Punit Singh Sisodiya

Punit Singh Sisodiya Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Punit Singh Sisodiya, Shopping & retail, Tikhampur, Ballia.

06/09/2025

आजकल घर तलाशने की मेरे अंदर जिज्ञासा बढ़ी हुई है। मैं जहां कहीं भी जाता हूं ,घर तलाशने लगता हूं ।लकड़ी और पत्थर से बना हुआ घर कितने कमरे हो, किसके -किसके लिए अलग-अलग कमरे हो आदि आदि सब कुछ बातें मेरे दिमाग में रहती है ।उसी के अनुरूप मै घर बनाना भी चाहता हूं या बना बनाया खरीद लेना चाहता हूं ।जिससे उसमें हम आराम से रह सके।
मेरे अंदर कटु विवेचन की बड़ी बुरी आदत है। मैं छोड़ना चाहता हूं फिर भी नहीं छोड़ पाता हूं। प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र है और उसे स्वतंत्रता पूर्वक रहने के लिए ही घर होता है। मेरी परिस्थितियां और घर में रहने वाले बच्चे-बच्चियों, युवक-युवतियों और अन्य अधेड़-वृद्धों की परिस्थितियां अलग अलग होती ही हैं ।अपनी-अपनी पसंदीदा रहन-शैली के अनुसार घर में रहना चाहते हैं। घर में मेरी ही मर्जी चले, यह संभव नहीं है ।घर तो इसीलिए होता है कि सब लोग कुछ-कुछ अपनी मर्जी से उठे- बैठें, पढ़े-लिखे, खाए-पिए,खेले- कूदे,पहने- ओढ़े आदि आदि अर्थात घर में बंधन मुक्त रहना मानव का स्वभाव है।
मुझे याद है कि बचपन में मेरा घर मिट्टी का था ।खपरैलों से छाया हुआ, मिट्टी की मोटी मोटी, लगभग ढाई से तीन फिट मोटी दीवारों वाला घर,जिसमें न ज्यादा गर्मी और न ज्यादा ठंडक लगती थी, साढ़े पांच फीट से 6 फिट की ऊंचाई वाले दरवाजे तथा एक छोटा सा रोशनदान हर कमरे में हुआ करता था।अलमारी के नाम पर दीवार में ही छोटा सा गड्ढा, दो या तीन स्थानों पर बना दिया जाता था। जिसे हम ताखा कहते थे ।लालटेन टांगने के लिए खूंटी, लकड़ी की सुंदर नक्काशी वाली लगाई जाती थी ।ढिबरी को भी रखने के लिए स्थान बनाया जाता था। घर के अंदर के सारे कमरे स्त्रियों के नाम पर होती थे। जैसे बड़की आजी,छोटी आजी,बड़की माई, छुटकी माई आदि आदि। बाहर का कमरा अनाज की कोठरी, गुड की कोठरी आदि के नाम से जाना जाता था।बच्चों के नाम से न कोई कमरा था और न पुरुषों के नाम से ही कोई कमरा था ।बल्कि बाहरी बैठका या दालान में ही पुरुष वर्ग रहा करते थे।रात होते ही संयुक्त परिवार में रहने वाले पांच साल के ऊपर के बच्चे बाहर बरामदे जिसे बैठका कहा जाता था,उसमें एक साथ मिलकर हंसी-ठिठोली करते हुए सोया करते थे।प्रातः भोर में या अनमुन्हारे ही औरतों का उठना और पिछवारे जाना जरूरी था ।उसी तरह बच्चों को भी भोर में उठना आवश्यक था।घर का एक मालिक होता था। उसकी एक आवाज ,एक राय, एकमत तथा उसका अनुशासन सर्वमान्य था।परिवार के सभी लोग उसके अनुशासन के तले विचरण करते थे। उसकी ही अनुभवगम्यता ,बुद्धिमत्ता,निर्णय की क्षमता ही घर को विकासोन्मुख करने में सहायक होती थी। यह एक तथ्य युक्त बात थी कि पत्नी से मिलने रात के अंधेरे में ही पुरुष वर्ग जाया करते थे। कक्ष निर्धारित होने के कारण कभी गलतियां नहीं होती थी। गांव की कुशल दाइयों द्वारा ही नवजात का सृजन हुआ करता था। उस समय भी छठ्ठी,बरही,स्त्री नहान, नामकरण, अन्नप्राशन अर्थात( चटावन), मुंडन ,यज्ञोपवीत आदि सभी संस्कार परंपरागत ढंग से रज –गज के साथ हुआ करते थे। इन सब में घर के मालिक और बड़ी बूढ़ी महिलाओं का विशेष हाथ होता था। नाते रिश्तेदार से रिश्ते निभाने और एक दूसरे की संकटापन्न स्थिति या उत्सव आदि में बढ़-चढ़कर भाग लेने की परंपरा भी बड़ी ही विशिष्ट थी।दामाद, जामाता या पाहुन की इज्जत ,प्रतिष्ठा विशेष होती थी।मामा या ससुर लोग घरेलू हो जाया करते थे। उस समय भी शहर- बनारस से या मुंबई-कलकत्ता कमाने वाले कमासुतों का विशेष आदर सत्कार( कुछ दिनों के लिए)हुआ करता था। लेकिन एक सप्ताह पुराना होते ही उन्हें भी घरेलू कार्यों में जुटना पढ़ता था।
समय बदला। परिस्थितियां बदली ।आर्थिक सोच बदली ।अर्थोपार्जन की प्रवृत्ति बदली। झट से अमीर होने वाली मानसिकता का विकास हुआ ।मानव मानव में स्पर्धा, ईर्ष्या ,द्वेष और स्वार्थपरता भी बढ़ती गई ।विद्युतीय चकाचौंध ने भौतिक सुख सुविधाओं में विशेष योगदान दिया तथा प्राकृतिक हवा का हरण कर लिया। आर्थिक विपन्नता ने मानवता की जीवन शैली को ही बदल कर रख दिया।मिट्टी के घर से निकलकर ,पत्थर के बड़े-बड़े मकान बड़प्पन के थोथे अहंकार के साथ बनने लगे।साथ ही उनमें रहने वाले लोगों का हृदय भी मिट्टी की तरह स्नेह– बरसात में पिघलने वाला नहीं रह गया।वह तो पत्थरों के साथ रहते-रहते वेदना, भावना,सहानुभूति से रहित हो गया। अस्तु परिवर्तन की दिशा और दशा दोनों ही बदल गई ।प्रकृति में जीने वाली जिंदगी अब कृत्रिम भौतिकवादी जीवन के प्रवाह में प्रवाहित होने लगी।घर की परिभाषा,परिस्थितियां ,अनुशासन ,वैचारिकता, आचार-विचार ,आस्था और विश्वास पत्थरों के घरों में रहने वालों के ड्राइंग रूम, लॉबी ,गेस्ट रूम ,बेडरूम , बाथरूम, प्ले रूम ,चाइल्ड रूम ,डायनिंग रूम किचन आदि आदि तक सीमित हो गया।
विकास के नाम पर बहुत कुछ बदलाव हुए। जिसने मानवता युक्त जनजीवन को बहुत अधिक प्रभावित किया। इन बदली हुई परिस्थितियों ने अति भयानक 'जेनरेशन– गैप' को जन्म दिया ।तेज भागती प्रगतिवादी-वैज्ञानिक-उड़ानों ने जहां उड़ान भरने को बाध्य किया ,वहीं असंतोष, पारिवारिक कलह तथा वृद्धों से वैचारिक मतभेद एवं वृद्धाश्रम को भी जन्म दिया। अपना-पराया के साए में संयुक्त परिवार विखंडित होता गया ।मोह ने स्वार्थपरता का आवरण ओढ़ लिया।
मैंने यह सब अनुभव सैकड़ों घर देखने ,सुनने और समझने के बाद लेखनी से साझा किया है। तनिक सी स्नेहिल बातों से ही लोगों का कुंठित ह्रदय खुल सा गया और वह अपनी पीड़ा प्रवाह में बहने लगे थे। जिससे किंचित व्यथित होकर,कुछ उन्हें मनाने के लिए और कुछ परिस्थितियों का अपने अनुसार आकलन कर, उनकी व्यथा पर स्नेह का लेपन करने के लिए लेखनी का सहारा लिया है। बदलते वातावरण में आत्म सुख और मन:शांति के लिए वर्तमान में जीते हुए भविष्य की सोच रखना आवश्यक है। घर परिवार का विकास, स्वस्थ मानसिकता तथा सकारात्मक सोच के साथ ,आज के युग में तभी हो सकता है ,जब आर्थिक और वैचारिक संपन्नता- स्वतंत्रता रहेगी। यद्यपि पत्थरों की दीवारों ने असंतोष को जन्म दिया है जो परिवार के वृद्धों ,युवकों -युवतियों, पति -पत्नियों, नाते -रिश्तेदारों, के दिलों मे घर कर रहा है। किंतु पुराने और नए, भूत और वर्तमान में सामंजस्य स्थापित करते हुए, समयानुसार चलने पर परिणाम अवश्य सुखद होगा। जो हमारे दिलो-दिमाग के विचार प्रवाह को भी विशाल करेगा और प्रगति का पथ पथ प्रशस्त कर, सुंदर- सुशील मानवता का विकास भी अवश्य करेगा।
घर ,परिवार समाज की बदलती हुई स्थिति-देखकर तथा आर्थिक उपार्जन के इस युग में मैं यह भी सोचने पर बाध्य होता हूं की पुरानी संयुक्त परिवार की तरह यदि दो-चार भाई एक साथ मिलकर रहें तो क्या प्रसन्नता का,स्वच्छन्दता का और उन्मुक्तता का भी अनुभव कर सकते हैं। यह प्रश्न बार-बार मेरे मन में उठता है। मैं यह मानने के लिए बाध्य हो जाता हूं कि अर्थोपार्जन के इस युग में भाई- भाई का, देवर- भाभी का,देवरानी -जेठानी का या सास -ससुर का सामान्य रह पाना ,जीवन यापन करना या जीवन विकास करना, साथ -साथ रहकर बहुत कठिन हो जाता। यह तो बहुत सहनशीलता ,त्याग ,संतोष, सहानुभूति,परस्पर सहयोग और परिवारवाद की भावना से युक्त भाव होता है ।जिस पर युगीन परिस्थित मे सचमुच चलना बहुत कठिन है। अर्थोपार्जन हेतु घर से बाहर जाना आवश्यक है। नौकरी पर या अपने व्यवसाय के लिए दूर -दूर रहने वाले लोगों में प्रेम और सहयोग की भावना का पल्लवन अधिक होता है।यह सत्य है कि धनाभाव में किसी की भी सहायता करना संभव नहीं होता है।
हम जैसे बुजुर्गवार तो यही सोच सोचने की गलती करते रहते हैं कि काश सब एक साथ रहते तो और अधिक अच्छा रहता है ।वह यह नहीं सोचते कि हमारे धर्म में सबसे पहले अर्थ को महत्व दिया गया है ।अर्थ होने पर ही धर्म का निर्वाह होता है और तो घर पर रहेंगे तो धनागम कहां से हो पाएगा धनाभाव में कब तक प्रेम संबंध बना रहेगा।
अस्तु समाज में जीने के लिए विकट संघर्ष करते हुए तथा अपनी वर्त्तमान स्थिति को अर्थ के अभाव से मुक्त करते हुए, मैंने तो यही अनुभव किया है कि मकान भले ही पत्थर के हो गए हो लेकिन आवश्यकता पड़ने पर या दुखात्मक-सुखात्मक स्थिति आने पर सभी एक दूसरे से हिलते -मिलते हैं। उनका हृदय पिघलता है ,द्रवित होता है, सह-अनुभूति उनके हृदय में अवश्य,स्वयमेव ही उपजती है।

Krishna Janmashtami🙏🙏
26/08/2024

Krishna Janmashtami🙏🙏

Address

Tikhampur
Ballia
2772001

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Punit Singh Sisodiya posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share