16/11/2025
Sarfaraz Nazeer साहब की पोस्ट पढ़ी जानी चाहिए
मुसलमानों के लिए देश में मौजूदा हालात में दो बड़े मुद्दे हैं, पहला सिक्योरिटी, मतलब उन्हें शनाख़्त के बिना पर प्रताड़ित न किया जाए, मारा न जाए, लिंच न किया जाए, दूसरा है डिस्क्रिमिनेशन, यानी भेदभाव रहित क़ानून/ सोसाइटी के लिए लॉ एंड ऑर्डर कमिटेड हो, जैसे एक ही तरह के जुर्म पर मुस्लिम है तो मुक़दमा दर्ज, दूसरे समुदाय को खुली छूट, मेरे पास दोनों बातों के हज़ार से ज़्यादा उदाहरण मौजूद हैं, मैं आपको दो केस बताता हूँ, अकबर ओवैसी ने कहा 15 मिनट के लिए पुलिस हटा लो, उन पर केस दर्ज हुआ और राईट विंग आज भी डिबेट में इसे उठाती है, जबकि देश के तमाम बड़े से बड़े मुस्लिम सियासत दा ने कभी इस तरह ग़ैर ज़िम्मेदारी भरा कोई एक स्टेटमेंट शायद दिया हो, दूसरा देश की राजधानी दिल्ली में सुदर्शन न्यूज़ का एडिटर मीटिंग बुलाता है, हथियार बांटता है, मुसलमानों का कत्ले आम करने का आह्वान करता है, नो केस, नो एफ़आइआर, यहाँ तक कि कोई सेकुलर पार्टी भी उस एडिटर को स्टेटमेंट को कोट नहीं करती, भाजपा और उसके तमाम नेताओं ने कितनी हेट स्पीच दी लेकिन कोई केस नहीं, ये लॉ एंड ऑर्डर की हक़ीक़त है, अब मुद्दा ये है कि हम साम्प्रदायिक राजनीति नहीं करते न उस तरह के ध्रुवीकरण के साथ हैं, लेकिन हेमंत बिस्वा सरमा से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया तक हम किसी को झोला भर भर कर वोट करें भी तो इस बात की क्या गारंटी कि वो सिद्धांतों से समझौता नहीं करेगा या साम्प्रदायिक तत्वों के साथ भविष्य में नहीं खड़ा होगा?
आपको ओवैसी का उभार साम्प्रदायिक लग सकता है लेकिन हकीकत में ये मुसलमानों का फ़्रस्ट्रेशन है जो सेकुलर दलो की उनके मूल दो मुद्दों पर चुप्पी साध लेने से ओवैसी को झोला भर वोट दे आता है, ओवैसी का उभार सेक्यूलर दलो की नाकामी है, मुसलमानों के सर्वाइवल पर चुप रहने का नतीजा है,
देश को महान लोकतंत्र बनने के लिए वहाँ विधि का शासन होना ज्यादा ज़रूरी है, जब रूल अपने शहरियों के मज़हबी शिनाख्त पर दोहरा आचरण करेगा तो साम्प्रदायिक राजनीति और ध्रुवीकरण होगा, कोई माई का लाल रोक नहीं पाएगा, हाँ गाली देना ओवैसी को सेक्यूलर होने की दलील है तो मैं आपसे पचास गालियाँ ज्यादा दूँगा बस ऊपर के दो मुद्दे की ज़मानत कोई राजनीतिक दल मुझे दे दे तो,
वरना इस पोस्ट के लिए मुझे गाली देने के लिए आप आज़ाद हैं