तकें*पंडित राधेश्याम कथावाचक की ‘राधेश्याम रामायण’ नवजागरण-काल की लोकचेतना, सामाजिक सुधार और हि...
09/08/2026

*हरिशंकर शर्मा की नई पुस्तकें*

पंडित राधेश्याम कथावाचक की ‘राधेश्याम रामायण’ नवजागरण-काल की लोकचेतना, सामाजिक सुधार और हिन्दी खड़ी बोली के निर्माण की सशक्त अभिव्यक्ति है। ‘राधेश्याम रामायण : संस्करणों पर दृष्टि’ 1916 से 1982 तक के संस्करणों की विकास-यात्रा, भाषा-शुद्धिकरण, नारी-दृष्टि और युगधर्म का गहन अध्ययन प्रस्तुत करती है।

महाभारत पर आधारित लाला शालिग्राम वैश्य कृत ‘अभिमन्यु’ और पं. राधेश्याम कथावाचक कृत ‘वीर अभिमन्यु’ हिन्दी नाट्य-परंपरा के दो ध्रुव हैं। ‘अभिमन्यु एवं वीर अभिमन्यु का नाट्य विवेचन’ दोनों का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए स्पष्ट करता है कि कथावाचक का नाटक पौराणिक आख्यान के साथ राष्ट्रीय चेतना और युग की आवाज़ है।

दोनों पुस्तकें शोधार्थियों और साहित्य-प्रेमियों के लिए आवश्यक संदर्भ-ग्रंथ हैं।

ये पुस्तकें अमेज़न, फ्लिपकार्ट और रेख़्ता बुक्स पर उपलब्ध हैं। अतिरिक्त छूट के साथ मंगवाने के लिए प्रकाशन के व्हाट्सएप नंबर 9680433181 पर ऑर्डर करें।

पुस्तक : ऑफ़लाइन बचपन के क़िस्से | संस्मरणरचनाकार : डॉ. अमित भारद्वाजसंस्करण : 2026, पेपरबैकपृष्ठ 162  | मूल्य ₹199/-बचप...
08/08/2026

पुस्तक : ऑफ़लाइन बचपन के क़िस्से | संस्मरण
रचनाकार : डॉ. अमित भारद्वाज
संस्करण : 2026, पेपरबैक
पृष्ठ 162 | मूल्य ₹199/-

बचपन बीत जाता है, पर उसकी छाया जीवन भर हमारे साथ चलती रहती है। मनुष्य अपने जीवन में बहुत कुछ भूल जाता है लेकिन अपना बचपन कभी नहीं भूलता। समय की लंबी यात्रा में कई लोग मिलते हैं, बिछड़ते हैं; घर बदलते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं, विचार बदलते हैं, लेकिन बचपन की यादें मन के किसी कोने में हमेशा सुरक्षित रहती हैं।

यह पुस्तक 80 और 90 के दशक की इन्हीं यादों को संजोने का प्रयास है, जब बचपन ऑफलाइन था...मोबाइल और इंटरनेट के जाल से फ्री, स्क्रीन से दूर, गली और मैदान में, सीमित संसाधनों के बीच अनगिनत खुशियों के साथ...

पुस्तक अमेज़न, फ्लिप्कार्ट एवं रेख़्ता बुक्स पर उपलब्ध है। अतिरिक्त छूट के साथ मंगवाने के लिए प्रकाशन के वॉट्सएप नम्बर 9680433181 पर ऑर्डर कर सकते हैं।

पुस्तक : मैं कहाँ जाऊँगी? | कहानी-संग्रहरचनाकार : संतोषीसंस्करण : 2026, पेपरबैकपृष्ठ 128  | मूल्य ₹199/-किसी गाँव-ढाणी क...
07/08/2026

पुस्तक : मैं कहाँ जाऊँगी? | कहानी-संग्रह
रचनाकार : संतोषी
संस्करण : 2026, पेपरबैक
पृष्ठ 128 | मूल्य ₹199/-

किसी गाँव-ढाणी को करीब से देखना हो तो संतोषी के कहानी संग्रह ‘मैं कहाँ जाऊँगी?’ को पढ़ा जा सकता है। ये कहानियाँ घर की देहरी लाँघकर चौके तक पहुँचने की सहूलियत भी देती हैं। महसूस होगा कि कैसे स्त्रियाँ अपने हिस्से आए दुखों को अपने पल्लू से बाँधकर चूल्हे पर अपनी चाहनाएँ पकाती हैं, फिर भी उनके हाथ अक्सर खाली रह जाते हैं। पर ये क्या कम है कि वे अपनी भूख की, अपने डर की और अपने सपनों की बात करने लगी हैं।

यथार्थ की खुरदरी ज़मीन से उपजी ये कहानियाँ कहन में सहज हैं। यहाँ किसी विचारधारा का अनावश्यक आग्रह नहीं दिखता। यहाँ गाँव की पगडंडियाँ हैं, आँगन है, जहाँ बसंत में खिलने वाले फूल हैं और शूल भी तो हैं। यह एकदम आस-पास घटित जीवन है, जिसे संतोषी ने देखा और अपनी भाषायी कुशलता के साथ उसे जस का तस धर दिया। स्थानीय शब्दों और मुहावरों के सहारे ये कहानियाँ पूरी प्रमाणिकता के साथ आगे बढ़ती हैं।

— उमा, कथाकार

 #हिंदी आलोचना की बदलती ज़मीनहिंदी आलोचना के कई घर-घाट हैं, किंतु उसका पुराना ठाट अब नहीं रहा। इसका सबसे बड़ा कारण वही श...
07/08/2026

#हिंदी आलोचना की बदलती ज़मीन

हिंदी आलोचना के कई घर-घाट हैं, किंतु उसका पुराना ठाट अब नहीं रहा। इसका सबसे बड़ा कारण वही शिविरगत बंदरबाँट है जिसने आलोचना की स्वतंत्र वैचारिक परंपरा को धीरे-धीरे क्षीण कर दिया। हिंदी की जातीय और पारंपरिक आलोचना, जिसने एक समय भारतीय साहित्यिक चिंतन को अपनी विशिष्ट पहचान दी थी, उसका अपेक्षित विकास आगे नहीं हो सका। परिणामस्वरूप हिंदी में वैचारिक और सैद्धांतिक आलोचना का विकास लगभग अवरुद्ध हो गया। पिछली शताब्दी में आलोचना-दृष्टि का उल्लेखनीय विकास हुआ था, किंतु वह परंपरा आगे पर्याप्त विस्तार नहीं पा सकी। कुछ सर्जनात्मक समीक्षाएँ अवश्य सामने आयीं जिन्होंने पाठकों का ध्यान आकर्षित किया, पर आलोचना की सुदृढ़ सैद्धांतिकी धीरे-धीरे परिदृश्य से ओझल होती चली गयी। आज जो आलोचना बची है, वह प्रायः पुस्तक-समीक्षा तक सीमित होकर गौण होती जा रही है। समीक्षा की अंतर्दृष्टि भी प्रायः उतनी गहरी नहीं दिखती कि उससे आलोचना के नये प्रतिमान विकसित होने की आशा की जा सके। इसका कारण यह है कि आलोचक होने के लिए जिस सतत अध्ययन, मनन और बौद्धिक अनुशासन की आवश्यकता होती है, वह अब विरल होता जा रहा है। आज अधिकांशतः कवि, कथाकार और अन्य रचनाकार ही समीक्षा लिखते दिखाई देते हैं। यह अपने-आप में कोई बुरी बात नहीं है, किंतु आलोचना का कर्म एक विशिष्ट रससिद्धि और आजीवन समर्पण की माँग करता है। समकालीन हिंदी आलोचना का एक बड़ा भाग विमर्शात्मक और व्यावहारिक आलोचना तक सीमित दिखाई देता है। विचारोत्तेजक लेखन अवश्य हो रहा है, पर सैद्धांतिक आलोचना का रचनात्मक विकास नहीं दिखता । इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि सैद्धांतिक आलोचना का युग पीछे छूट चुका है और व्यावहारिक आलोचना अर्थात् पुस्तक-समीक्षा का समय चल रहा है।

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यही कारण है कि आज आलोचना और समीक्षा के बीच का भेद भी धुँधला पड़ गया है। समीक्षा अंततः रचना-आधारित आलोचना है और वही आगे चलकर मानदंड भी निर्मित करती है। उससे आलोचना के निष्कर्ष निकलने चाहिए। किंतु आज स्थिति यह है कि समीक्षक प्रायः समीक्षात्मक कृतियों की ही समीक्षा कर रहे हैं। परिणामस्वरूप नये रचनात्मक मानदंड विकसित नहीं हो पा रहे। जिन कृतियों में ऐसे मानदंडों की संभावना है, उन पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा। इस प्रकार हिंदी आलोचना पुस्तक-समीक्षा के रास्ते चलते हुए एक प्रकार के विचलन और बिखराव की शिकार हो गयी है। समीक्षक उस मूल आलोचनात्मक ध्वनि को अपने समीक्षा-कर्म में पूरी तरह विन्यस्त नहीं कर पा रहे हैं, जो हिंदी आलोचना की परंपरा की पहचान रही है। कुल मिलाकर इक्कीसवीं सदी में हिंदी आलोचना की पुरानी ज़मीन खिसक चुकी है, जबकि नयी ज़मीन अभी तैयार नहीं हो सकी है। पुस्तक-समीक्षाएँ, फ़ेसबुक टिप्पणियाँ और विमोचन-भाषणों के माध्यम से पुस्तकें हमारी आँखों के सामने आती-जाती रहती हैं, किंतु वे बाइस्कोप के दृश्य की तरह क्षणिक उपस्थिति भर बनकर रह जाती हैं। उनसे रचनाकारों को कोई स्थायी प्रेरणा नहीं मिलती। ऐसी स्थिति में यही आशा की जा सकती है कि लेखक और पाठकों के बीच से ही कोई ऐसा वर्ग तैयार होगा जो परंपरा, आधुनिकता और संक्रमण के बीच की रचनात्मक गति का निष्पक्ष जायज़ा ले सके और अपने समय की वास्तविक सर्जनात्मकता की पहचान कर सके। प्रतिभा हर युग में होती है, किंतु उसकी रचनात्मक अन्विति को पकड़ना, उसे स्थिर कर विश्लेषित करना सहज नहीं होता।

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नयी आमदः स्वर्ण झनक

इसी बीच आज यह किताब मिली। पुस्तक का नाम निराला जी की सुप्रसिद्ध शोकगीति ‘सरोज स्मृति’ के उस अंश से प्रेरित है जिसमें वह कहते हैं कि सरोज को नानी के घर से लेकर वह उसी तरह चले जैसे कोई भिक्षुक स्वर्ण के गहने लेकर चलता है। उसमें उन झनकते-खनकते (जो छिपाये न छिपे!) स्वर्णाभूषणों को सुरक्षित रखने का भय और लाचारी -दोनों बातें अनुस्यूत हैं। यह पुस्तक इस ब्याज से कई संकेत करना चाहती है, कुछ अपने बारे में और कुछ हिंदी आलोचना के वैभव और उसकी ध्वन्यात्मकता के बारे में।यह नहीं कहूँगा कि उनकी प्रत्येक स्थापना से मैं सहमत हूँ, किंतु जिन लेखकों और कृतियों के बहाने उन्होंने प्रश्न उठाए हैं, वे आकर्षित करते हैं और सोचने के लिए बाध्य करते हैं। लेखकद्वय ने पुस्तक को तीन खंडों—कारण, प्रतिस्मरण और उदाहरण—में विभाजित किया है। पहला खंड भक्ति आंदोलन, सूर, तुलसी और भारतेंदु पर केंद्रित है और प्रचलित आलोचना की भूमि पर आगे बढ़ता है। ‘प्रतिस्मरण’ शीर्षक विशेष रूप से ध्यान खींचता है, क्योंकि आलोचना का एक महत्त्वपूर्ण कार्य केवल स्मरण नहीं, स्मरण के कारणों और उसकी सांस्कृतिक निरंतरता की खोज भी है। हम अपने साहित्यिक आकार और उसकी व्यापकता को तो देखते हैं, पर उस आयतन को कम समझते हैं जिसमें महान कृतियाँ समय के भीतर सुरक्षित रहती हैं। वे जितनी प्रतिस्मृत होती हैं, हम उतने ही उनके रचनाकारों के प्रति प्रतिश्रुत भी बने रहते हैं। यही आलोचना की निरंतरता है।

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प्रतिस्मरण खंड में कुबेरनाथ राय पर दो निबंध हैं। विशेषतः रस आखेटक के संपादन के प्रसंग में उठाए गए प्रश्न विचारणीय हैं। कुँवर नारायण और विष्णु खरे पर लिखे गए लेख भी अनेक बहसों को जन्म देते हैं। ‘उदाहरण’ खंड में मुर्दहिया और चंद्रकांता पर लिखे गए लेख अधिक प्रभावी लगे। इन दोनों लेखकों के प्रयास का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि उन्होंने मिलकर हिंदी की वर्तमान रचनात्मकता को समझने का उद्यम किया है। भारतीय कविता की शास्त्रीय समझ को नये सिरे से देखने की उनकी आकांक्षा स्पष्ट दिखाई देती है। फिर भी एक प्रश्न अंत तक बना रहता है—जिस आलोचनात्मक दृष्टि के सहारे वे यह कार्य कर रहे हैं, उसके औज़ार क्या हैं? जब तक आलोचना अपने औज़ारों, अपनी पद्धति और अपनी सैद्धांतिकी को स्पष्ट नहीं करेगी, तब तक हिंदी आलोचना की नयी ज़मीन पूरी तरह तैयार नहीं हो सकेगी। इस पुस्तक का महत्त्व इसी बात में है कि वह इन प्रश्नों को पुनः हमारे सामने उपस्थित करती है। इन दोनों लेखकों से आशा होती है।
इन्हें शुभकामनाएँ ।

#आकुसि

'स्वर्ण-झनक' पर सुपरिचित कवि-साहित्यकार-समीक्षक विवेक कुमार मिश्र की टिप्पणी -कभी कभी अपने आकार प्रकार में छोटी होने के ...
06/08/2026

'स्वर्ण-झनक' पर सुपरिचित कवि-साहित्यकार-समीक्षक विवेक कुमार मिश्र की टिप्पणी -

कभी कभी अपने आकार प्रकार में छोटी होने के बावजूद कुछ पुस्तकें इस तरह से ध्यान खींचती है कि हर अध्याय किसी पुस्तक की तरह हो जाता है बार-बार पढ़ें और समझें जाने के लिए कहता है।अम्बुज पांडेय तथा प्रचण्ड प्रवीर की स्वर्ण झनक इसी तरह की पुस्तक है। इसके एक एक अंश को लेकर आप महीनों तक बातचीत विमर्श व चिंतन मनन कर सकते हैं। यह पुस्तक एक साथ भक्ति काल और भक्ति कविता से होते हुए आधुनिक साहित्य पर आपसे बात करती है । पाठ और संदर्भ को नये सिरे से देखें जाने को कहती है। हिंदी के आधुनिक भाव बोध और आलोचना की नई सृष्टि को भी गंभीरता से देखने के लिए एक मौजूं किताब है। इस तरह की पुस्तकें कम प्रकाशित होती हैं जो गंभीर पाठक से लेकर रसज्ञ पाठक तक समान ढ़ंग से समादृत होती हैं। किताब वेरा प्रकाशन जयपुर से है , वेरा के लिए भी यह प्रतिष्ठा का विषय है कि विचार व मानवीय चिंताओं तथा मूल्य संसार को लेकर किताबें सामने आती रहें।

पुस्तक : सात देश, इक्कीस कहानियाँरूपांतरण : तरसेम गुजरालसंस्करण : 2026, पेपरबैकपृष्ठ 172  | मूल्य ₹275/-यह किताब विश्व क...
05/08/2026

पुस्तक : सात देश, इक्कीस कहानियाँ
रूपांतरण : तरसेम गुजराल
संस्करण : 2026, पेपरबैक
पृष्ठ 172 | मूल्य ₹275/-

यह किताब विश्व कथा-साहित्य की उस धरोहर का एक और महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसे तरसेम गुजराल पिछले एक दशक से लगातार हिंदी पाठकों तक पहुँचा रहे हैं।

रूस, जापान, फ्रांस, इटली, पाकिस्तान, भारत और चीन की इक्कीस कहानियाँ यहाँ एक साथ उपस्थित हैं। मैक्सिम गोर्की, दोस्तोवस्की, चेखोव, आबे कोबे, यूकिओ मीशीमा, रयूनोसके आकुतागावा, मोपासां, बाल्ज़ाक, आंद्रे पियर द मांदियार्ग, अलबेर्तो मोराविया, एल्सा मोरान्ते, फरखंदा लोधी, आशक अली फ़ैज़ल, मोहम्मद इंशा याद, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, यशपाल, लू शुन, चुनचुन ये और चओ शी की ये रचनाएँ मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, अस्तित्व की पीड़ा और रोजमर्रा के जीवन के सूक्ष्म चित्र प्रस्तुत करती हैं। गुजराल का रूपांतरण मूल रचनाओं की आत्मा को सुरक्षित रखते हुए हिंदी में सहज और प्रभावी बनाता है।

किताब अमेज़न, फ्लिप्कार्ट एवं रेख़्ता बुक्स पर उपलब्ध है। अतिरिक्त छूट के साथ इसे प्रकाशन के वॉटसएप नम्बर 096804 33181 पर भी ऑर्डर किया जा सकता है।

03/08/2026

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