Jagdish KOTIA //

Jagdish KOTIA // शेर खुद अपनी ताकत से राजा कहलाता है,
जं? मज़बूत रिश्ते और कड़क चाय धीरे धीरे बनते है..!!

जो लोग अपना कहते हैं    वो किधर रहते हैंथोड़ा तो सामने आइए   चाहे जिधर रहते हैंकभी नक़ाब भी उतारिए  जो इधर भी उधर भी रहत...
09/08/2026

जो लोग अपना कहते हैं
वो किधर रहते हैं

थोड़ा तो सामने आइए
चाहे जिधर रहते हैं

कभी नक़ाब भी उतारिए
जो इधर भी उधर भी रहते हैं

तिल का ताड़ बनाने वाले
बताइए किस ख़बर में रहते हैं

सबके होने का ढोंग रचने वाले
जाने किस किस नज़र में रहते हैं...✍️✍️

09/08/2026

kitne khubsurat hai,
Aaiae apki jarurat hai, @

26/03/2026

Celebrating my 11th year on Facebook. Thank you for your continuing support. I could never have made it without you. 🙏🤗🎉

हनुमानजी समुद्र लाँघ गये। किसी ने तुलसीदास जी से कहा कि बड़े आश्चर्य की बात है कि हनुमानजी सौ योजन का समुद्र लाँघ गये ।त...
26/03/2026

हनुमानजी समुद्र लाँघ गये।
किसी ने तुलसीदास जी से कहा कि बड़े आश्चर्य की बात है कि हनुमानजी सौ योजन का समुद्र लाँघ गये ।

तुलसीदास जी बोले, आश्चर्य बिल्कुल नहीं।

क्यों?
हनुमानजी पार जाते हुए दिखाई दे रहे थे, लेकिन कमाल हनुमानजी का नहीं था।

फिर?
कमाल तो उसका था जो दिखाई नहीं दे रहा था । कौन?

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं।।

श्री हनुमानजी समुद्र लाँघ गये ।
आश्चर्य नहीं है, क्यों ?
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। अब लगता है, मुद्रिका मुख में थी, इसलिए हनुमान जी समुद्र लाँघ गये, तो आश्चर्य नहीं है।
तो हनुमानजी की महिमा नहीं है।
फिर किसकी महिमा है? मुद्रिका की।
लेकिन, तुलसीदास जी बोले, मुद्रिका की नहीं । फिर किसकी महिमा है?
बोले, हनुमानजी ने मुद्रिका मुख में रखी।बुद्धिमताम् वरिष्ठम्, इतने ज्ञानी।
मुद्रिका कोई मुख में रखने की चीज है?
श्री हनुमानजी से किसी ने कहा कि मुद्रिका मुख में क्यों रखे हो, यह कोई मुख में रखने की चीज है?
हनुमानजी ने कहा, मुद्रिका तो मुख में रखने की चीज नहीं है, पर मुद्रिका में जो लिखा है, वह मुख में ही रखने की चीज है।

तब देखी मुद्रिका मनोहर ।
राम नाम अंकित अति सुंदर ।।

मुद्रिका में लिखा था राम नाम ।
तो हनुमानजी ने मुद्रिका मुख में रखी, अर्थात् राम नाम मुख में रखा तो पार हो गये कि नहीं?
कितना बढ़िया उपदेश है?
हनुमानजी ने राम नाम मुख में रखा तो सागर पार कर गये, अगर हम लोग राम नाम मुख में रखेंगे, तो क्या संसार सागर से पार नहीं चले जायेंगे। दृढ़ विश्वास चाहिए।

जय श्री राम!...जय हो

कुछ रिश्ते हैं बने नए से,और कुछ पीछे छूट गए    कुछ ख्वाहिशें हुई मुकम्मल,और कुछ ख्वाब टूट गएरहा गुजरता सफ़र ये मेरा,वक्त...
16/03/2026

कुछ रिश्ते हैं बने नए से,और कुछ पीछे छूट गए
कुछ ख्वाहिशें हुई मुकम्मल,और कुछ ख्वाब टूट गए

रहा गुजरता सफ़र ये मेरा,वक्त के तहखानों से
कभी पराए माने कहना,कभी अपने ही रूठ गए..!!

रामायण में हमने देखा था - वन की ओर बढ़ते हुए राम केवल यात्रा नहीं कर रहे थे, वे अपने जीवन के उद्देश्य की ओर बढ़ रहे थे।प...
25/02/2026

रामायण में हमने देखा था - वन की ओर बढ़ते हुए राम केवल यात्रा नहीं कर रहे थे, वे अपने जीवन के उद्देश्य की ओर बढ़ रहे थे।
पर आज उस प्रसंग को और भीतर से समझते हैं।

वन में सिद्ध आश्रम था।
महामुनि विश्वामित्र तप में लीन रहते थे।
जप, यज्ञ, योग - सब कुछ चल रहा था।
पर जैसे ही यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित होती…
आकाश काला हो जाता।

मारीच।
सुबाहु।
ताड़का।

यज्ञ देखते ही राक्षस दौड़ पड़ते।
मांस और रक्त की वर्षा।
मंत्रों का अपमान।
ऋषियों का अपमान।

वह केवल विघ्न नहीं था।
वह धर्म पर आघात था।

विश्वामित्र के मन में चिंता छा गई।
ये पापी राक्षस हरि के बिना नहीं मरेंगे।
और हरि तो अयोध्या में अवतरित हो चुके हैं।

उन्होंने निर्णय लिया।
यह केवल सहायता माँगने का अवसर नहीं था।
यह भगवान के दर्शन का अवसर था।

सरयू में स्नान किया।
मन को स्थिर किया।
और सीधे अयोध्या पहुँचे।

राजा दशरथ ने दण्डवत कर स्वागत किया।
चरण धोए।
आसन दिया।
भोजन कराया।

पर भीतर एक आशंका भी थी।
विश्वामित्र का आगमन कभी साधारण नहीं होता।

चारों कुमार आए।
जैसे ही विश्वामित्र की दृष्टि राम पर पड़ी…
क्षण भर को वे स्थिर हो गए।
मानो चकोर पूर्णिमा के चन्द्र को देख रहा हो।

राजा ने पूछा -
केहि कारन आगमन तुम्हारा।

विश्वामित्र बोले -
असुर समूह सतावहिं मोही।
अनुज समेत देहु रघुनाथा।

बस… यही वाक्य।

दशरथ का हृदय काँप उठा।

धन माँगते - दे देते।
पृथ्वी माँगते - अर्पित कर देते।
गोधन, खजाना, प्राण - सब दे देते।
पर राम…

राम देत नहिं बनइ गोसाईं।

यह रघुवंशी राजा नहीं बोल रहा था।
यह एक पिता बोल रहा था।

कहते हैं मछली जल के बिना कुछ देर जीवित रह सकती है,
पर राम बिना दशरथ जीवित नहीं रह सकते।

विश्वामित्र ने कहा -
रघुकुल की रीति है - प्राण जाए पर वचन न जाए।

दरबार का वातावरण भारी हो गया।

पर आश्चर्य देखिए -
विश्वामित्र क्रोधित नहीं हुए।
क्योंकि यह संघर्ष अहंकार का नहीं था।
यह प्रेम का था।

तभी गुरु वशिष्ठ आगे आए।
उन्होंने दशरथ को समझाया।
राजन, यह समय है।
यह बालक साधारण नहीं है।
इसे मत रोको।

दशरथ की आँखें भर आईं।
उन्होंने राम को बुलाया।
आशीर्वाद दिया।
और कहा -
हे मुनि, अब आप ही इनके पिता हैं।

राम माता के चरणों में गए।
कौशल्या की आँखें लाल हो गईं।
लक्ष्मण दृढ़ खड़े थे।

और फिर -
अयोध्या की चौखट पार हुई।

विश्वामित्र चल रहे हैं।
राम-लक्ष्मण पीछे।

मार्ग में ताड़का प्रकट हुई।
भयंकर रूप।
वन काँप उठा।

राम ने एक ही बाण से उसका अंत किया।
पर दीन जानकर उसे निज पद दिया।

यह केवल वध नहीं था।
यह उद्धार था।

फिर यज्ञ प्रारंभ हुआ।
राम और लक्ष्मण पहरा दे रहे थे।

मारीच आया।
राम ने बिना फल वाला बाण चलाया।
वह सौ योजन दूर समुद्र पार जा गिरा।

सुबाहु आया।
अग्निबाण से उसका अंत हुआ।

लक्ष्मण ने राक्षसों की सेना का संहार कर दिया।

ऋषि निर्भय हुए।
देवताओं ने पुष्प वर्षा की।
यज्ञ पूर्ण हुआ।

विश्वामित्र ने राम को दिव्य अस्त्र-शस्त्र दिए।
ऐसी विद्या दी जिससे भूख-प्यास न लगे।
कंद-मूल-फल का सादा भोजन कराया।

यह यात्रा केवल यज्ञ रक्षा नहीं थी।
यह राम को तैयार करने की प्रक्रिया थी।

अवतार धीरे-धीरे प्रकट हो रहा था।

कुछ दिन आश्रम में रहे।
आनंद दिया।
फिर एक दिन मुनि ने कहा -
मिथिला में धनुष यज्ञ है।

राम प्रसन्न हुए।
और चल पड़े।

यही से कथा एक नए मोड़ की ओर बढ़ती है।

रामायण संदेश -जब धर्म संकट में होता है,तो भगवान केवल रक्षा नहीं करते -वे मार्ग भी बनाते हैं।

क्रमशः…

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विशेष नोट - प्रस्तुत चित्र AI के माध्यम से बनाए गए हैं। ये वास्तविक ऐतिहासिक चित्र नहीं, बल्कि रामकथा के भावों को जीवंत करने का एक विनम्र प्रयास हैं।

श्रीहरि चरणों का दास - #जगदीश_कोटिया

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