Osho Glimpse

Osho Glimpse OSHO DHYANSHALA FOR ALL
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04/12/2025
28/06/2019

*आर्य अष्टांगिक मार्ग* पर ओशो के प्रवचन

भीतर आने के बहुत मार्गों में आठ अंगों वाला अष्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ है। वे आठ अंग निम्न है :-

*सम्यक—दृष्टि, पहला अंग।*
सम्यक—दृष्टि का अर्थ होता है, दृष्टियों से मुक्ति। पक्षपात से मुक्ति। आंखें खाली हों। कोई भाव न हो, कोई विचार न हो, कोई सिद्धांत, कोई शास्त्र न हो; कोई मत न हो। खुली निष्पक्ष आंख हो, निर्दोष आंख हो—जैसे दर्पण खाली—तो सत्य दिखायी पड़ेगा। तो सत्य कैसे बचेगा? लेकिन दर्पण पर अगर कोई धूल पड़ी हो, कोई पक्ष पडा हो, रंग पड़ा हो, तो फिर सत्य जैसा है वैसा दिखायी न पड़ेगा। सम्यक—दृष्टि का अर्थ होता है, दृष्टियों का अभाव। जब सब दृष्टियां छूट जाती हैं—हिंदू की दृष्टि, मुसलमान की दृष्टि, ईसाई की दृष्टि—जब सब दृष्टियां छूट जाती हैं और कोई दृष्टिशून्य खड़ा होता है, निर्वस्त्र, नग्न, सारी दृष्टियों से मुक्त, तब सत्य को जाना जाता है। यह पहला अंग।

*दूसरा अंग, सम्यक—संकल्प।* हठ नहीं, औद्धत्य नहीं, जिद्द नहीं। अधिक लोग संन्यासी हो जाते जिद्द से, हठ से, औद्धत्य से, अहंकार से। तुम्हें अक्सर जिद्दी लोग संन्यासियों में मिलेंगे। दुर्वासा की कहानी तो तुम जानते ही न! जिद्दी आदमी कुछ भी कर सकता है। कुछ न कर पाए, संन्यासी हो जाता है।

बुद्ध कहते हैं, यह संकल्प नहीं हुआ। यह तो अहंकार का ही सूक्ष्म रूप है। सम्यक—संकल्प। ठीक—ठीक संकल्प का अर्थ यह है, किसी जिद्द के कारण संन्यास नहीं, बोध के कारण संन्यास, समझ के कारण संन्यास, होश से, जीवन की प्रौढ़ता से। जीवन को सब तरफ से परख कर, परिपक्वता से। संकल्प तो हो, लेकिन जिद्दी संकल्प नहीं चाहिए। आग्रहपूर्वक नहीं चाहिए। निराग्रही संकल्प।
फर्क समझना। मेरे पास एक युवक आया और उसने कहा कि मैं तो संन्यास लेकर रहूंगा। मैंने पूछा, बात क्या है? संन्यास किसलिए लेना है? उसने कहा कि मेरे पिता इसके खिलाफ हैं। मतलब समझे आप? पिता खिलाफ है,, इसलिए वह लेना चाहता है। वह कहता है, मैं लेकर रहूंगा। मैंने उसको समझाया कि अगर तेरे पिता खिलाफ न हों, फिर तू लेगा? उसने कहा, फिर मैं सोचूंगा।
जिद्द के कारण संन्यास ले रहा है। अहंकार को 'एक चोट लग गयी है, बाप कहता है, नहीं लेना। बाप भी जिद्दी है। ठीक बाप का ही बेटा है, उन्हीं का बेटा है, उन्हीं जैसा है, उन्हीं का फल है। बाप जिद्दी है कि संन्यास नहीं लेना, बेटा जिद्दी है कि लेकर रहूंगा, कि बाप को मजा चखाकर रहूंगा।
अब यह अगर संन्यास ले लेगा तो यह असम्यक संकल्प हुआ। यह ठीक संकल्प नहीं है। मैंने उससे कहा कि तू रुक, मैं तुझे संन्यास नहीं दूंगा। तू यह बात छोड़ दे, यह तौ बाप ने तुझे संन्यास लिवा दिया!
एक और घटना आप से कहूं। मेरे एक मित्र थे, एक युवती से उनका प्रेम था। दोनों का बडा प्रेम था—ऐसा कम से कम दिखलाते तो थे। दोनों के परिवार विपरीत थे और दोनों जिद्द में थे विवाह करने की। मैंने उनसे कहा, तुम थोड़ा सोच लो। कहीं ऐसा तो नहीं है कि यह जितना प्रेम तुम्हें दिखायी पड़ता है इतना प्रेम नहीं है, सिर्फ एक जिद्द है, अपने परिवारों से टक्कर लेने' की। उन्होंने कहा कि नहीं—नहीं, हमारा प्रेम बहुत गहरा है। मैंने उन्हें कई बार समझाने की कोशिश की, वे मुझसे नाराज भी हो गए कि आप बार—बार यह बात क्यों उठाते हैं? मैंने कहा कि मुझे ऐसा लगता है कि जितना तुम प्रेम समझ रहे हो, इतना नहीं है। यह परिवारों का झगड़ा है। और विवाह के बाद तुम झंझट में पड़ सकते हो, क्योंकि जब विवाह हो जाएगा तो बात खतम हो गयी, परिवार से जो झगड़ा था वह तो समाप्त हो गया। नहीं—नहीं, उन्होंने तो जिद्द से कहा कि हमारा प्रेम है।
विवाह भी कर लिया। एक साल के बाद ही उन्होंने मुझे कहा कि हम भूल में थे। न मुझे लड़की से कुछ लेना—देना है, न लड़की को मुझसे कुछ लेना—देना है। बेटा ब्राह्मण घर का था, लडकी पारसी थी। न लड़की के घर वाले चाहते थे कि ब्राह्मण से शादी हो, ब्राह्मण के घर वाले तो चाह ही कैसे सकते हैं कि पारसी से शादी हो! वह बड़ा झगड़ा था। जिद्द अटक गयी थी। परिवार और बेटा—बेटियों के अहंकार में बड़ी कलह थी।
सालभर में सारा प्रेम बहु गया। जब प्रेम बह गया तो अड़चनें शुरू हो गयीं। जो झगड़ा परिवार से चल रहा था वह आपस में चलने लगा। झगडैल प्रवृत्ति के तो थे ही। पहले मां—बाप से लड़ रहे थे, अब तो कोई बात ही न रही, मां—बाप अलग ही पड़ गए। उन्होंने कहा, ठीक है, भूल ही गए, कि जब तुमने शादी कर ली तो अलग हो जाओ। अब जो इागडूा मां—बाप से लगा था, वह झगड़ा एक—दूसरे के प्रति लगने लगा। उस युवक ने आत्महत्या की, छह साल के भीतर। शराबी हो गया और आत्महत्या तक बात पहुंच गयी।
खयाल रखना, बुद्ध हमेशा अपने भिक्षुओं को कहते थे, सम्यक—संकल्प। किसी हठ के कारण नहीं, अपने बोध से, समझ से। आंतरिक उत्साह से लेना।

*तीसरा अंग है, सम्यक—वाणी।* बुद्ध कहते थे, जो जाने, वही बोले। और जैसा जाने, वैसा ही बोले, जरा भी अन्यथा न करे। और जो बोलने योग्य हो वही बोले, असार न बोले। क्योंकि बोलने से बड़ी उलझनें पैदा होती हैं। जीवन व्यर्थ के जालों में फंस जाता है। तुम जरा खयाल करना, कितनी झंझटें तुम्हारे बोलने की वजह से पैदा हो जाती हैं। किसी से कुछ कह बैठे, झगड़ा हो गया, अब झंझट बनी।
काश, तुम अपने बोलने को थोड़ा न्यून कर लौ तो तुम्हारे जीवन की नब्बे प्रतिशत झंझटें तो कम हो जाएं। इस दुनिया में जितने मुकदमे चल रहे हैं, झगड़े चल रहे हैं, सिर फोडे जा रहे हैं, वह असम्यक—वाणी के कारण हैं।
बुद्ध कहते थे, जिसे स्वयं को जानना है, उसे जितनी कम झंझटें जीवन में पैदा हों, उतना अच्छा है।

*चौथा, सम्यक—कर्मांत।* व्यर्थ के कामों में न उलझो। वही करो जिसके करने से जीवन का सार मिले। क्योंकि शक्ति सीमित है और समय सीमित है। हममें से अधिक लोग तो कुछ न कुछ करने में लगे रहते हैं। हम खाली बैठना जानते ही नहीं। कुछ करने को न हो तो हमें बडी बेचैनी होती है। तो हम अपनी बेचैनी को करने में उलझाए रखते हैं।
न मालूम क्या—क्या आदमी करता रहता है! तुम अगर खाली बैठे हो कमरे में तो तुम कुछ न कुछ करोगे, उठकर खिड़की खोल दोगे, अखबार पढ़ने लगोगे, रेडियो चलाओगे, कुछ न कुछ करोगे। कुछ न मिलेगा, सिगरेट पीने लगोगे। कुछ न कुछ करोगे। व्यस्त रहने में हम अपने पागलपन को छिपाए रहते हैं।
बुद्ध ने कहा, इस तरह की व्यस्तता महंगी है। धीरे— धीरे अव्यस्त बनो। वही करो, जो करना जरूरी है, जो नहीं करना जरूरी है, वह मत करो। अगर बेचैनी होती हो तो बेचैनी को जागरूक होकर देखो, धीरे— धीरे बेचैनी शांत हो जाएगी। और जो शक्ति बचेगी व्यर्थ के कामों से, उसे तुम सार्थक दिशा में मोड़ सकोगे।

*पांचवां, सम्यक— आजीव।* बुद्ध कहते थे, अपने जीने के लिए किसी का जीवन नष्ट करना अनुचित है। अब कोई कसाई का काम करता है, तो बुद्ध कहते, यह व्यर्थ है। इतना उपद्रव बिना किए आदमी अपना भोजन जुटा ले सकता है। वही करो जिससे किसी के जीवन को अहित न होता हो। क्योंकि जब तुम दूसरों का अहित करते हो तो तुम अपने अहित के लिए बीज बो रहे हो। फिर फसल भी कांटनी पड़ेगी। सम्यक —आजीव।

*छठवा, सम्यक—व्यायाम।* बुद्ध कहते थे, न तो बहुत सुस्त होओ और न बहुत कर्मी। मध्य में होओ। न तो आलसी बन जाए और न बहुत कर्मठ। क्योंकि आलसी कुछ भी नहीं करता और कर्मठ व्यर्थ कै काम करने लगता है। मध्य में चाहिए। सम्यक —व्यायाम। जीवन की ऊर्जा सदा संतुलित हो।

और सातवां बुद्ध का अंग है,

*सम्यक—स्मृति।* सम्यक— ध्यान। होश रखकर जीए। स्मरणपूर्वक जीए। मैं क्या कर रहा हूं इसे देखते, जानते हुए करे। क्रोध उठे तो क्रोध के प्रति भी अपने होश को सावधानी से देखता रहे कि यह क्रोध उठा, यह क्रोध मुझे पकड़ रहा है, अब यह क्रोध मुझसे कह रहा है, मार दो इस आदमी के सिर में डंडा; इस सबको देखता रहे। और तुम चकित होओगे कि अगर तुम देखने में थोड़े सावधान हो जाओ तो जो व्यर्थ है, वह अपने आप होना बंद हो जाएगा, और जो सार्थक है, वही होगा। धीरे— धीरे यह स्मृति तुम्हारे चौबीस घंटे पर फैल जाएगी। उठते—बैठते तुम जागे—जागे चलोगे। और एक ऐसी घड़ी आती है कि रात सोए भी रहोगे तब भी तुम्हारे भीतर जागरण की धारा बहती रहेगी। एक सूत्र शुभ्र ज्योति की भांति तुम्हारे भीतर जागा रहेगा।
वही तो कृष्ण ने कहा है कि जब सब सो जाते हैं तब भी योगी जागता है—या निशा सर्वभूतानाम तस्याम जागर्ति संयमी। जागा रहता, इसका मतलब यह नहीं कि संयमी सोता ही नहीं, चलता कमरे में, बैठा रहता, अनिद्रा का बीमार रहता, ऐसा मतलब नहीं है। इसका मतलब इतना है कि नींद शरीर पर होती, भीतर चैतन्य का दीया जलता रहता है।
सम्यक—स्मृति का अर्थ है, जब चौबीस घंटे पर तुम्हारा ध्यान फैल जाए, बोध फैल जाए, तब तुम्हारी परिधि में जागरूकता आ गयी।

और फिर अंतिम घड़ी है,

*आठवां अंग, सम्यक—समाधि।*
बुद्ध समाधि में भी कहते हैं—सम्यक, ठीक समाधि। गैर ठीक समाधि उसे कहते हैं जिसे आदमी बेहोशी में पाता है।
तुमने देखा होगा कि कोई योगी जमीन में छिप जाता है, छह महीने के लिए समाधि ले लेता है। वह समाधि नहीं, उसको बुद्ध कहते हैं, असम्यक—समाधि। वह तो बेहोशी में पड़ा रहा। जैसे मेंढक छिप जाता है जमीन में और पड़ा रहता है गर्मी के दिनों में—आधा मुर्दा, बस नाममात्र को जीवित। फिर वर्षा आएगी, फिर मेंढक में प्राण आ जाएंगे। ऐसा ही योगी अपनी श्वास को रोककर मूर्च्छा में पड़ जाता है। उसे पता ही नहीं कि वह कर क्या रहा है। छह महीने पड़ा रहेगा, लोगों को चमत्कार भी मालूम पड़ेगा। छह महीने बाद जब वह उठेगा तो लोग बड़े चमत्कार से भर जाएंगे, बड़ी श्रद्धा और पूजा करेंगे।
लेकिन यह कोई समाधि नहीं है। यह तो अपने शरीर और अपने मन के साथ एक तरकीब, अपने को ग्रच्छइrत करने की योजना। इससे कोई सत्य को कभी नहीं जान पाया है। ऐसा होता तो मेंढक कभी के सब सत्य को उपलब्ध हो गए होते। ऐसे साइबेरिया में सफेद रीछ होते हैं, वे भी यही करते हैं। छह महीने के लिए मुर्दे की तरह पड़ जाते हैं। श्वास बिलकुल ठहर जाती है। तो श्वास की तरकीब है यह। इस तरकीब से कुछ समाधि का संबंध नहीं है।
सम्यक—समाधि का अर्थ है, होशपूर्वक स्वयं के केंद्र पर विराजमान हो।
ये दो अंतिम चरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। सम्यक—स्मृति परिधि पर। जीवन के कर्म की जो परिधि है—करते, उठते, बैठते, चलते, बात करते, मिलते, होश रखे। फिर धीरे— धीरे यही होश केंद्र पर आने लगेगा। फिर धीरे— धीरे आंख बंद करके भीतर होश का दीया जलता रहे, उसी दीए के साथ तुम एक हो जाओगे, होशपूर्वक स्वयं में प्रविष्ट कर जाना सम्यक—समाधि।

- ओशो,
एस धम्मो सनंतनो, प्रवचन - 86 से संकलित

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