24/01/2026
बुद्ध ने कहा है – जन्म दुःख है। मृत्यु दुःख है। इन दो अंतिमों के बीच भी दुःख ही दुःख है। तब क्यों न थोड़ा हँस लिया जाए ?
व्यंग्य उपन्यास मेरे पापा की शादी का केवल एक ही मकसद है, आपके होठों पर मुस्कराहट की लकीर खींचना।
इस दौर में हँसी कितनी दुर्लभ है, इसकी एक मिसाल दूँगा। एक आदमी डॉक्टर से मिला और बताया कि जीवन में वह कभी भी हँसा नहीं है। यदि कोई उसे खिलखिलाकर हँसा दे तो वह अपनी सारी दौलत देने को तैयार है।
डॉक्टर ने मुस्कराकर कहा, 'यह तो बड़ा आसान है। तुम जानते होगे हमारे गाँव में एक सर्कस आया है। सुना है उस सर्कस का विदूषक ऐसे-ऐसे खेल दिखाता है कि लोग हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते हैं।'
उस आदमी ने बताया, 'वह विदूषक मैं ही हूँ।'
डॉक्टर सोच में पड़ गया उसके पास दूसरा कोई इलाज नहीं था, क्योंकि तब यह पुस्तक नहीं छपी थी।
—आबिद सुरती
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