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21/02/2026

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16/02/2026

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16/02/2026
Cheriyal Scroll Painting (चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग)Telangana की एक विलुप्त होती लोककला का गौरवशाली इतिहासभारत की लोककलाएँ ...
15/02/2026

Cheriyal Scroll Painting (चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग)
Telangana की एक विलुप्त होती लोककला का गौरवशाली इतिहास

भारत की लोककलाएँ केवल चित्र नहीं हैं —
वे सदियों पुरानी कहानियाँ हैं, जो रंगों, परंपराओं और संस्कृति के माध्यम से जीवित रहती हैं।

भारत के दक्षिण भाग में, तेलंगाना राज्य के एक छोटे से गाँव चेरियल (Cheriyal) में जन्मी एक अनोखी चित्रकला शैली है, जिसे हम आज चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग के नाम से जानते हैं।

यह कला एक समय गाँव-गाँव घूमकर लोककथाएँ सुनाने वाले कलाकारों की आत्मा थी।
लेकिन आज यह कला धीरे-धीरे लुप्तप्राय (Endangered) होती जा रही है।

🎨 चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग क्या है?

चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग एक पारंपरिक लोक चित्रकला शैली है जो मुख्य रूप से तेलंगाना में विकसित हुई।

इस कला की सबसे बड़ी विशेषता है:

✅ लंबे कपड़े या स्क्रॉल पर चित्र बनाना
✅ चित्रों के माध्यम से कहानी सुनाना
✅ चमकीले प्राकृतिक रंगों का प्रयोग
✅ लोक देवताओं, रामायण, महाभारत और ग्रामीण जीवन का चित्रण

यह कला केवल देखने के लिए नहीं थी —
यह एक चलती-फिरती कहानी की किताब थी।

📜 स्क्रॉल पेंटिंग का अर्थ

“Scroll” का अर्थ होता है एक लंबा कपड़ा या कागज जिसे लपेटा जा सके।

चेरियल कलाकार कपड़े के लंबे टुकड़े पर चित्र बनाते थे, और फिर उसे गाँवों में लेकर जाते थे।

जब वे कहानी सुनाते, तो स्क्रॉल को धीरे-धीरे खोलते जाते।

इस प्रकार यह कला एक प्रकार का Visual Storytelling थी।

🌿 चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग की उत्पत्ति और इतिहास
1. प्राचीन लोक परंपरा से जुड़ाव

भारत में चित्रों के माध्यम से कथा सुनाने की परंपरा बहुत पुरानी है।

बौद्ध काल में जातक कथाएँ चित्रित की जाती थीं

मंदिरों की दीवारों पर देवी-देवताओं की कहानियाँ बनाई जाती थीं

ग्रामीण समाज में लोकगायक और कथावाचक चित्रों का उपयोग करते थे

चेरियल स्क्रॉल इसी परंपरा की एक जीवित धरोहर है।

2. चेरियल गाँव: इस कला का जन्मस्थान

चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग का नाम तेलंगाना के:

📍 Cheriyal गाँव (Siddipet District)
से लिया गया है।

यह गाँव ऐतिहासिक रूप से कलाकारों और हस्तशिल्पियों का केंद्र रहा है।

यहाँ के कलाकार पीढ़ियों से इस कला को आगे बढ़ाते आए।

3. काकतीय राजवंश का प्रभाव

चेरियल कला का विकास मुख्यतः काकतीय काल (12वीं–14वीं शताब्दी) में हुआ।

काकतीय शासक कला, मंदिर निर्माण और लोकसंस्कृति के संरक्षक माने जाते थे।

उनके शासनकाल में:

मंदिरों में भित्ति चित्र बने

लोक कलाकारों को संरक्षण मिला

कहानी कहने की परंपरा को बढ़ावा मिला

चेरियल स्क्रॉल उसी सांस्कृतिक वातावरण में फली-फूली।

👥 इस कला के पारंपरिक कलाकार कौन थे?

चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग मुख्य रूप से बनाई जाती थी:

“नक्शी कलाकार” (Nakashis) द्वारा

ये कलाकार समुदाय पारंपरिक रूप से चित्रकला में विशेषज्ञ थे।

इनका कार्य केवल चित्र बनाना नहीं था, बल्कि:

लोक कथाओं को संरक्षित करना

देवी-देवताओं की कहानियाँ गाँव तक पहुँचाना

धार्मिक और सांस्कृतिक शिक्षा देना

था।

🎭 चेरियल स्क्रॉल का संबंध लोक नाट्य से

चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग का गहरा संबंध तेलंगाना के लोक नाट्य रूपों से है:

यक्षगान

बुर्राकथा (Burra Katha)

ओग्गु कथा (Oggu Katha)

इन नाट्य परंपराओं में कलाकार स्क्रॉल दिखाते हुए गाते और अभिनय करते थे।

इस तरह यह कला केवल चित्र नहीं, बल्कि एक Performing Art Tradition भी थी।

🎨 चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग की शैली

चेरियल स्क्रॉल को देखते ही पहचाना जा सकता है।

इसके कुछ प्रमुख शैलीगत तत्व हैं:

1. चमकीले रंग

चेरियल चित्रों में मुख्य रूप से प्रयोग होते हैं:

लाल (Red Background)

पीला

हरा

नीला

काला आउटलाइन

लाल रंग इस कला की पहचान है।

2. प्राकृतिक रंगों का प्रयोग

परंपरागत रूप से रंग बनाए जाते थे:

मिट्टी और पत्थरों से

पेड़ों की छाल से

बीजों और फूलों से

कालिख से

यह कला पूरी तरह प्रकृति से जुड़ी थी।

3. सरल लेकिन प्रभावशाली आकृतियाँ

चरित्रों की आँखें बड़ी होती हैं, चेहरे भावपूर्ण होते हैं।

चित्रों में गहराई से अधिक भाव और कथा पर ध्यान होता है।

4. बॉर्डर और फ्रेम

हर दृश्य के चारों ओर सुंदर सजावटी बॉर्डर बनाया जाता है।

यह स्क्रॉल को एक “कथा-पट” का रूप देता है।

📖 चेरियल स्क्रॉल में कौन सी कहानियाँ चित्रित होती थीं?

चेरियल स्क्रॉल पेंटिंग में विषय बहुत व्यापक होते हैं:

धार्मिक कथाएँ

रामायण

महाभारत

शिव पुराण

देवी महात्म्य

लोक देवता कथाएँ

पोचम्मा देवी

मल्लन्ना स्वामी

येल्लम्मा देवी

ग्रामीण जीवन

खेती

त्योहार

विवाह

लोक नृत्य

यह कला तेलंगाना के समाज का दर्पण थी।

यह कला आज संकट में है क्योंकि:

1. आधुनिक मनोरंजन का प्रभाव

टीवी, मोबाइल और इंटरनेट ने लोक कथावाचन को कम कर दिया।

2. कलाकारों की आर्थिक कठिनाइयाँ

इस कला से स्थायी आय नहीं हो पाती।

3. नकली और प्रिंटेड कॉपी

मशीन से बने डिज़ाइन असली कला को नुकसान पहुँचाते हैं।

4. नई पीढ़ी का पलायन

युवा कलाकार दूसरे पेशों में चले जाते हैं।

Note - Image is taken from MAP Academy

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08/02/2026

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05/02/2026

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